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शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

और बारिस होने लगी

सुरेश सर्वेद

     एक गांव में एक साधु आया। उसने घोषणा की कि आगामी दस वर्षों तक पानी नहीं गिरेगा। क्षेत्र में सूखा रहेगा। पानी नहीं गिरने से फसल नहीं होगी। ग्रामीण सकते में आ गये। वास्तव में बरसात के दिन होने के बाद भी पानी नहीं गिर रहा था। ग्रामीणों ने अपना हल अपने घर में ही रख दिया। और रोजी -  रोटी के लिए कहीं अन्यत्र जाने की योजना बनाने लगे।
     एक किसान का बच्चा कागज का नाव बनाने लगा। बच्चे को कागज का नाव बनाते देख किसान ने कहा - बेटा, साधु ने कहा है, दस वर्षों तक पानी नहीं गिरेगा।  और लक्षण भी यही दिख रहा है। जब पानी नहीं गिरेगा तो यह नाव बनाकर क्या करेगा।
     किसान के बच्चा ने कहा -  पिता जी, साधु और आपका कहना उचित है या अनुचित मैं नहीं जानता। पर याद करें, दस वर्ष की अवधि कितनी लम्बी होगी। इतने दिनों तक  यदि मैंने कागज का नाव  नहीं बनाया तो मैं नाव बनाना ही भूल जाऊंगा।
     किसान गंभीर हो गया।  उसने सोचा - लड़का ठीक कहता है। वास्तव में दस वर्ष लम्बा समय होता है। इस अवधि में मैंने  हल नहीं चलाया तो मैं भी तो हल चलाना भूल जाऊंगा।
      इस विचार के साथ उस किसान ने घर में रखे हल को निकाला। बैल हल लेकर खेत की ओर जाने लगा। ग्रामीणों ने देखा। उसे पागल कहने लगे। उस किसान ने कहा - जरा सोचो, साधु ने दस वर्ष तक बारिस नहीं होने की बात कही है। इस अवधि में यदि हम कृषि कार्य छोड़ दिए तो हम कृषि कार्य ही भूल जायेंगे। ग्रामीणों की भी ज्ञानचक्षु जाग उठी। वे सोचने लगे। अंत में निर्णय हुआ - पानी गिरे या न गिरे, हमें अपना काम करना चाहिए।
     एक - एक कर गांव के किसान अपनी खेत की ओर हल बैल लेकर जाने लगे।
     किसानों को खेत की ओर जाते देख बादल ने सोचा में भी सोच जागृत हुई - वास्तव में दस वर्ष का समय लम्बा होता है। इस अवधि में यदि मैं घुमड़ना भूल गया तो? बदली छाने लगी। बिजली ने सोचा - यदि मैं चमकने भूल गयी तो? बिजली चमकने लगी। गर्जना ने सोचा यदि मैं गरजना भूल गया तो? वह गरजने लगा। वर्षा ने सोचा यदि मैं बरसना भूल गयी तो? और जोर से बारिस होने लगी। किसान वर्षा होते देख खुशी से नाच उठे।

ममता नगर, गली नं. 5, एकता चौंक
राजनांदगांव ( छत्‍तीसगढ़ )

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