इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

'' अंकुर '' की दो गजलें

1
कर में फूल रूमाल लिये रोज चला वह आता है
मन में प्रति उछाल लिये रोज चला वह आता है।
देना मीत जवाब उसे अपनी आँख निगाहों से,
मन में मौज सवाल लिये रोज चला वह आता है।
अच्छा लगता मन को वह उस पर मन न्यौछावर जी
करनी, कोल, कमाल लिये रोज चला वह आता है।
करता मन की बातें वह आँखों से मनुहारें भी
जौबन, ज़ाम, जमाल लिये रोज चला वह आता है।
होगा भी बदलाव यहाँ लोग जमा हैं सड़कों पर
नारे, जोश, मशाल लिये रोज चला वह आता है।

2
काम नहीं जो करता कुछ उसका है मधुमास नहीं।
दुनियां को जो ठगता जी उस पर कुछ विश्वास नहीं।
मन में जिसके हिम्मत है पर्वत बौने मानो जी
मंजिल का वह मालिक है बनता यारो दास नहीं
रोना रोते रहते जी कर्म नहीं जो करते कुछ
कर्म जो सदा करते हैं उनको दुख कुछ खास नहीं।
मान लिया है दौलत से मुठ्ठी में सब लोग रहे,
ठोकर जग में खाते वे दौलत जिनके पास नहीं।
फूल खिले हैं बागों में मौसम बहुत सुहाना सा,
अंकुर वह ही दुखिया है जिसके मन उल्लास नहीं।

पता
हठीला भैरूजी की टेक
मण्डोला, वार्ड, बारा - 325205
मोबा. 09461295238

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