इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

जितेन्‍द्र सुकुमार की तीन गजलें

(1)

मत करो तकरार की बातें
है ये सब बेकार की बातें
नई दिशा से शुरु कर बंदे
भूल जाओं इतवार की बातें
उजड़ा पल संवर जाये कहीं
जबाँ पर रखों श्रृंगार की बातें
अभी छोटा है डर जायेगा वो
मत करो अंधकार की बातें
बंद करें नफरत का किस्सा
आओं करें प्यार की बातें
मिशाल छोड़ जाओं कलम
लोग करें '' सुकुमार '' की बातें
( 2 )

तेज़ हवाओं का डर नहीं है
अच्छा है, मेरा कोई घर नहीं है
थाम परवाज़, ज़मीं पे आना है
शुक्र है, मेरा कोई पर नहीं है
वो हासीन आलम को क्या कहें
मेरी नजर अब मेरी नज़र नहीं है
हर शख्स में समाया है अक्स
ढूँढ के बताओ वो किधर नहीं है
लोग कहते है मैं बूढ़ा हो गया
इश्‍क की मेरी उमर नहीं है
( 3)

इतनी दूर चला कि कहीं रुका नहीं
रास्ता खुद तफ्तीश की पूछा नहीं
राह में तूफॉ भी, ऑधी भी आयी
वक्‍त बेवक्‍त कभी मैं टूटा नहीं
माना तुम्हें यकीन नहीं मुझ पे
इसका मतलब मैं झूठा नहीं
रोटी की फिकर न किसी शै की
मैं औरों की तरह भूखा नहीं
नाराज़ हुआ भी तो खुद की बातों से
औरों से यारो कभी कहीं रुठा नहीं

पता
उदय - आशियाना, 
चौबे बाँधा (राजिम) जिला - गरियाबंद (छ.ग.)

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