इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

'' अंकुर '' की दो गजलें

1
कर में फूल रूमाल लिये रोज चला वह आता है
मन में प्रति उछाल लिये रोज चला वह आता है।
देना मीत जवाब उसे अपनी आँख निगाहों से,
मन में मौज सवाल लिये रोज चला वह आता है।
अच्छा लगता मन को वह उस पर मन न्यौछावर जी
करनी, कोल, कमाल लिये रोज चला वह आता है।
करता मन की बातें वह आँखों से मनुहारें भी
जौबन, ज़ाम, जमाल लिये रोज चला वह आता है।
होगा भी बदलाव यहाँ लोग जमा हैं सड़कों पर
नारे, जोश, मशाल लिये रोज चला वह आता है।

2
काम नहीं जो करता कुछ उसका है मधुमास नहीं।
दुनियां को जो ठगता जी उस पर कुछ विश्वास नहीं।
मन में जिसके हिम्मत है पर्वत बौने मानो जी
मंजिल का वह मालिक है बनता यारो दास नहीं
रोना रोते रहते जी कर्म नहीं जो करते कुछ
कर्म जो सदा करते हैं उनको दुख कुछ खास नहीं।
मान लिया है दौलत से मुठ्ठी में सब लोग रहे,
ठोकर जग में खाते वे दौलत जिनके पास नहीं।
फूल खिले हैं बागों में मौसम बहुत सुहाना सा,
अंकुर वह ही दुखिया है जिसके मन उल्लास नहीं।

पता
हठीला भैरूजी की टेक
मण्डोला, वार्ड, बारा - 325205
मोबा. 09461295238

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