इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

गोवर्धन यादव की लघुकथाएं

मरते - मरते लखपति बना गयी

      एक कांस्टेबल को किसी जुर्म में सस्पेन्ड कर दिया गया। वह दिन भर जुआं खेलता और शाम को टुन्न होकर घर लौटता। घर पहुँचते ही मियां - बीबी में तकरार होती। वह घर खर्च के लिए पैसे मांगती तो टका सा जबाब दे देता कि जेब में फ़ूटी कौडी नही है। बच्चॊं को कई बार भूखे पेट भी सोना पडता था। उसकी बीबी थी हिम्मत वाली। उसने सब्जी - भाजी की दुकान एक पडौसन से कुछ रकम उधार लेकर शुरु की। उसका व्यवहार सभी के साथ अच्छा था। देखते - देखते उसकी दूकान चल निकली। अब वह दो जून कि रोटी कमाने लायक हो गई थी। लेकिन उसके पति मे कोई सुधार के लक्षण दिखाई नही दे रहे थे।
      उसने कुछ अतिरिक्त पैसे भी जोड लिए थे। तभी उसकी बड़ी बेटी के लिए एक रिश्ता आया और उसने धूमधाम से बेटी की शादी भी कर दी। कुछ दिन बाद वह कांस्टेबल भी बहाल हो गया। नौकरी पर बहाल हो चुकने के बाद भी उसने अपनी दूकान बंद नहीं की।
      कुछ दिन बाद उसकी बेटी के घर कोई पारिवारिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। उसकॊ वहाँ जाना था। अपने पति और बच्चॊं के साथ वह रेल्वे स्टेशन पहुँची। ट्रेन के आने में विलम्ब था। ट्रेन के आगमन के साथ ही एक दूसरी ट्रेन भी आ पहुंची। दोनो ट्रेनो का वहाँ क्रासिंग़ था। जल्दबाजी में पूरा परिवार दूसरी ट्रेन मे सवार हो गया,लेकिन शीघ्र ही उन्हे पता चल गया कि वे गलत दिशा की ट्रेन मे सवार हो गए है। पता लगने के ठीक बाद ट्रेन चल निकली थी। ट्रेन की स्पीड अभी धीमी ही थी। इस बीच उसके परिवार के सारे सदस्य तो उतर गए लेकिन उतरने की हडबडी मे उसका पैर उलझ गया और वह गिर पडी। दुर्योग से उसकी साडी उलझ गयी थी और वह ट्रेन के साथ काफ़ी दूर तक घिसटती चली गई।
      पति चिल्लाता - भागता दूर तक ट्रेन का पीछा करता रहा। पब्लिक का शोर सुनकर ट्रेन के परिचालक ने ट्रेन रोक तो दी लेकिन तब तक तो उसके प्राण पखेरु उड चुके थे। पुलिस केस दर्ज हुआ। सारी औपचारिकता पूरी करने के बाद उसका शव परिजनॊं को सौप दिया गया। वे एक खुशी के कार्यक्रम मे शामिल होने जा रहे थे,लेकिन नही जानते थे कि दुर्भाग्य उनका पीछा कर रहा था लगातार।
     उसके मृत्यु को अभी सात - आठ माह ही बीते होंगे कि इसी बीच रेल्वे से क्लेम की राशि  स्वीकृत होकर आ गई। जेब में रकम आते ही उसने दूसरी शादी कर ली और एक नय़ी इन्डिका खरीद लाया। अब वह अपनी नई बीबी के साथ कार मे सवार होकर फ़र्राटे भरने लगा था। पास - पडॊसी कहते '' बीबी मर तो गई लेकिन उसे लखपति बना गई।''
2 बुद्धिबलं कौशलम
     एक निहायत ही भोला भाला, सीधा.सादा आदमी था। अपनी मुफ़लिसी के चलते हुए भी वह लोगों की मदद करने में पीछे नहीं हठता था। कई लोग इस बात को लेकर उसके पीछे पड गए कि उसे चुनाव में खडॆ हो जाना चाहिए,लेकिन पैसॊं के अभाव के चलते वह कभी इसके लिए राजी नहीं हुआ।जब बहुत सारे लोगों ने उसका साथ देने का वादा किया तो उसने चुनाव में खडॆ होने का मानस बना लिया। वह जानता कि स्थानीय नेता के चलते वह शायद ही चुनाव जीत पाएगा। उसने अब अपनी बुद्धिबल का प्रयोग करते हुए,कुछ लोगॊं को साथ लेकर नेताजी के आवास पर जा पहुँचा और उन्हें आगाह करते हुए कहा -'' श्रीमानजी, इस बार आप चुनाव न लडॆ तो अच्छा रहेगा क्योंकि इस बार मैं आपके विरुद्ध चुनाव लडने जा रहा हूँ। यदि आपने मेरा कहा न माना तो हो सकता है कि आपको शर्मिन्दा होना पडॆगा। एक खरगोश किस्म का आदमी सीधे शेर की मांद में जाकर शेर को ललकार रहा था। सुनते ही नेताजी का दिमाक सातवें आसमान पर जा पहुँचा। आँखों से क्रोध के अंगारे बरसने लगे। अनायास ही उनका हाथ कमर में लटकती रिवाल्वर पर जा पहुँचा। वे उसे बाहर निकाल पाते , इसके पूर्व उन्हें ध्यान आया कि क्रोध करने से सारा मामला उलटा पड सकता है। चुनाव का मौसम है। जरा सी भी असावधानी से लेने के देने पड सकते हैं। इस पिद्दी जैसे आदमी से कभी और भी निपटा जा सकता है। उन्होंने जैसे - तैसे अपने आप को काबु में किया और अत्यन्त ही विनम्र होकर उससे कहा -'' अच्छा बच्चु, तुम्हारी इतनी हिम्मत कि तुम मेरे विरुद्ध चुनाव लडोगे। चुनाव तो लड लोगे लेकिन किस बूते पर न तो तुम्हारे पास अपने खाने.कमाने का ठौर.ठिकाना है और न ही करोडॊं की जायजाद और न ही बैंक बैलेंस, आखिर किस तरह तुम मुझसे टक्कर लोगे। 
     प्रश्न सुनकर वह न तो विचलित हुआ था और न ही घबराया था। उसने नेता जी से कहा कि वे स्वयं इसकी  परीक्षा ले सकते हैं। उसने बात आगे बढाते हुए कहा - .यदि आप मेरी ताकत देखना ही चाहते हैं तो कृपया मेरे साथ जनता के बीच में चले और देख लें कि वह किस तरह उठकर मेरा इस्तकबाल करती हैं। नेताजी ने सोचा कि वे यहाँ के दबंग नेता है और जनता पर उनका पूरा दबदबा है लेकिन जब यह चैलेन्ज कर ही रहा है तो चलकर देखने में क्या जाता है। उन्होने कहा कि वे इसके लिए तैयार हैं। उस आदमी ने देखा कि उसकी योजना सफ़ल हो रही है तो उसने तत्काल एक प्रश्न फ़िर उछाल दिया - श्रीमानजी.... चलिए चल कर स्वयं देख लें। लेकिन मेरी एक छोटी सी शर्त है और वह यह कि जनता के बीच जाते स़मय, आपकॊ मुझसे दो कदम पीछे रहकर चलना होगा और देखना होगा कि मेरी अपनी क्या हैसियत है। यदि आपको मेरी छोटी सी शर्त मंजूर है तो मैं आपके साथ चलने को तैयार हूँ। नेताजी ने सोचा कि ऐसा करने में क्या हर्ज है और वे इसके लिए तैयार हो गये।
     ढोल ढमाके साथ वे दोनो मुहल्ला - मुहल्ला, गली - गली मे जा रहे थे। शर्त के मुताबिक वह चार फ़ुटा सा आदमी, बडॆ डील - डौल वाले नेताजी से दो कदम आगे - आगे चल रहा था और नेताजी उसके पीछे - पीछे चल रहे थे। लोग जब अपने प्रिय नेताजी को आता देखते तो उठकर खडॆ हो जाते और अपने दोनों हाथ उठा - उठाकर उनका अभिवादन करते। जनता को ऐसा करते देख उन्हें पक्का यकीन हो चला था कि इस अदने से आदमी का जनता पर काफ़ी प्रभाव है,तभी तो लोग उठ - उठकर इसका स्वागत कर रहे हैं और वह भी समझ रहा था कि जनता किसे नमस्कार कर रही है।
     जब उसने देखा कि नेताजी पर इसका व्यापक असर हो रहा है तो उसने धीरे से नेताजी से कहा - .श्रीमान,देखा आपने, जनता मुझे कितना मान देती है। अब इसी मे भलाई है कि आप इस बार चुनाव न लडॆं और मेरा साथ दें। कुर्सी पर मैं बैठा दिखाई दूँगा लेकिन आदेश आपके ही चलेगें। मेरा आपसे यह पक्का वादा है।
     नेताजी उसकी फ़िरकी में आ गए थे और उन्होंने उसे जितवाकर लोकसभा में भेजने का मानस बना लिया था।
बारिश
     बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। बारिश से बचने के लिए एक लडके ने दरवाजा खटखटाया। मकान मालिक ने दरवाजे पर जडे शीशे में से झांक कर देखा और उसे वहाँ से भाग जाने का इशारा किया। थोडी देर बाद बारिश मे भींगती एक नवयुवती ने दरवाजा खटखटाया। मकान मालिक ने  झांककर देखा। फ़ौरन दरवाजा खोला और युवती को खींचकर अन्दर किया और   झट से दरवाजा बंद कर लिया।
खजाना
- तुम पर मैं कई दिनों से नजर रख रहा हूँ। बडी सुबह ही तुम समुद्र तट पर आ जाते हो और देर शाम को घर लौटते हो।
- मुझे अच्छा लगता है, यहां आकर।''
- कभी समुद्र की गहराई में उतरे भी हो कि नहीं।
- नहीं ।''
- एक बार भी नहीं''
- फ़िर समझ लो तुम्हारी पूरी जिन्दगी बेकार में गई। यदि तुम एक बार भी समुद्र में उतरते तो तुम्हारे हाथ नायाब खजाना लग सकता था। क्या तुम्हारा ध्यान  इस ओर कभी नहीं गया।आखिर तुम करते क्या हो इतनी सुबह - सुबह आकर।
- बडी सुबह मैं इसी इरादे से आता हूँ, लेकिन आसपास पडा कूडा  - कचरा देख कर सोचने लगता हूँ कि पहले इसे साफ़ कर दूं,फ़िर इतमीनान पानी में उतरूंगा, बस इसी में शाम हो जाती है।
- आखिर यह सब करने से तुम्हें मिलता क्या है
- कुछ नहीं, बस मन की शांति।
- बकवास.... सब बकवास।
-''शांति से बढकर और कोई चीज हो सकती है क्या। '' उसने इत्मिनान से उत्तर दिया था
नगर शांत है
     एक संत नगर के ऎतिहासिक मैदान में अपना भाषण दे रहे थे। वे सरकार की विफ़लता एवं भ्रष्टाचार को उजागर कर रहे थे। संत को सुनने के लिए पूरा शहर ही उस मैदान में आ उपस्थित हुआ था। भाषण शान्तिपूर्वक चल रहा था। लोग ध्यान लगा कर उनकी बातों को सुन - समझ रहे थे। पूरे मैदान में केवल संत की ही आवाज गूंज रही थी।शहर की शान्ति भंग न हो जाए इस आशंका के चलते अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए जिला मजिस्ट्रेट ने धारा 144 की घोषणा कर दी। घोषणा होते ही वह मैदान छावनी में बदल गया। पुलिस फ़ोर्स और अन्य सुरक्षा कर्मियों ने सभा में प्रवेश करते हुए लोगों को खदेडना शुरु कर दिया। देखते ही देखते पूरा मैदान खाली करवा लिया गया।अब पूरा शहर शान्ति  के आगोश में था।
आग
     सेठ धरमदास अपनी पांच मंजिला इमारत की छत पर अपने खास दोस्तों के साथ काकटेल पार्टी में व्यस्त थे। लोग शराब के नशे में इठलाते - बलखाते - लडखडाते आते और बार- बार उन्हें नगरपालिका के चुनाव में अध्यक्ष पद पर भारी बहुमत से जीतने की बधाइयां देते, लेकिन धरमदासजी  के मन में आग लगी हुई थी। वे न तो बहुत प्रसन्नता जाहिर कर रहे थे और न ही उनके मुखमंडल पर चुनाव जीत जाने की खुशी ही झलक रही थी। सेठजी के एक मित्र ने इनकी उदासी के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने अत्यन्त ही कातर शब्दों में अपने मन की व्यथा.कथा सुनाते हुए अपने आलीशान बंगले के पीछे लगी झुग्गी.झोपडी के बारे में कह सुनाया। सारी बातें सुन चुकने के बाद उनके मित्र ने कहा - भाई, इतनी छोटी सी बात के लिए क्यों तुम पार्टी का मजा किरकिरा कर रहे हो। मेरा तुमसे वादा रहा एक हफ़्ते के भीतर ये सारी झुग्गी - झोपडियां यहां से हट जाएगीं और तुम्हारे कब्जे में सारी जमीन आ जाएगी। अपने मित्र की सारी बातें सुन चुकने के बाद, उनके भीतर लगी आग की आंच में  थोडी कमी आयी थी।
     दिन निकलते ही ऐसा लगता जैसे आसमान से आग बरस रही हो, झुग्गी.झोपडी में अपना जीवन बसर करते मजदूर दिन में अपने काम पर निकल जाते और देर रात घर लौटते और खाना खाकर बाहर खुले आसमान के नीचे रात काटते। इसी समय का इन्तजात था सेठजी के मित्र को, उसने किराये के पिट्टुओं को आदेश दिया कि आधी रात बीतते ही सारी झोपडियों को आग के हवाले कर दिया जाए। देखते ही देखते सारी बस्ती को आग ने उदरस्थ कर लिया था। गरीब मजदूर रोने - चिल्लाने.चीखने के अलावा कर भी क्या सकते थे।जब सारा आशियाना ही जलकर राख हो गया,तो वे वहां रहकर करते भी तो क्या करते। धीरे - धीरे पूरी बस्ती के लोग किसी अन्य जगह कॊ तलाश कर अपनी - अपनी झोपडियॊं के निर्माण में लग गए।  सेठजी के सीने मे बरसॊं पूर्व लगी आग अब जाकर ठंडी हो पायी थी। फ़िर तो वही होना था जो सेठजी चाहते थे। उस जगह पर अब आलिशान कोठियाँ आसमान से बातें करने लगी थीं।
पता 
103, कावेरी नगर,छिन्दवाडा ( म.प्र.) 480001
फोन : 07162.246651, मोबा. : 9424356400

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