इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

सहारों के सहारे सारे

सदानन्द सुमन
 
ये ज़मी, ये आसमाँ, ये सितारे सारे
तुम्हारे कल थे, आज भी तुम्हारे सारे
निज़ाम क्या खूब है इस दुनिया का देखिये
बेसहारे बेसहारे, सहारों को सहारे सारे
जिनका दावा था, रुख हवा का बदल देंगे
बुझ चुके ऐसे दहकते वे शरारे सारे
तमाश कैसा ये अज़ब,सितम सहते फिर भी
न कहीं जुबिस फकत, राम ही पुकारे सारे
तुमको खुद की है फिकर खुद की सोचो
गम ज़गाने के सुमन है हमारे सारे

रानीगंज, मेरी गंज, अररिया (बिहार)

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