इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

ऐसी कोई चट्टान नहीं

विनय शरण सिंह

बूढ़े माँ . बाप का होता जहाँ सम्मान नहीं
जहाँ पर बेटियों के होंठों पे मुस्कान नहीँ

जिसकी दीवारों से लग के सिसकते हैं रिश्ते
वो किसी और का होगा ए मेरा मकान नहीं

हम तो रिश्तों को तौलते नहीं हैं पैसों से
ये मेरा घर है दोस्तो कोई दुकान नहीं

आओ मिल बैठ के फुरसत से बात करते हैं
कोई मसला नहीं है जिसका समाधान नहीं

अब के इस दौर में ख़ुश रह के बसर कर लेना
है तो मुश्किल नहीँ पर इतना भी आसन नहीं

करके देखिए तो मुहब्बत में बड़ी ताक़त है
जिसको पिघला न दे ऐसी कोई चट्टान नहीं

खैरागढ़
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