इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

सहारों के सहारे सारे

सदानन्द सुमन
 
ये ज़मी, ये आसमाँ, ये सितारे सारे
तुम्हारे कल थे, आज भी तुम्हारे सारे
निज़ाम क्या खूब है इस दुनिया का देखिये
बेसहारे बेसहारे, सहारों को सहारे सारे
जिनका दावा था, रुख हवा का बदल देंगे
बुझ चुके ऐसे दहकते वे शरारे सारे
तमाश कैसा ये अज़ब,सितम सहते फिर भी
न कहीं जुबिस फकत, राम ही पुकारे सारे
तुमको खुद की है फिकर खुद की सोचो
गम ज़गाने के सुमन है हमारे सारे

रानीगंज, मेरी गंज, अररिया (बिहार)

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