इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

आग

श्‍वेता मिश्रा

          बरामदे में घर की सारी चीजें बिखरी पड़ी थी। जले नए बर्तन, झुलसे महंगे इलेक्ट्रानिक और फर वाले खिलौने, कीमती नई कुछ जली कुछ अधजली साड़ियाँ और ढेर सारे कपड़े,गद्दे ,तमाम खूबसूरत विदेशी बैग और बिखरी थी उनके साथ हजारों सुलगती यादें!
          कल दोपहर ही की तो बात है जब अचल भागता हुआ आया और कहा कि - दीदी, आपके बेडरूम से धुआं निकल रहा है। शैली बिना किसी से कुछ कहे अपना पर्स ढूंढने लगी। घर की चाबियां थी उनमें। बच्चे माँ को परेशान देख जानने के लिए बेचैन हो उठे आखिर हुआ क्या? शैली ने कहा- घर से धुआं निकल रहा है। शायद घर में आग लगी है इतना कहते हुए घर से दौड़ गयी।
          घर की लगी आग पर मोहल्ले वाले और किरायेदारों की मदद से काबू तो पा लिया गया था,लेकिन अखबार वालों ने और प्रियजनों की आग तो अब तक न बुझ सकी।
          वहां पहुंचे हर किसी के मुंह से बस यही सवाल निकल रहा था - बच्चे तो ठीक हैं न? बहुत नुकसान हो गया तुम्हारा। जो बहुत करीबी थे। उनकी जुबान से कोई सवाल नहीं निकला। निकले थे तो बस आँख से आंसू बूढ़ी रमिया उसके दिल में तो जैसे आग लगी थी। एक एक सामान उठाती और हजार - हजार फसाने सुनाती। गुड़िया ने कभी इसे हाथ नहीं लगाया। इन कपड़ों के तह नहीं खोले,हे राम ये तो अभी भैया की शादी में लहंगा लिया था। कितनी जंच रही थी। इसका तो इतना टुकड़ा ही बचा। सब जल गया। भगवन को ही ये सब नहीं सुहाया शायद।
          बुझे आग के धुएं में रात भी सिमटने लगी थी और पलकें खुली ही रह गयी। कब आग सूरज का गोल बन आकाश में चमक उठा समझ ही नहीं आया। चाय का प्याला पापा की जिद से शैली ने हाथ में तो ले ली थी लेकिन अखबार के छपे शब्द और तस्वीर ही जैसे घूंट बन गले से उतर रहे थे कि तभी डोर बेल बजी। कौन आया, फिर किसी को न्यूज़ चाहिए होगी। शैली के पापा का चेहरा फिर तमतमाया। तभी रमिया की आवाज आई - भैया आये हैं, दिल्ली से इनको कैसे पता चला? भैया बहुत नुकसान हो गया सारा बर्तन सारा सामान सब जल गया। बर्तन तो कल से ही मैं और शिव दोनों धो रहें हैं। साफ  ही नहीं हो रहा है। कहते - कहते फफक पड़ी।
- कैसे हो गया ये सब मम्मी? एक फोन तो किया होता। खैर जाने दो जैसी नियत थी वैसा ही तो हुआ। रूही भी यही कह रही थी। अज्जू ने मम्मी से कहा। इतना सुनते ही मम्मी का गुस्सा आसमान पर चढ़ गया। शैली की मम्मी ने अज्जू और रूही को बहुत बुरी तरह फटकार लगाने लगी- शैली ये शब्द सुनते ही ठिठक सी गई। अब उसे लगने लगा कि आग उसके घर में नहीं उसके बदन में लगी है। उसकी गृहस्थी नहीं जली वो अब खुद ही जल रही है। आज उसकी नियति इतनी खराब हो गई कि ईश्वर उसे दंड दे बैठा। शायद ये दिन न होता तो रहा सहा भरम भी नहीं जलता।
          शैली सोचने लगी अज्जू आज इतना बड़ा हो गया। पत्नी की बातें इतनी सच्ची लगने लगी उसे कि आज दीदी के दिल पर क्या बीतेगी इसका भी ख्याल नहीं रहा। बचपन से दोनों छोटे भाइयों को जी जान से प्यार करती। हर मुसीबत में पढ़ाई में स्कूल में हर गलती में उसे याद आने लगा। अज्जू के दुखी होकर बताने पर कि मम्मी ने मना कर दिया रूही से शादी के लिए कैसे माँ पापा दोनों को मनाने में जुटी रही। कैसे रूही को घर के दस्तूर छोटी बहन की तरह सिखाती रही। कैसे कितनी चीजें अपने पति से लड़ - झगड़ कर छुपा कर उसके बर्थडे पर उसके रिजल्ट पर या घर आने पर उसको उपहार में देती रही। कितनी गन्दी,खराब नियति थी उसकी। कभी लेने की चाह नहीं थी उसकी। हमेशा देने के लिए बेचैन शादी में उसके छोटा सा भी उपहार लेने से इनकार कर कितना खुबसूरत हार रूही के गले में डाला था। एक बार ही रूही ने कहा था- दीदी का लहंगा मैं लुंगी क्योंकि आप तो सिर्फ  एक बार ही कोई कपड़ा पहनती हैं। शैली ने ख़ुशी से लाकर उसके हाथों में थमा दिया था लेकिन मम्मी ने मना कर दिया।
          रुवासी शैली सोचने लगी कि उसके सेल फोन के खो जाने पर पापा का दिया सस्ता सा सेल फोन भी अज्जू से और रूही से बर्दाश्त नहीं हुआ था। उसने बहाने बना कर उससे वापस मांग लिया था। ये भी नहीं सोचा था की दीदी इतनी रात गए, बिना जीजू के अकेले छोटे - छोटे बच्चों के साथ रह रही है। अगर कोई बात हो जाय तो? अज्जू और आदि मिलकर घर आने के सारे रास्ते बंद करवा दिए। उसने कितने झूठे आरोप भी लगाये। कितनी बेईज्जती की थी। कैसे गुस्से में शैली को घर छोड़ आना पड़ा था। वो बातें भी मन में जलने लगी कि शैली के कपड़ों से उन दोनों ही भाइयों को शर्म आती थी क्योंकि अब वो बहुत महंगे कपड़े जो नहीं पहनती थी। आज ये जानते हुए भी कि उसके पति विदेश में हैं, वो यहाँ बच्चों के साथ अकेली और जाते वक्त अज्जू से ही कहा था - अपनी दीदी का ख्याल रखना। तुम्हारे और माँ पापा के भरोसे ही ये निर्णय आसानी से ले लिया है। मैं इतना तो जानता ही हूँ कि उसे किसी की तो जरुरत नहीं होगी,लेकिन एक मोरल सपोर्ट जरुर चाहिए और वो तुम सब से ज्यादा। उसे किसी से भी नहीं मिल सकता। अज्जू तुमने क्या किया? मुझसे बातें करना ही बंद कर दिया? मेरे नन्हे से बेटे को देख कर मुंह मोड़ने लगे। हजारों बातें सागर की लहरों की तरह उठने और गिरने लगी? शैली बेजान बुत सी हो गई। समझ नहीं पा रही थी कि ये उसका ही सगा भाई है जो इस तरह की बात कर रहा है।
          शैली आज बरामदे में बिखरी हुई चीजों के बीच खुद को ही बिखरा महसूस करने लगी और सोचने पर विवश हो ही गई कि सच वो बहुत अकेली है। पिछले डेढ़ सालों से सब कुछ तो अकेली ही तो देख रही है। रूही के कदम पड़ते ही कहां खो गया उसके प्रति उसके अपने पापा का उसके अपने भाइयों का प्यार, विश्वास, निकटता। क्या दोष रूही का है? या पापा का भाइयों का नहीं...नहीं, ये सब दोष तो उसके अपने नसीब का है। शायद अब ज़ख्मों का आखिरी पड़ाव हो। शायद ईश्वर कुछ उसके भले की सोच कर ये आग उसके दिल में उसकी गृहस्थी में लगी हो, एक अजीब सा संतोष उसके हृदय में जगह बनाने लगा था और इसी विश्वास के सहारे वो खड़ी हुई और अपनी बची हुई गृहस्थी के समानों को समेटने लगी.....।

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