इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

रीती हुई

अनिल प्रभा कुमार

 परिचय  लेखिका अनिल प्रभा कुमार अमरीका में रहती है और विलियम पैट्रसन यूनिवर्सिटी, न्यू जर्सी में हिन्दी भाषा और साहित्य का प्राध्यापन कर रही है।  इनकी कुछ कहानियां   वर्तमान साहित्य के प्रवासी महाविशेषांक में छपी है। हंस,  कथादेश, अन्यथा,  शोध दिशा, हिन्दी चेतना और वर्तमान साहित्य पत्रिकाओं के अलावा, अभिव्यक्ति के कथा महोत्सव 2008 में इनकी  कहानी '' फिर से '' पुरस्कृत हुई है।

उसने चाय का तीसरा प्याला बना कर होठों से लगाया ।
'' मम्मी, तुम बहुत चाय पीती हो।'' एक नाराज़ झिड़की उभरी। उसने सिर घुमाया। कोई नहीं था।
     प्याला नीचे रख दिया। रेफरिजरेटर खोल कर कुछ ढूंढने लगी। सोचा कुछ खाने को बनाना चाहिए। कोई ताज़ी सब्ज़ी नहीं दिखी। चने के डिब्बे उठा लाई। खोल कर पकाने लगी तो  दादी की भूली - भटकी डांट याद आ गई। बड़े ताऊ जी के बेटे की शादी में उसने भी दूसरे बच्चों की तरह बाहर से गुज़रने वाले फेरी वाले से भुने चने ख़रीद लिए थे। शादी वाले घर में कोई भुने चने खाता है। घबरा कर चने उसने वहीं गिरा दिये थे। डिब्बे उठा कर उसने वहीं  फ्रीज में रख दिये।
     फ़ोन का चोंगा उठाया। डॉयल टोन तो ठीक ही आ रही है। कुछ देर यूं ही पकड़े रही फिर धीरे से रख दिया। उठ कर ऊपर आई। अल्मारी खोल कर साड़ियां देखने लगी। एक गुलाबी रंग की तंचुई की साड़ी पर नज़र टिक गई। खींच कर बाहर निकाल ली। साथ पहनने के लिए गहने, चूड़ियां सब इकटठे कर लिए। कुन्दन लगे कंगनों पर नज़र अटकी।
'' मम्मी, यह मैं अपनी शादी पर पहनूंगी। किसी और को मत देना।'' धीरे से उसने उन्हें उठाया। जैसे कोई चिड़िया के बच्चे को उठा रहा हो।
'' और किस को दूंगी भला। मन में आया। सहेज कर बाहर ही रख लिये।''
     साड़ी प्रैस करती जा रही थी। सलवटों की तरह जैसे मुचड़ी हुई यादों पर भी एक गीली गुनगुनी सी भाप तिर आई। परत पर परत उघड़ने लगीं। कैसे वह बीती रात गये तक यूं ही कपड़े प्रेस किया करती थी। डर जो लगता था उसे सोते हुए। अपॉर्टमेंट की दायीं ओर ही लिफ़्ट थी। कोई भी ऊपर.नीचे आता, झटका सा लगता। वह चौंकती। शायद लॉबी से कोई दरवाज़ा खोल कर अपॉर्टमेंट में घुस रहा है। वह अकेली सो नहीं पाती। बेनु भी जागती रहती। कहानियां सुनने को मचलती। जब हर रात कहानियां सुना - सुना कर वह थक गई तो उसने उन सभी कहानियों को अपनी आवाज़ में ही रिकार्ड कर लिया। बेनु साथ लगे पलंग पर लेट कर कहानियां सुनती। मानसी बिल्कुल साथ ही मेज़ सटा कर चुपचाप कपड़े प्रेस करती रहती। बेनु कहानियों के कल्पना.लोक में खो जाती। उसके चेहरे के भावों का उतार.चढ़ाव मानसी को मुग्ध कर देता। उसकी आंखे मुंद जाती तो कार्तिक घर लौटता।
     मानसी होठों पर उंगली रख कर इशारा करती - '' बस अभी सोयी है।''
     सुबह बेनु कार्तिक को देख कर चहक उठती । कार्तिक कभी उसे कंधे पर उठा कर दौड़ता, कभी हवा में उछालता, फिर बड़े धीरज से उसे बच्चों वाली कुर्सी पर बिठा कर चम्मच - चम्मच दलिया उसके मुंह में डालता। मानसी रसोई में ही लगी रहती। कार्तिक को खाना खिलाकर साथ के लिये भी दे देती। दोपहर को वह काम पर जाता तो फिर बचते वही मानसी और बेनु। और कभी गर्मियों का लंबा सा उबाऊ दिन और कभी सर्दियों का छोटा सा ठिठुरता दिन। पर रात हमेशा ही लम्बी अकेली और डरावनी होती।
     गर्मियां होतीं तो मानसी काम से फ़ारिग होकर बेनु को स्ट्रालर में डाल कर पार्क ले जाती, झूले देती। बेनु खिलखिला कर हंसती पर मानसी ऊबने लगती। शाम हो जाती, पार्क खाली होने लगता तो उसे घबराहट होती। वह जल्दी - जल्दी घर लौटती। कभी मॉल में ले जाती। बेनु को आइसक्रीम या प्रैटज़ल दिलवा देती। अजनबी लोगों की भीड़ में बिना किसी मक़सद के यूं ही स्ट्रॉलर ठेलते - ठेलते वह थकने लगती। अकेले घर लौटने का ख़्याल उसके क़दमों को चलाए रखता। स्टोर बंद हो जाते। वह लौटती और ध्यान आस - पास की आहटों पर ही रहता। सड़क पर ज़्यादा रोशनी नहीं थी, कभी - कभी कोई कार पास से गुज़र जाती । पैदल चलने वाला कोई.कोई ही होता। कोई आदमी उसे दूर से ही दिखता तो वह रास्ता बदल लेती । जल्दी  - जल्दी स्ट्रालर खींच कर अपनी अपॉर्टमेंट की इमारत में घुसती तो एक घुटन और अप्रिय सी गन्ध उसे घेर लेती। लिफ़्ट में वह हमेशा दम साधे खड़ी रहती। साथ खड़ा हर आदमी उसमें तनाव भर देता था। टेलीविज़न पर देखी सभी अपराधों की ख़बरें उसके दिमाग में भँवर की तरह घूमने लगतीं। जल्दी से दरवाज़ा खोल, अपॉर्टमेंट में घुस कर वह दोनो ताले और फिर अन्दर से  ज़ंज़ीर भी डाल देती। बेनु घर में घुसते ही रोना - चिल्लाना शुरु कर देती थी। वह उसके कपड़े बदलए कुछ खाने को देए बहलाने की कोशिश करती।
     कार्तिक का फ़ोन आता।
'' कहाँ थीं अब तक ''
- '' यूं ही मॉल तक गये थे।''
-'' कुछ ख़रीदा ''
- ''नहीं।''
- '' अमरीका में मां - बेटी ऐश कर रही हो।''
- ''किस स्वर्ग में लाकर तुमने मुझे पटक दिया है।''
- '' क्यों, तुम्हें रास नहीं आता।''
-'' नहीं, मुझे डर लगता है।''
- '' क्यों ''
- '' तुम साथ होते हो तो, तब नहीं लगता।''
- '' तो क्या नौकरी छोड़ दूं।''
वह निरुत्तर हो जाती।
     कोई - कोई घटना, कोई याद मौसम के साथ ही जुड़ जाती है या किसी खुशबू के साथ या फिर किसी चोट के साथ। उस दिन भी बफ़र् थम चुकी थी और सड़कों पर कारों और लोगों के चलने से कीचड़ सा हो गया। वह एक हाथ से बेनु का स्ट्रॉलर आगे करके धक्का दे रही थी और दूसरे हाथ से खाने. पीने के सामान से भरी रेहड़ी ; कार्ट को पीछे से घसीट रही थी। दोनों में संतुलन करना मुश्किल हो गया। बफ़र् पर पहिये धंस - धंस जाते। ठंड इतनी कि हाथ पैर दस्तानों के अन्दर भी सुन्न हो रहे थे। उसने  आस.पास मदद के लिये देखा, बस सड़क ही तो पार करनी है। किसी ने उसकी तरफ़ देखा तक नहीं। बच्चे को तो वह नहीं छोड़ सकती। धंस गई तो रेहड़ी ही छोड़ देगी। क्रॉसिग पर हरी बत्ती लाल होने जा रही थी। उसे लगा कि वह कहीं अध.बीच ही रुक गई तो ज़रूर दूसरी ओर से आती कोई गाड़ी उन दोनों को कुचलती हुई निकल जायेगी। उसने पूरा ज़ोर लगा करए स्ट्रॉलर और रेहड़ी का संतुलन बनाये हुए जल्दी से क़दम  उठाये। सड़क के दूसरे सिरे पर पहूंचते ही उसका पांव फिसला और वह ज़मीन पर थी और खाने.पीने के सामान की रेह्ड़ी उस पर। उसने मज़बूती से स्ट्रॉलर का पहिया थामे रखा। शायद किसी ने उस पर से रेहड़ी हटा दी। पूछा - क्या वह ठीक है। ''
-'' हाँ ।'' और '' शुक्रिया '' कह कर  वह जल्दी.जल्दी घर लौटी।
     घुटने, कोहनियां सब छिल गये थे। सकते की हालत में बिना कुछ किये चुपचाप फ़र्श पर बैठ गई। बेगाने मुल्क में अकेले होने की  भयावहता ने उसे घेर लिया। लगा जैसे किसी अंधेरे कुएं की तह में वह अकेली बैठी है। अपने प्रिय जनों से बहुत दूर। उसने दोनों बाहें उठा कर, दस ह्ज़ार मील दूर बैठी अपनी मां की ओर बढ़ा दीं। फिर ज़ोर - ज़ोर से फफक - फफक कर रो पड़ी। बहुत दिनों से रुका हुआ दुख बांध तोड़ कर बह आया। उसने रोकने की कोशिश भी नहीं की। स्ट्रॉलर से अभी तक बंधी बेनु के बिसूरने की आवाज़ से उसे होश आया। झट से आंसू पोंछ उसने बेनु को सीने से चिपटा लिया था।
     फ़ोन बजा तो वह जल्दी से लपकी। रीटा ग्रेवाल का फ़ोन था। उसने बच्चों की सहायता के लिये किये जाने वाले एक चैरिटी शो के आयोजन के बारे में कुछ कहा। मानसी कुछ उखड़ी सी थी।
- '' देखिये आपको तो ज़रूर सहयोग देना चाहिये। आप तो फ़्री हैं। कोई बच्चे नहीं, ज़िम्मेदारी भी नहीं।''
मानसी जवाब देने को हुई, तड़पी। फिर चुप हो गई।
     इस नये शहर में, इस नई ज़िन्दगी में, यहां किसी को क्या मालूम।
वह जल्दी से सीढ़ियां उतर आई। दरवाज़ा खोल कर डाक देखने गई। अभी नहीं आई थी। बाहर आकर इधर - उधर देखा। पता नहीं वह किसका इंतज़ार कर रही थी ।
कुनाल ने कहा था - '' देखो एक कार्ड तक नहीं भेजा।''
- कोई अपनी मां को कार्ड भेजता है।'' उसने पलट कर जवाब दिया।
     कुनाल बस मानसी की ओर देखते रहे। कितना कुछ कह गई वह आंखें।मानसी ने लौट कर कुनाल के कंधे पर सिर रख दिया।
- कैसे रहती होगी वह मेरे बिना।''
- जैसे तुम रह रही हो उसके बिना।'' बाहों में भर कर वह चुपचाप उसे सहलाते रहे।
     मानसी का रोयां - रोयां आज बेनु को याद कर रहा था । जब वह और कार्तिक अपॉर्टमेंट छोड़ कर बड़े घर में रहने लगे थे तब बेनु ने भी  नर्सरी स्कूल जाना शुरु कर दिया। कहानी सुनने की अब ज़िद नहीं करती थी पर पास आकर लेट जाने की ज़रूर करती।
मानसी खीजती।बस अब सो जाओ, सुबह स्कूल नहीं जाना।
     दबे पांव नीचे आकर वह रसोई में लग जाती। कार्तिक के काम का वक्त हमेशा अनिश्चित ही था। रात गये घर लौटते। कितनी रात गए, बस यही बदलता था। मानसी को इस नये घर में उतना डर नहीं लगता, पर अकेली सो नहीं पाती। कितने काम करने को होते थे। कभी कोई रहने आ रहा है। कभी किसी के यहां कुछ बना कर ले जाना होता। उसे दावतें देने का भी तो कितना शौक था और कार्तिक को उससे भी बढ़ कर। बस देखना यह होता था कि कार्तिक का कौन सा शनिवार ख़ाली होगा जिसमें वह सबको बुला सके। ज़ोर - शोर से वह लग जाती थी तैयारी में।
     दिन का आधा हिस्सा तो कार्तिक की ज़रूरतों को पूरा करने में ही निकल जाता। कार्तिक वक्त के बहुत पाबन्द थे। हर कमरे मेंए हर मेज़ पर घड़ी थि। यहां तक कि उन्होंने शॉवर के अन्दर भी घड़ी टांग दी। बस पांच मिनट का शॉवर!
- मुझसे नहीं होगा।'' मानसी ने हाथ झटक दिये।
     कार्तिक का गणित उसकी समझ से बाहर था। उन्हें आधा प्याला चाय चाहिये होती, फिर बीस सेकंड और माइक्रोवेव में गरम कर दो। चौथाई चम्मच चीनी, दस बूंद दूध। बेगल का आठवां हिस्सा, दोनों ओर से सिंका। तीन चौथाई चपाती, दो तिहाई कटोरी भर दाल! मानसी कभी नहीं समझ पाई। उसे हैरानी होती क्या कार्तिक को प्यार का अनुपात भी मालूम होगा। उन्हें सटीकता से मालूम था कि उन्हें क्या चाहिए। मानसी को क्या चाहिए इस बात को समझने की ज़िम्मेदारी उनकी नहीं थी, मानसी की खुद की थी।
     मानसी जीवन के प्रवाह मे पूरी गति से भागती जा रही थी। पूरी निष्ठा के साथ गृहस्थी, घर .परिवार में धंसी हुई। जो भी करती पूरी तरह डूब कर। सास ने कार्तिक को ताना दिया था।अपनी पसंद की ले तो आया है न। देख, यह तुझे भूखा मारेगी। इसे तो रोटी भी बनानी नहीं बनाती।
     बुत बनी मानसी रोने - रोने हो आई थी। बस एक इतनी सी बात पर  उसने चूल्हे पर ज़िन्दगी वार दी। जैसे उसने मोर्चा ले लिया अपनी अदृश्य सास से। पता नहीं क्या सिद्ध करके दिखाना चाहती थी। घंटों रसोई में खड़े होकर खाने बनाती। कार्तिक को खाने का शौक था, पर मानसी को रसोई में ज़्यादा काम करते देख कर नाराज़ होते। इसलिये वह बेनु के सोने के बाद ही अपने को रसोई में डुबो देती। उसने कितने जटिल व्यंजन सीख लिये थे। पनीर बनाती, मिठाईयां, नमकीन, अचार, चटनियां। बेनु के लिये अमरीकन खाना, उसके स्कूल की बेक. सेल के लिये कुकियां और केक। सौ - सौ लोगों की पार्टी के लिये वह अकेली रात - रात भर खड़ी रह कर व्यंजन तैयार करती।
     पता नहीं कब बेनु की कच्ची नींद खुलती। वह अपनी गुड़ियों के छापे वाली रजाई को घसीटती हुई मां के बिल्कुल पास आकर ज़मीन पर ही लेट जाती। मानसी का दिल भर आता। वह उसे उठा कर साथ लगे खाने वाले कमरे के क़ालीन पर डाल देती।
- मैं यहीं हूं, तेरे पास।'' मानसी आश्वासन देती।
बेनु अधखुली आंख से देखती। फिर चेतावनी देती - '' मुझे छोड़ कर मत जाना।''
- नहीं जाऊंगी।'' मानसी उसका माथा चूम लेती।
और अब...
     अब ख़ुद मुझे छोड़ कर चली गई। मानसी का मन हहरा उठा। रोयेगी नहीं वह। उसने जल्दी से पूरा गिलास भर पानी पी लिया।
     फ़ोन बजा तो उसने पहली ही घंटी पर उठा लिया।
- किस के फ़ोन का इंतज़ार कर रही हो।'' दूसरी ओर कुनाल थे।
- नहीं, यूं ही।''
- मालूम है न, शाम को शादी पर जाना है।''
- हाँ।''
- बस तैयार रहना। याद दिलवाने के लिये फ़ोन किया था।''
     आज मानसी का मन अपने बस में नहीं। आज वह चाहती है कि कुछ अप्रत्याशित घटित हो जाए। कहीं अतीत मिट जाए, सब कुछ नए सिरे से लिखा जाए। बस आज कुछ असंभव, संभव हो जाए। कुनाल ने बताया तो था कि शाम को उनके बॉस की बेटी की शादी पर जाना है, तैयार रहे। पर उसका मन तो सारे तर्क छोड़ कर सोचता है। आज कुछ नाटकीय ही हो जाए। शायद कुनाल उसे एकदम चकित करना चाह रहे हों। मानसी का मन जहाँ जिसकी शादी में होने का है, शायद वह वहीं कहीं उसे ले जाएं।
     जब भी उसने कुछ सहारा चाहाए कुनाल को हमेशा साथ खड़े पाया। मां भारत से पहली बार अमरीका आ रही थीं और कार्तिक को काम से छुट्टी नहीं मिल पाई। मानसी ने यहां आकर नई.नई गाड़ी चलानी  सीखी थी। वह अपने को तोलती रही, चालीस मील दूर था, कैनेडी एयरपोर्ट। भूल - भुलैया वाले हाई - वे। हिम्मत नहीं पड़ रही थी।
- कुनाल के साथ चली जाना।'' कार्तिक ने समस्या सुलझा दी।
     कुनाल के साथ आगे की सीट पर बैठना उसे बड़ा अटपटा - सा लग रहा था। भारत में कभी किसी पुरुष के साथ यूं आगे बैठती तो अफ़वाहें उड़ जातीं। मां को लेने जाना ज़रूरी था। फिर एक बार और शालू और राज के घर उनके बच्चे के पहले जन्मदिन की पार्टी थी। मानसी तैयार होकर प्रतीक्षा करती रही। कार्तिक काम से निकल नहीं पा रहे थेए अचानक ही कोई बहुत ज़रूरी काम आ गया।
     मानसी झुंझला गई। नफ़रत है मुझे तुम्हारी नौकरी से। कहीं कोई प्रोग्राम नहीं बन सकता। हां कह कर भी हम नहीं पहुंचेंगे।
     कार्तिक ने बड़े प्यार से समझाते हुए कहा - देखो, मेरी तो मजबूरी है। तुम चली जाओ। हमारी हाज़िरी लग जाएगी।''
- अकेली ''
- कुनाल को ले जाओ।''
- नहीं।''
- अच्छा वह तुम्हें सिर्फ छोड़ आएगा। लौटते वक्त कोई न कोई मिल ही जाएगा।''
- कहा न नहीं।'' उसने फ़ोन रख दिया। कपड़े बदल डाले। समझ में नहीं आ रहा था कि ग़ुस्सा करे या रोये।
     कार्तिक को लम्बे - लम्बे प्रोजैक्टस पर न्यूयार्क से बाहर जाना पड़ता तो कुनाल को आदेश दे जाते - पीछे मानसी को फ़ोन करते रहना, अगर उसे किसी चीज़ की ज़रूरत पड़े तो।''
     कुनाल फ़ोन करते भी थे। पर मानसी विनम्रता से पूछने के लिए धन्यवाद कह देती। - ज़रूरत पड़ी तो आपको ही कहूंगी और कौन है।'' पर कहती कभी नहीं थी।
     दिन तो शॉपिंग करने में, बेनु को नर्सरी स्कूल भेजने में, वापिस लाने में, होमवर्क करवाने में बीत जाता। शामें भारी होती थीं और रातें उससे भी ज़्यादा। उसने उनका भी हल ढूंढ लिया था। वह हर वक्त अपनी मन:स्थिति के अनुकूल संगीत लगा कर खाने बनाती रहती। खाना नहीं बनाना होता तो कपड़े सिलती रहती, बेनु के कपड़े, अपने कपड़े, मित्रों के बच्चों के लिए उपहार। फिर सर्दियों में बुनाई का दौर चलता। कोई अच्छी सी किताब हाथ आ जाती  तो दो तीन रातों में वह भी ख़त्म हो जाती।
     कहीं भी, कोई भी नौकरी कर लेने की बात कितनी बार उठाई थी। कार्तिक एक ही तर्क से काट देते - मैं तो तुम्हारी मदद नहीं कर पाऊंगा। बेनु को कौन देखेगा।''
     हिम्मत मानसी की भी नहीं पड़ती थी। नौकरी शुरु कर दी तो बेनु तो रुलेगी हीए साथ ही जो थोड़ा सा समय कार्तिक के साथ मिलता है वह भी दुर्लभ हो जाएगा। स्थिति को स्वीकार करए उसने अपने आस - पास एक कामों का जाल सा बुन लिया था।मानसी दिन.रात उसी में बन्द और व्यस्त रहती। रातें उसकी थीं और दिन दुनियादारी का और बेनु का।
     बेनु को तेज़ बुखार चढ़ा था। मानसी को और किसी बात की सुध नहीं। जब भी बच्ची बीमार होती तो बुरी - बुरी आशंकाओं से उसका दिल दहल जाता। उसने बेनु को सिर से पैर तक अच्छी तरह से कपड़ों से ढक दिया। फिर ऊपर से छोटा सा कम्बल भी ओढ़ा करए कार की बच्चे की सीट पर बैठाया तो वह बुरी तरह से रोने लगी। मां के सीने ने अलग नहीं होना चाहती थी। कार्तिक कहते. लॉलीपाप दे दिया करो। हर समस्या लॉलीपाप देने से नहीं हल होती। उसने बेबसी से बच्ची को देखा।
- बस बेटे, अभी डॉक्टर के पास चलते हैं। वह दवाई देगा,फिर आप ठीक हो जाएंगे।''
- नहीं, वह बाहें फैला - फैला कर मचलने लगी।''
     मानसी ने गाड़ी को सड़क पर निकाला। आकाश में काले बादल छाये थे। बर्फ और बारिश की इतनी तेज़ बौछार कि दूर तक कुछ दिखायी नहीं पड़ रहा था।
- बेनु चुप कर जाए मम्मी नर्वस हो रही है।''
     पता नहीं उसे कुछ समझ आया या नहीं, बेनु चुप हो गई। मानसी ने कार के आईने में, बेनु के बुखार की तपिश से लाल हो रहे मुंह को देखा। वह निढाल हो रही थी।
     किसी तरह मन ही मन प्रार्थना करती मानसी डॉक्टर के दफ़्तर तक पहुंची। स्ट्रैप - थ्रोट निकला। डॉक्टर ने पर्ची दे दी। कहा - फ़ार्मेसी से दवाई ले लो।''
उसने फिर बेनु को गोदी मे उठाया। कार चलाकर फ़ार्मेसी तक पहुंची। सफ़ेद कोट पहने हुए आदमी ने उसे वयस्तता से देखा। दो घंटे बाद आकर दवा ले जाना। उसने बहुत ठंडेपन से कहा - देखिए, बच्ची को बहुत तेज़ बुखार है। मैं दुबारा कैसे आ पाऊंगी। प्लीज़ अभी दे दीजिए।'' वह कातर हो उठी।
- यह दूसरे लोगों के साथ बेइन्साफ़ी होगी, सॉरी।'' कह कर वह आदमी फिर से अपने काम में लग गया।
निराश होकर मानसी फ़ार्मेसी से बाहर निकल आई।
     हवा बहुत तेज़ थी। बर्फ और बारिश मुंह पर चोट कर रहे थे। बेनु ने उसे दोनों बाहों से जकड़ा हुआ था  और वह किसी तरह बच्ची के भार को ही संतुलन करके उठा पा रही थी। छाता कैसे खोले, बच्ची भीग गई तो कहीं न्योमोनिया न हो जाए।''
- कार्तिक, कहां मुझे इन मुसीबतों में छोड़ कर चले जाते हो।''  वह मन ही मन रो पड़ी।
     बर्फ मिली बारिश के थमने के कोई आसार न देख मानसी ने अपने गर्म कोट के बटन खोल दिए। बेनु को अपने कोट के अन्दर लिपटा कर, उसने ऊपर से बच्ची का छोटा सा कंबल ओढ़ लिया ताकि बेनु ढंक गाए। मानसी अपने चेहरे पर रेत जैसी बर्फ की मार झेल गई। घर लौट कर जल्दी - जल्दी बेनु को सुखाया। फ़ोन की घंटी बजी।
- कहां थीं आप इस मौसम में।'' कुनाल थे।
- बेनु को बहुत बुखार है।'' बस इतना ही कह पाई।
- तो, दवाई दी''
- प्रिस्क्रीपशन दे आई हूं। उन्होंने बोला है कि दवाई दो घंटे बाद मिलेगी।''
कुनाल चुप हो गए। फिर बोले - कौन सी फ़ार्मेसी है''
मानसी ने नाम पता बता दिया।
- अच्छा, मैं लेकर आता हूं।''
- आप कैसे लाएंगे, एक घंटा तो आपको यहां पहुंचने में ही लगेगा।''
- तुम चिन्ता नहीं करो।''
इस बार मानसी चुप हो गई।
      कुनाल ने दवाई मेज़ पर रख दी। साथ ही एक लिफ़ाफ़े की ओर इशारा कर दिया।
- तुम्हारे लिये है। सोचा, बीमार बच्चे की तीमारदारी के बीच तुम्हें अपने खाने की होश कहां होगी।''
मानसी ने पहली बार कुनाल को कोई अपना समझ कर देखा। कार्तिक के दोस्त के रूप में नहीं।
****.
     पता नहीं कब और कैसे हुआ कि कुनाल के बिना लगता था कोई काम ही नहीं होगा। कार्तिक से उसे कोई शिकायत तो नहीं थी। कोई बुराई  भी नहीं थी उनमें। एक अच्छे पिता थे, पति थे। सारे जीवन के सुख दिये हुए थे। बस, जब कभी वह उन्हें घबरा के पुकारना चाहती वह कहीं और होते। कभी शरीर से और कभी मन से भी। कार्तिक ने अपने परिवार के कुछ सदस्यों को भी अमरीका में बुला लिया था। जिनको नहीं बुला पाए वह उनको बुलाने के चक्करों में व्यस्त रहते। उनकी समस्याओं को सुलझाना उनका नैतिक धर्म था। उनकी आर्थिक समस्याओं से वह कैसे मुंह मोड़ लें। जिन्हें बुलाया था उन्हें  भी तो  अपने पांव पर खड़े करना था न। नौकरी का पूरा दबाव तो था ही घर को ठीक - ठाक करने और बगीचे की घास काटने जैसे काम भी तो उन्हीं को करने होते थे।
     बेनु ने स्कूल के कार्यकम में नृत्य करना था। मानसी ने अकेले मे जाकर थोड़े ज़ोर से कहा - आप  नहीं जाएंगे तो बेनु को दुख होगा।''
     कार्तिक माथे पर हाथ धरे सोचते रहे । '' देखो, इसी हफ़्ते टैक्स - रिटर्न भरनी है। अगले कार्यक्रम में ज़रूर जाऊंगा। छुट्टी ले लूंगा। आज तुम चली जाओ।''
     मानसी ग़ुस्से से तमक कर उठ आई। सीधे कुनाल को फ़ोन किया - बेनु के स्कूल में आज डांस का प्रोग्राम है। आ सकते हो।''
- अभी हाज़िर हुआ।''
- तुम्हें टैक्स - रिटर्न नहीं भरनी।''
- अकेला आदमी हूं। सीधा - सादा काम था। कब की भेज भी दी।''
     बेनु भरतनाट्यम की पूरी वेश - भूषा में तैयार होकर, बड़ी - बड़ी  काजल लगी आंखें से भाव दर्शाती, नाचती रही, मोहती रही।
- आपकी बेटी बड़ी सुन्दर है ।'' किसी ने आकर कुनाल से कहा।
- धन्यवाद '' कह कर वह सहजता से मुस्करा। मानसी का चेहरा कानों तक सुर्ख हो गया। उसने झेंप कर आंखे दूसरी ओर फेर लीं।
     कुनाल कैसे इतनी सहजता से बेनु के इशारों पर नाचते हैं। देख कर मानसी को हैरानगी भी होती पर कहीं अच्छा भी लगता। बेनु को स्कीइंग के लिए जाना है। वह सीधे कुनाल को फ़ोन करती। समर .कैंप जाना है।  अच्छा चलो। हैरिसबर्ग में स्कूली संपादकों की कार्यशाला में भाग लेना है। मानसी के साथ कुनाल भी उसे छोड़ने चल पड़ते।
- तीन - चार घंटे का सफ़र है। लौटते वक्त अकेला रास्ता बहुत लम्बा लगेगा।'' कुनाल ने स्वयं ही कारण भी बता दिया।
     मानसी ने भरपूर नज़रों से उन्हें  देखा। जैसे कहना चाह रही हो - सच कुनाल, तुम साथ हो तो कोई भी लंबा रास्ता कभी अकेला नहीं लगा।''
पूछा इतना ही  - कुनाल, तुम शादी क्यों नहीं करते।''
- क्यों''
- अकेला नहीं महसूस करते।''
- हो सकता है शादी के बाद भी इन्सान अकेला ही महसूस करे।''
     वह चुप रही। उसके दिमाग़ में बहुत से सवाल खदबदाते रहे। बुलबुलों की तरह उठते हैं ये सवाल उसके मानस में, वह भी सिर्फ रात को। अकेली  वह बिस्तर में लेटी रहती है, झूझती रहती है इन सवालों से। जिनके जवाब अंधेरे में कहीं गुम हो गए लगते हैं। अकेली वह बिस्तर में लेटी रहती है, सो नहीं पाती। दांयी ओर बांह बढ़ा कर छूती है । ख़ाली बिस्तर। तो अभी भी कार्तिक नहीं लौटे। आशंका से मन घबराता है। कहीं कोई छोटी सी आवाज़ भी आती है तो डर जाती है। फिर जब छू लेती है कार्तिक को तो आश्वस्त हो जाती है। उसके बाद वह ऐसी गहरी नींद में सोती कि कर्तिक उसे झकझोर कर उठाते - बेनु को स्कूल नहीं भेजना।''
वह थके मन से उठती। हमेशा थकी रहती।
- कहीं बाहर चलें, फ़िल्म देखने।'' मानसी प्रस्ताव रखती।
     कार्तिक को शौक ही नहीं इन बातों का। उन्हें बगीचे में काम करने का शौक है। मानसी को ऐसा कोई शौक नहीं जहां शरीर थके।
     उधर लगता था कि कुनाल के अपने कोई शौक़ कभी रहे ही नहीं। जो मानसी के शौक हैं , वही कुनाल के भी हैं। कार का लम्बा सफ़र दोनों चुप्प। अपने - अपने मन के रागों में डूबे हुए। अंधेरा तिर आया। सड़क संकरी होती गई। दांये ऊंचे पहाड़ और बांयी ओर भयानक शोर करता नदी का प्रवाह। सड़क पर बड़ी जल्दी - जल्दी घुमाव आ रहे थे । अचानक दूसरी ओर से आते ट्रक की रोशनी कुनाल को अंधा कर गई। संतुलन खोकर गाड़ी बीच की विभाजन - रेखा से जा टकराई। गाड़ी अपने.आप पूरे ज़ोर से घूम गई।
- कुनाल '' मानसी पूरे ज़ोर से चीखी। दोनो बाहों से उसने कुनाल को जकड़ लिया। कुनाल ने जिस दृष्टि से उसे देखा मानसी बस वहीं की वहीं, उसी क्षण में सिमट  गई। गाड़ी अपने - आप रुक गई। कुनाल ने अपने को संभाला। गाड़ी को थोड़ा पीछे किया और फिर धीरे - धीरे आगे बढ़ना शुरु कर दिया।
     मानसी सिहर गई। उस पल लगा था जैसे वह जीवन का आखिरी पल हो। उस आख़िरी घड़ी में न उसे बेनु की याद आई, न कार्तिक की और न ख़ुद की ही। ज़ुबान से एक ही नाम निकला था - कुनाल का। यह मौत से सामना हुआ था, या एक सच से।
     मानसी जैसे किसी और ही शक्ति के वशीभूत थी। बस वह एक क्षण, वह एक चीख़ और वह एक दृष्टि। सब कुछ बदल गया। मानसी बदल गई।
***
     बेनु कॉलेज के दाख़िले के लिये शहर से बाहर गई हुई थी। उस सप्ताहंत को जब कर्तिक लौटे तो मानसी हमेशा की तरह कपड़े नहीं सिलती रही।  चुपचाप पास आकर लेट गई। उन्हें आश्चर्य हुआ। बहुत कम मौके ऐसे होते थे जब वे यूं साथ.साथ पूरी रात भर रहे हों। आज मानसी ख़ुद ही आकर उनके पास लेट गई थी। वह साथ की मेज़ पर रखे लैंप को बंद करने लगे तो मानसी ने टोक दिया।
- आज रोशनी नहीं बुझाओ, आपसे कुछ बात करनी है।''
- मुझे लगता है।'' बात अधूरी छोड़ कर वह रुक गई। शब्दों को तोलती रही, जैसे किसी पहाड़ की चोटी से नीचे गहरे समुंन्द्र में छलांग लगाने से पहले हिम्मत इकटठी कर रही हो।
- मैं कुनाल से प्यार करती हूं।'' आवाज़ कहीं गहरी खाई से ही आई थी।
     एक - एक शब्द दहकते हुए कोयले की तरह कार्तिक के सीने को दाग़ गया। उन्होंने बड़ी कातरता के साथ मानसी को देखा।
- मैं आपसे भी....।'' बाक़ी के शब्द कह न पाई। मानसी ने अपना हाथ उनकी बांह पर रख दिया। कार्तिक विद्रूप से मुस्कराए। उन्होंने हाथ हटा कर लैंप बुझा दिया। एकदम सन्नाटा छा गया।
     बाहर की रोशनी भी पिघल कर, एक कालिख़ बन कर अन्धेरे में समा गई। बस एक थमा हुआ धुंध का गुबार था। दोनों की सांसें ऐसे चल रही थीं जैसे बहुत ऊंची तनी हुई रस्सी पर डर - डर कर क़दम रखती हों। दोनों जने आंखे खोले इस तने हुए, चुप्पी के कसे चेहरे की बोझिलता को झेलते रहे। कार्तिक उठ कर बाहर चले गए। मानसी यूं ही शिला सी पड़ी रही।
     अगली सुबह कार्तिक घर पर नहीं थे। मानसी और अकेली पड़ गई पर अब उस दिन के बाद से मन अकेला नहीं था। वह रीत गई थी अपने को बांटते - बांटते। जब उसी के पास कोई प्यार की बूंद नहीं बची तो किसी को क्या देगी और कैसे देगी। कुनाल भरते थे उसे। वहीं चली गई उनके पास। उसने अपने को पूरा समर्पित कर दिया कुनाल को।
- ऐसे कब तक चलेगा।'' कुनाल पूछते।
- मैं कुछ नहीं जानती।''
- कार्तिक क्या कहते हैं।''
- कुछ नहीं। वह कैलिफ़ोर्निया में बदली करवाने जा रहे हैं।''
- और बेनु।''
- मैं उसके बिना नहीं रह पाऊंगी।''
      बेनु सब कुछ समझती है। सयानी हो गई है न। कुनाल कभी आ जाते तो वह मुंह दूसरी ओर करके बाहर निकल जाती। कुनाल को क्षोभ होता। मानसी से कुनाल का अपमान सहा नहीं जाता। - बेनु, तू ऐसा क्यों करती है।''
- वही सवाल मैं पूछना चाहती हूं। आप ऐसा क्यों कर रही हैं।''
- क्या।''
- पहले तलाक़ ले लो डैडी से। फिर जो मर्जी आए करते रहना।''
- बेनु ।'' मानसी कातर हो गई।
     उसने कुनाल को आने से मना कर दिया। ख़ुद भी नहीं गई मिलने। बेनु ने अपने को काट लिया मां से। कार्तिक घर में आते तो दोनों बाप - बेटी आपस में बातें करते। मानसी पास से गुज़रती तो बेनु उठ कर दरवाज़ा बन्द कर लेती।
     कट गई मानसी सबसे और कुनाल को उसने ख़ुद काट कर रख दिया। रीता - रीता मन अब कहां लगा। कोई उससे बात नहीं करता, किसी को अब उसकी ज़रूरत नहीं। काटे जाने की पीड़ा उससे बर्दाश्त नहीं हो पाती। तड़प कर उसने कुनाल को फ़ोन कर ही दिया। वह घर पर थे। रक्तचाप बहुत बढ़ा हुआ था। मानसी रुक न सकी।
- क्यूं झुठलाती हो अपने को।'' कुनाल ने कहा। - क्यूं सताती हो अपने को और मुझे भी मुक्त कर लो अपने को। किन क़ानूनी आदेशों की प्रतीक्षा कर रही हो।'' वह कहते गये।
मानसी ने कुनाल के तपे हुए चेहरे को बाहों में भर लिया। उनकी चढ़ी हुई आंखों को चूम कर बोली - लौटती हूं।''
***
- बेनु, मेरे साथ रहोगी न।'' मानसी आश्वस्त होना चाहती थी।
     बेनु ने धिक्कारती नज़रों के साथ देखा। उसकी आंखों में आंसू थे जिनमें चोट थी अपना घर टूट जाने की। आक्रोश था पिता के साथ छल होने का और पीड़ा थी मां के छिन जाने की। और  इन सबका कारण थी सिर्फ मानसी।
- नहीं, तुमने कभी मेरे बारे में सोचा कि मुझ पर क्या बीतेगी। क्या तुम चाहती हो कि मैं भी तुम्हारी तरह डैडी को छोड़ दूं।''
     मानसी बेनु को क्या कहे। क्या कह कर समझाए। जब उड़ते विमान में ख़तरा होता है तब अगर मां अपने ही चेहरे पर  पहले ऑक्सीज़न की नक़ाब नहीं पहनेगी तो बच्चे को बचाएगी कैसे। वह सिर्फ अपनी भीतरी औरत को बचाना चाह रही है। यह उसकी जीने की छटपटाहट है, स्वार्थ नहीं।
- बेनु, कोई भी औरत शौकिया अपना घर नहीं तोड़ती। शायद कभी ख़ुद ही समझ सकोगी कि मां और पत्नी से पहले मैं एक औरत हूं, रीती हुई।
     मानसी ने काग़ज़ पर ह्स्ताक्षर कर दिए - दो बार। एक बार कार्तिक से सम्बन्ध - विच्छेद करने के लिए और दूसरी बार अपने नाम के साथ कुनाल का नाम जोड़ने के लिए। फिर हमेशा के लिए  कुनाल के पास लौट आई थी। उसकी बेनु चली गई अपने डैडी के साथ। आज उसकी शादी है, यह ख़बर भी मानसी तक पहुंच चुकी थी। अभी तक कोई फ़ोन नहीं, कोई कार्ड भी नहीं आया। वह आदर्श पत्नी नहीं बन सकी तो इसका मतलब यह तो नहीं कि उसके मां होने में भी कोई कमी रह गई। मानसी के आंसू छलछला आए।
- तुम तैयार भी नहीं हुईं अभी तक।'' कुनाल आ गए थे।
- बस, अभी आती हूं।''
     तैयार होने लगी तो फिर से मन में एक आशा की किरण उठने लगी। कुनाल हमेशा उसे चौंकाने वाली बातें करते हैं। मानसी को एक सुखद आश्चर्य देना चाहते हैं। कहीं वह उसे बहाने से बेनु के विवाह में तो नहीं ले जा रहे।''
     मन ज़ोर - ज़ोर से धड़कने लगा। अगर ऐसा हो तो एकदम फ़िल्मी कहानी जैसा अंत होगा। क़ाश, आज यही हो जाए!
     वह जल्दी - जल्दी तैयार हुई। कुछ सोच कर कंगन भी पहन लिए। तैयार होकर नीचे आई तो कुनाल मुग्ध होकर देखते रह गए।
- अरे, तुम्हारा तो काया - पलट हो गया। कहां आंसू लिए बैठी थी और कहां लगता है कि ... ।'
- क्या लगता है।''
- कुछ नहीं।''
     रास्ता भर कुनाल शांत थे और मानसी के मन में तूफ़ान घुमड़ रहा था। वह बार - बार कनखियों से कुनाल को देखती। चेहरा पढ़ने की कोशिश करती रही पर हर बार असफल हो जाती। कुनाल गम्भीर, निर्विकार बैठे,  कार के स्टीयरिंग व्हील को दोनों हाथों से थामे, सड़क पर ही नज़रें टिकाए चुपचाप गाड़ी चलाते रहे।
     वह मानसी के मन की बात जानते हैं। बिना मुंह फेरे ही उन्होंने अपना दायां हाथ मानसी की ओर बढ़ा दिया। मानसी ने दोनों हाथों से उसे जकड़ लिया। बिन बोले ही वह बहुत कुछ बोल गई। विवाह वाले घर तक पहुंचने तक दोनों यूं ही बैठे रहे। कुनाल ने दरवाज़ा खोल कर मानसी को हाथ का सहारा दिया।
     दोनों मंच की ओर बढ़ रहे थे। मेहमानों की ओर मानसी की नज़र ही नहीं उठी। वह दूर खड़ी, लाल साड़ी में लिपटी दुल्हन को ही देखे जा रही थी। वही लम्बी पतली देह, गोरा गोल सा मुख झीने से लाल दुपट्टे से ढंका हुआ। कुनाल पता नहीं कब पीछे छूट गए। मानसी जैसे नींद में ही चलते - चलते पास पहुंच गई।
बिल्कुल बेनु जैसी, पर बेनु नहीं।
     बेनु को क्या मालूम होगा कि इस व़क्त, उसकी एक झलक देखने के लिए उसकी मां पर क्या बीत रही होगी। जी चाहा, कंगन इसी दुल्हन को पहना दे।
- मां, मेरे कंगन हैं किसी और को मत देना ।'' कंगनों तक पहुंचा हुआ हाथ रुक गया।
     मानसी ने अपनी भावुकता को क़ाबू में रख कर दुल्हन के सिर पर प्यार से हाथ रख दिया। दुल्हन में अपनी बेनु को टकटकी लगा कर देखती रही। वधू ने असहज होकर मानसी को देखा। फिर धीरे से उसका हाथ अपने सिर से सरका कर मुंह फेर लिया।
     मानसी हॉल से बाहर निकल कर लगभग भागने लगी। उसे इस समय एकांत की बहुत सख़्त ज़रूरत थी।

हिन्‍दी भाषा और साहित्‍य विभाग
विलियम पैट्रसन यूनिवर्सिटी, 
न्यू जर्सी, अमेरिका

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