इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

जितेन्‍द्र सुकुमार की तीन गजलें

(1)

मत करो तकरार की बातें
है ये सब बेकार की बातें
नई दिशा से शुरु कर बंदे
भूल जाओं इतवार की बातें
उजड़ा पल संवर जाये कहीं
जबाँ पर रखों श्रृंगार की बातें
अभी छोटा है डर जायेगा वो
मत करो अंधकार की बातें
बंद करें नफरत का किस्सा
आओं करें प्यार की बातें
मिशाल छोड़ जाओं कलम
लोग करें '' सुकुमार '' की बातें
( 2 )

तेज़ हवाओं का डर नहीं है
अच्छा है, मेरा कोई घर नहीं है
थाम परवाज़, ज़मीं पे आना है
शुक्र है, मेरा कोई पर नहीं है
वो हासीन आलम को क्या कहें
मेरी नजर अब मेरी नज़र नहीं है
हर शख्स में समाया है अक्स
ढूँढ के बताओ वो किधर नहीं है
लोग कहते है मैं बूढ़ा हो गया
इश्‍क की मेरी उमर नहीं है
( 3)

इतनी दूर चला कि कहीं रुका नहीं
रास्ता खुद तफ्तीश की पूछा नहीं
राह में तूफॉ भी, ऑधी भी आयी
वक्‍त बेवक्‍त कभी मैं टूटा नहीं
माना तुम्हें यकीन नहीं मुझ पे
इसका मतलब मैं झूठा नहीं
रोटी की फिकर न किसी शै की
मैं औरों की तरह भूखा नहीं
नाराज़ हुआ भी तो खुद की बातों से
औरों से यारो कभी कहीं रुठा नहीं

पता
उदय - आशियाना, 
चौबे बाँधा (राजिम) जिला - गरियाबंद (छ.ग.)

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