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शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

देवार गीत म संस्‍कृति के महक

देवचंद बंजारे 

     छत्तीसगढ़ म कई ठन जाति अउ ऊंखर लोक जीवन संस्कृति अउ परमपरा के लोक गीत के खजाना ह हीरा मोती कस भरे हे ।  इहाँ के माटी म सुघ्घर खेती  खलिहान, रूख राई अउ बरगद के  छईहा जंगल, फुलवारी, बगीचा अउ अमरइया के आमा मंऊर, ममहाती जुड़-जुड़ हवा, हरियर-हरियर मखमल के लुगरा ल धरती दाई ह पहिने हे । मन मोहनी जंगल के रूप ह अउ टेड़गा कुबरा, नरवा नदिया के सुघ्घर बोली ह, संगीत के सात सुर लहरी ह मन मोह ले थे । हमर छत्तीसगढ़ म देवार जाति मन के गीत सुघ्घर लगथे । देवार छत्तीसगढ़ म घुमक्कड़ जाति आवय ये मन ह कोनो जगा म खाम गाड़ के नइ राहय । घुमक्कड़ परम्परा अउ संगीत नाचा के धरोहर ह जिनगी म परान बरोबर जुरे हे । गरीबी अनपढ़ अउ अंधियारी जिनगी के दुख पीरा ल भोगत हे । देवार मन ह अपन लोक गीत के सांस्कृतिक पहचान ल विदेशी डिंगवा गीत म गवां डारिन अउ पेट बिकाली म भुलावत हे । भटरी के समान घुमइया अउ एक जगा ले दूसर जगा म उसलत बसत रहिथे । एतिहासिक पन्ना म राजा कल्याण साय के बेरा म देवार जाति के जनम ल माने गेहे । जउन ह मुगल शासक शाहजहाँ के जमाना के रहिन हे । कतको देवार मन ह अपन ल गोपाल राय अउ हीरा खाम क्षत्रिय वंश के मानथे । देवार गीत म अइसन गोठ हा समाये हे । गाय पेट के गोंड गौरहा । देव । पेट म देवार । ये देवार गोंड राजा अउ ऊंखर शासन काल से अब्बड़ परभावित रिहिस । ऊंखर दरबार म बिकट बढ़ाई करत रिहिस । अइसन लगथे कि कोनो गलती म दण्ड या राजद्रोही के दोष म राजदरबार ले बाहर कर दिस होहि । देवार अपन जाति के महिमा ल बखान गीत म करत हे ।
चिरई म सुन्दर रे पतरेंगवा ।
सांप सुन्दर मनिहार ।
राजा सुन्दर गोंड रे राजा ।
जात सुन्दर देवार ।
     दूसर विद्वान सुशील यदु कहिथे - देवार जात के परमुख तेलासी - देवार जात के जनम मानत हे, देवी देवता मन के किरपा म उंखर जात के नाम देवार होईस । उंखर पुरखा पानाबरस राजू (गीदम) ले आय हवय अउ छत्तीसगढ़ म कई ठन जघा म खरसिया, चन्द्रपुर, कवर्धा, नांदगांव, दुर्ग, पिपरिया आन जघा म घलो छरियाय हवय । आज शहर नगर म देवार डेरा के ठिकाना नइ हे । चिरहा भोगरा अउ छिदिर बिदिर छरियाय हवय अउ नइ लगे लोक कलाकार होहि चिरहा फ टहा अउ मंइला ह पतलूंग ल पहिरे रहिथे । अलकरहा झलक हे अनुभव होथे कि गरीबी अशिक्षा के पर्रा म जिनगी पहावत हे घुमन्तु जिनगी ।
मनखे के तन म कई ठन बिधि के गोदना गोदे जाथे । जेकर ये गीत ल गाये जाथे -
गोदना गोदा ले रीठा लेले
गोदना गोदा ले रीठा ले ले ओ ....
गोदना मैं गोदंव दाई रीठा मैं बेचंव
तन के दुख बिसरे खातिर, गली मं घुमंव ओ ....
भुजा मं गोदंव दाई हरिना मिरगवा
बॉह मं गोदंव सतफु लिया ओ ... .
पहुंचा मं गोदंव तोर गोभी फू ल करेला चानी
कोहनी मं गोदंव तोर पुरइन के पाना
अउ गोदंव मैं बूंदी ओ ....
     देवार जाति ल शासन ह अनुसूचित जनजाति म आरक्षण (सुरक्षित) दे हवय । फे र एकोझन मन लाभ नई पा सकिन । बिकास के रद्दा ह कई कोस दूर हवय । देवार जाति म साक्षरता ह बहुत कम हे । देवार अपन समाज ल सभ्य सुसंस्कारित करे बर बीड़ा उठाये के पहली रद्दा म भटकगे । पेट के खातिर दर-दर भटकते सुरा पालना, बंदर नचाना, देवारिन मन के नाच अउ गांव-गांव म किंजर के गोदना गोदत जिनगी चलाथे । गोदना गोदय के परम्परा ह बंद होय के कगार म आ गेहे । अब संसो के बादर ह ढाकत हे । देवार समाज ह पुराना ढर्रा म रेंगत मानवता ल घलो नई चिन्हय । जेकर सेती ऊंखर म गरीबी, मजबूरी, दुख अनियाव, अतियाचार, अपमानित जिनगी ह कोनो जनम के सराप जइसे लगथे । ऊंखर मन के स्वाभिमान ह मर गेहे अउ तन के लहू ह पानी होगे हे तइसे लगथे । कतिक दिन ल अंधियारी रात म सुते रइहि, अब तो जागव । कोनो ह तुमन ल उठाय बर नई आवय, खुद ल उठे ल पड़ही चारो कोति ल देखव कतिक सुघ्घर लगत हे । ये मन ह भीख नइ मांगही त ऊंखर जात वाले मन ह छोड़ (बहिष्कृत) दिही अउ समाज के रसम म अनियाव मान लेथे । आजाद भारत म आज घलो भीख मांगेबर मजबूर होना पड़थे। देवार समाज के फुटहा किस्मत म कब सुरूज ह चमकही ।
     नोनी पीला मन ह गोदना गोदने अउ रीठा बेचने का काम करत हे । दिन ह बदलत हवय अउ अपन धंधा म रूचि नइ हे लोगन मन गोदना ल पसंद  नई करे । देवार समाज म आय के साधन ह नइहे, मरद ह सारंगी बजाकर धंधा करथे । इही ह सामाजिक अउ धन आय के साधन म शामिल हे । माईलोगीन हा कागज, झिल्ली, प्लास्टिक बिनकर पेट पालथे । मरद ह कबाड़ी के धंधा करके आघू बढ़त हवय । उंखर समाज म दुरूग, नांदगांव म एक एक ठन पढ़लिखकर वकील बने हे । अपन पीढ़ी म देवार आठवी या दसवीं तक ही पढ़ लिखे सके हे । ऊंखर आघू पीछू म नउकरी नई हे अऊ कोनो धंधा नइ हे । गरीबी अउ घूमंतु जिनगी के स्वभाव बनगे हे । येकर एक ठन कारन हे अशिक्षा ।
     देवार गीत म छत्तीसगढ़ी भासा के गुरतुर मिठास अउ छत्तीसगढ़ी गीत के मंजूषा ह पुन्नी के चंदा कस चमकत हे । रूज्जू, ठुंगरू, मादर के संग म गाये गीत ह मनखे के जिनगी म खुशी, परेम अउ प्रेरणा के संचार ह भर जाथे । देवार गीत म झगरा लड़ाई हंसी ठटठा म इतरावत अउ नदिया कस जिनगी ह मचलत हे । एक डाहर गरीबी के आगी अउ दूसर डाहर बिनदास मस्ती ह भभकत रहिथे । देवार गीत ह ऊंचा परबत ले सरलग कलकल-छलछल बोहावत हवय अउ छत्तीसगढ़ राज म सुरूज कस सांस्कृतिक परमपरा ह चमकत हवय। देवारिन मन के सुघ्घर बोली अउ छुनुर-छुनुर बाजे पांव के पैरी हा मन ल मोह लेथे ।
हाय रे डुमर खोला - खोला रे, छतीया ल बान मारे तरसत हे चोला रे।
एक गीत म अपन हिरदे के भावना ल टुटे फुटे भासा म गीत ल गाथे ।
झुमर जा रे पड़की झुमर जा रे, धमधा के राजा भाई तोर कइसन लागे रे
लहर लोर-लोर, तितुर म झोर-झोर, राय झुम-झुम बास पान, हंसा करेला पान झुमर जा रे ।।
धमधा के राजा भाई मोर ससुर लागे रे, लहर लोर-लोर, तितुर म झोर-झोर
राय झुम-झुम बास पान, हंसा करेला पान झुमर जा रे, झुमर जारे पड़की झुमर जा रे ।
देवार गीत म राजा मन के गाथा सुने ल मिलथे ।
रइया के सिरजे रइया रतनपुर, राजा बेनी के सिरजे मल्हार ।
देवार गीत म उड़िसा देश की नारी के सिंगार अउ महिनत ला बखान करथे ।
नवलख ओड़िया नवलख ओड़निन, डेरा परे सरी रात ।
ओड़निन टूरी ठमकत रेंगय, गिर गय पेट के भार ।।
पांच मुड़ा के बेनी गंथा ले, खोंचे गोंदा के फूल।
नवलख ओड़िया नवलख ओड़निन, कोय सगर के पार ।।
     तिहार म होली अउ मकर संक्रांति के तिसर दिन बिशेषकर तिहार मनाथे । संकट म गौरी-गौरा (शिव-पार्वती) की पूजा करथे । देवार दन्तेश्वरी महामाई, बही माई, बूंढ़ी या रिच्छिन देवी अउ काली माई के पूजा पाठ करथे । सोनवानी, तोलासी, पुरलौटी, सोरी, मखमल, जोगी, नगरहा, छेपइहा, मरई आदि परमुख गोत्र हवय । देवार गीत म इतिहास के मध्यकाल के चित्र घलो खिचाय हे । जउन म मुगल शासक मन के अनियाव, अतियाचार, धरम ल बदले बर जबरन परताड़ित करत रिहिस अउ नारी के देह सोसन के पीरा ह करलई लगथे । देवार गीत म टुरा मनह परमुख होथे अउ सारंगी के सुर म झुमर-झुमर के गावत रहिथे । ये गीत म मया, जवानी के मस्ती हा पानी कस छल छलावत रहिथे । तबला पेटी (हारमोनियम) सारंगी, ढोलक के संग म देवारिन मन हा नाचे अउ गाय बर रमे रहथे ।
बघनीला छीला मोर चंदा छबिला, मोर बघनीला मोर बघनीला ।
मारे चंदैनी गोटी टीपे ल चिरैया टीपे ल चिरैया ।।
     देवार गीत ल गद्य अउ पद्य म लिखे हवय । छत्तीसगढ़ी संस्कृति रिति रिवाज के कोवर अउ गुरतुर मिठास ह मया पीरा सुख-दुख ह निगी म बरोबर दरसन होथे । चंदा अहिरिन ह दिल्ली जाथे त छत्तीसगढ़ी के सोला सिंगार (गहना) पहनथे ।
नाके वो तिरैया के कान लटकन, या खजूर ल के बेनी धमधा के पइरी ।
रइगढ़ चुटकी बेलसपुर मुंदरी, रतनपुर चुरी लहरिया फुं दरी ।
गौर झूमा के लुगा ए बत्तीसदांत म हीरा जड़े हे ।
     अपन गोसइन के इज्जत आबरू ल रक्षा करे बर दिल्ली जाथे त चंदा अहिरिन के गोसइंया ह छत्तीसगढ़ के कई कोरी देवी देवता मन ल सुमरन करथे ।
एक छेना आगी घर के, छप्पन कोरी देवता ल सुमरथे ।
राउत भाई केउ कोरि देवता ल सुमरथय ।।
धोबी के पटकना देवार मन के दुलहा देव आय ।
पठान के अल्ला राउत के का छन आय ।।
तेली के लिटयारा मरार के टेड़ा, लोहार के ठुकठुकी ए ।।
     देवार गीत म मध्य कालिन एतिहासिक लड़ाई अउ बीरता रन कौशल, आत्म स्वाभिमान के चित्र घलो दिखथे ।
बारा गोरी बरकंडा जुरे हय, सोरा कोरी पेहलवान
अस्सी कोरी मिरजा के डेरा तेमे, बब्ख खान पठान
दिल्ली के हय जिमिदार, सारे हबरेज ससुरे मत जा कहिके
कुछु बात नइ मान, आमा पेड़ अमरइया ला नहाकथे
ठुठवा पेड़ कचनार, पीने रपाटे के मोर चंदा हा, लिकल चले मइदान ।
देवार गीत म बीरबंधु देवार गाथा घलो सुने ल मिलथे ।
कुकुर बिदारे लमहा पोटा, बाघ बिदारे गाय, चार हजारी फरौद म तीन गहना बेयाय ।।
अउ गीत म कौवरो पांडो के जिपरहा युद्ध गाथा चित्र देखे ल मिलथे  ।
दोनो के केरर गड़ी गा रगड़ा गा बेली गा बेला गा
घाड़ी गा भाड़ा गा रटारि घड़ाघिड़।
     देवार छत्तीसगढ़ के बसंती अउ पदमा देवार परमुख कलाकार रिहिस हे ऊंखर गाये गीत म गोंडवानी, कर्णदानी, पलवानी, केंवटीन राउत के गीत, नगेसर कन्या परमुख देवार गाथा म एके ठन आवय । इखर दशा बिगड़ गे अउ मांदर के संग औरत नृत्य करत लोगमन के मनोरंजन करत रिहिस । कलाकारी इखर धंधा रिहिस । बड़का - बड़का दाऊ मालगुजार मन ह मनोरंजन करे बर गाव ले जावत रिहिस । इखर जात म परसिध औरत कलाकार रिहिस हे जिकर नाव गैंदाबाई कलाकार बैलगाड़ी के चक्के में दीया जला के नाच करत रिहिस अउ एक्कीस लोटे ल एक के ऊपर एक रखकर आरे में नाचे के बिशेष दक्षता रिहिस ।
     लोक गीत कस देवार गीत म लोक संस्कृति, लोक जीवन, लोकाचार के खुसबू ह उड़त हे अउ लोक संस्कार के कई ठन रूप ह जिंदा जाग उठे हे । एखर गीत म लोक शैली अउ घुमक्कड़ संस्कृति के परम्परा ह घलो मिंझरा हे । ये गीत म नारी के मादक रूप ह मंदरस कस पुन्नी (जवानी) म भराये हे ।
''हरदी सही तोर अंग दिखत हे, कुन्दरू जस तोर होठ ।
पाका केरा जांघ दिखत हे, काचा खवाउल आस ।।''
     छत्तीसगढ़ी लोक गीत के रानी ददरिया ह देवार गीत म समाय हे । ददरिया ल देवार संस्कृति के परिणय घलो कहिथे अउ एला गाये बिना मन म जोस नइ आवय । ददरिया ल बारो महिना गावत रहिथे । ये गीत म जुग जोड़ी के परेम हा झलकत हे ।
गहूं के रोटी ला अंगरा म सेके अंगरा म सेके
दिल नइ माने मोर परछी ल देखे
गहूं के रोटी ल करि डारे कुटका करि डारे कुटका
बड़ नीक लागे मोर धनी के मुटका
     आज ले ५० साल पहलि बालकी अपने  नृत्य अउ गाना गाये बर छत्तीसगढ़ म विख्यात रिहिस हे । इंखर जाति म फि दा बाई, किस्मत बाई देवार, बसंती अउ पदमा छत्तीसगढ़ के परमुख कलाकार रिहिस हे ।
     देवार गीत म जाति महिमा संगीत परेम हंसी मजाक ह मुरझाये तन म परान फु क देथे अउ एला कतको बिपत्ति आही तभी ले जिंदा रखथे । इही हर जिनगी म उरजा देथे तभेच भूख प्यास, गरीबी अउ जुच्छा जिनगी म जिये बर ताकत मिलथे ।
''का कहिबे केंवटीन के रे बात, कारी केंवटीन गागर भर पोत।
बरगे केंवटीन सुरूज के जोत, कनवी आंखी म काजर लगाय ।।''
''बुची कान म ढर लगाय, सब झन बइठे छेवे छेवार।
कंवटीन बइठे मांझा बाजार।''
     देवार गीत म आत्मा परमात्मा अउ आत्मा कभू नइ मरे, एहर अमर हे यहू ह गीत म हवय ।
''उड़के चोला इंदर लोक जाना, सब इंहे छुट जाना
तेमे बहुर जनम नइ आना ।''
     सीधा साधा अउ आपसी इखर व्यवहार म सहमति अउ पंचो के राय के बाद बिहाव के संबंध बनथे लड़का अउ लड़की के घर के आघु म एक बोतल मंद अउ एक -एक सिक्का रखे के परथा हे । बिहाव के पक्का रिस्ता सुकार करलेथे तो मंद अउ सिक्का घलो सुकार कर लेथे । अउ रिस्ता पसंद नइ हे तो मंद अउ सिक्का वापस कर देथे । संबंध पक्का होही तब लड़की ल चुड़ी पहनाकर बिहाव के तिथि ल मड़ा लेथे । बिहाव तीन दिन के होथे अपन बरात ल शंकर भगवान के समान मानथे । औरत मन सवांग करथ कोनो  बाघ के कोनो बंदर के सवांग करके निकल थे वर वधु ल एक कपड़े के परदा के आड़ म लाकर एक दूसर के मुटठी ले चावल छोडव़ा थे अउ लड़की ल अंगूठी पहिना के फे रा लेथे । बिहाव छोड़िक - छोड़ा या तलाक के दशा म लड़की के दाईज ल वापस कर देथे । बिहाती देय के घलो परथा चलत हे।
     देवार गीत म भगवान के गोदना घलो गोदे जाथे ये गोदना ल परेम के चिनहा मानथे गोदना के गीत ल देखव  -
तोला का गोदना ल गोदंव ओ,
मोर दुलौरिन बेटी ....
बॉह मं सीताराम लिखा ले,
जॉवर जोंढ़ी राधेश्याम लिखा ले
नान पन के संगी संगवारी,
फूल फु लवारी के नाम लिखा ले
तोर मन ल कइसे बांधंव ओ ....
दसो अंग के गहना गुंठा,
अउ तन के सरी सिंगार
नई जावै संग कुछू ओ बेटी,
जाही तोर गोदना सार
मया के भाखा कइसे ओरखंव ओ ....
बांह के बहुंटा पहुंची मुलहा,
तीन बुंदिया सँकरी गोदा ले
सॉप बिच्छी अउ झाड़ मंदिर,
अंग मं सुघ्घर लिखाले
तोर आँखी ल कइसे पोंछव ओ ....  ।।
     छत्तीसगढ़ म फैले अंधबिसवास, पाप-पुन्य, बरत, उपास अउ बुढत काल म मनखे के एके ठन सहारा बेटा ल मानथे ।
दसे मास के बेटवा जन्मे, दस झोके जोहार
अपन तरे पुरखा ल तारे, तारे कुल परिवार
का बिटिया झगरी जन्मे, पुरखा लगारी सुनाय
बेटवार जन्मे एक भवानी, राखे जुग ले नाव
     देवार गीत म मस्ती जोस उमंग के धार ह बहुरूपिया रूप ल कम नइ होवन दे । देवार गीत सामाजिक परम्परा ले मिले सम्पदा ह समे-समे पर अदली-बदली होवत रहिथे । लोक गीत म माटी के सोंधी सुगन्ध संस्कृति श्रम के महिमा धार्मिक बिचार ह जन चेतना के धुन म उफ लत हे । देवार गीत के परान ह धुन म बसे हे जउन ह टुटे फु टे बेकार शब्द ह गीत के घोर (टेक)  चमकत रहिथे अउ भाई चारा परेम सद्भावना के समपोषक हावय । अवइया समय म पुरखा  के गाथा अउ मनमोहित गीत ह लोक संस्कृति के असली रूप म महकत रहि । हमर लोक कलाकार मन ले बिनती हवय देवार संस्कृति के गीत ल लोक मंच म दिखावय अउ परमपरा के जम्मो झांकी ल सुरूज कस जग जग ल बरत रहि ।
रामनगर वार्ड नं. 07,
राजनांदगांव (छ.ग.)
मो. - 9755140183

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