इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

बालकृष्‍ण गुप्‍ता ' गुरु ' की छह लघुकथाएं

सोच
-'' आ गए बेटा? '' चंदन लगाए, एक ऊँची तोंद वाले जनेऊधारी ने बेटे से पूछा।
- '' हाँ पिताजी। ''
- '' कहाँ गए थे ?''
- '' यजमान के यहाँ भोज में गया था। ''
- '' क्या - क्या खाया भोज में ? '' 
- '' दो पूरी और साग ?''
          उनका चेहरा उतर गया। लड़के को घूर - घूर कर देखने लगे। बेचारा, सिर नीचा करके चला गया।
- '' महँगाई के जम़ाने और कितना खाऊंगा ? '' लड़का सोचता है।
- '' मेरी नाक कटवाएगा यह । '' चंदनधारी सोचता है।
- '' जम़ाना तेज़ी से बदल रहा है। '' दोनों सोचते हैं।
झुका कंधा
     बेटे ने उसे काफी कीमती सूट दिया था। वह सूट में अच्छा लग रहा था। एकदम किसी बड़े अधिकारी के बाप जैसा। पत्नी की बड़ी इच्छा थी, इसलिए थोड़ी ना - नुकर के बाद सूट पहनने के लिए तैयार हो गया था।
बेटे ने पुराना सूट देते हुए बताया था - '' मेरे पास पूरे दस सूट हो गए हैं। वैसे यह ज़्यादा पुराना नहीं है। आखिर अफसर के बाप के पास कोई तरीके की ड्रेस तो होनी चाहिए। ''
     सूट पहनने के बाद बुजुर्ग ने पत्नी से कहा - '' बाकी सब तो ठीक है, बस, कंधा कुछ झुक गया है। '' इतना कहकर अपने कमरे में चला गया।
     पत्नी फोन पर ऊँची आवाज में बेटे को बता रही थी, या शायद पति को सुना रही थी- '' पहली बार सूट पहना है इसलिए कुछ हिचक रहे थे। कीमती सूट है न, इसलिए बड़े अच्छे लग रहे थे। ''
दर्द
     शिक्षक समयलाल के सामने समाचार पत्र पड़ा था और वे कुछ सोच रहे थे। मैंने पूछा - '' क्या सोच रहे हैं? ''
वे बोले - '' दो समाचार अगल - बगल छपे हैं। एक चालीस किलो का बकरा पाँच हजार रुपये में बिका। दूसरा - एक गरीब किसान ने अपनी जवान पत्नी पाँच हजार के बदले एक दलाल को दे दी। मैं सोच रहा हूं कि पहला तो एक ही बार हलाल होगा, परंतु दूसरी पता नहीं कितनी बार हलाल होती रहेगी। ''
गुलाब
     उसके घर के आँगन में पड़ोसी की बाड़ी लगी हुई थी। दीवार भी महज पाँच फुट ऊँची थी। इसलिए वह अपने घर का सारा कचरा बाहर कुड़ेदान में डालने के बजाय पड़ोसी की बाड़ी में फेंकना सुविधाजनक मानता था। यह सिलसिला कई महीनों से चला आ रहा था।
     अचानक एक दिन पड़ोसी बड़े - बड़े गुलाबों का गुलदस्ता लेकर भेंट करने पहुँचा। उसने आकर्षक गुलाबों की तारीफ की और गुलदस्ते के लिए धन्यवाद दिया। वह हैरान भी था। पड़ोसी ने मुस्कराते हुए बताया- '' यह सब आपकी ही मेहनत है। दरअसल, आप पिछले कई महीनों से जो कचरा हमारी बाड़ी में डाल रहे थे, वहाँ मैंने गुलाब के पौधे रोप दिए थे। कचरे की खाद की बदौलत ही ये फूल इतने आकर्षक हो सके। ''
सुबह का सपना
     उसने देखा, प्लेट पूरी तरह भरी हुई थी। चमचम, गुलाबजामुन, के साथ पकौड़े और कचौरियाँ भी। पुलाव था और रायता भी। उसने पेट भर खाया, प्लेट सामने खेलते बच्चों के सामने रख दी। पल भर में वह साफ हो गई।
     अचानक उसकी नींद खुल गई। पर सपना याद रहा।
     माँ का चेहरा अपनी ओर घुमाते हुए उसने कहा -  माँ, भूख लगी है। '' पर माँ चेहरा ढंक कर सो गई। उसके चेहरे से चादर हटाते हुए वह बोला -  सचमुच बहुत जोर की भूख लगी है।'' माँ ने एक चाँटा उसके गाल पर लगाते हुए कहा -  सुबह - सुबह तो सोने दे। ''
     इस बार उसने पूरी चादर खींच दी और चिल्लाया - '' माँ, बहुत भूख लगी है। कुछ भी खाने को दो। '' माँ ने उसके दूसरे गाल पर चाँटा रसीद करते हुए कहा - ''  ले, अब जा तू भी सो और मुझे भी सोने दे। भूख के कारण रात भर नींद नहीं आई।''
सवाल
     रमेश ने अपने पुत्र राम को महापुरुषों की जीवनी वाली पुस्तक ला कर दी थी। रात में राम ने बड़े चाव से पुस्तक पढ़ी। सुबह उसने पिता से पूछा - '' पापा, आपको देश के लिए सोचने, कुछ करने का मौका मिला था क्या? मिला, तो कुछ किया या नहीं कर पाए? ''
     स्कूल में अपने टीचर से पूछा - ''  क्या आपने महापुरुषों के बारे में पढ़ाते - पढ़ाते उनके रास्ते पर चलने के बारे में सोचा भी? कुछ प्रयत्न किया? '' 
     शाम को घर लौट रहा था, तो मुहल्ले के एक नेता जी दस - बीस लोगों के बीच भाषण दे रहे थे। राम ने पूछा - '' आपने भाषण में तो बहुत कुछ कहा, पर अपने ही कहे पर ईमानदारी से चले क्या?'' 
     वह दिन भर सवाल पूछता रहा, पर कहीं से भी जवाब नहीं मिला। हर जगह झिड़की, डाँट और फटकार ही मिली। घर में घुसता हुआ राम सोच रहा था - हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और होते हैं। यह कहावत उसने कोर्स की किताब में पढ़ी थी।
पता
डॉ. बख्शी मार्ग
खैरागढ़ - 491- 881
जिला - राजनांदगांव(छ.ग.)
मो.- 09424111454
ईमेल:ggbalkrishna@gmail.com         

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