इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

बिहार हार के मायने


डॉ. संजीत कुमार

बिहार की हार के बाद एक तरफ भाजपा मैं सन्नाटा पसरा हुआ है तो दूसरी और महागठबंधन की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं है । हालाकिं जो नतीजा आया है उसको लेकर किसी को भी आश्चर्य नहीं सिवाय भाजपा के कुछ लोगो को छोडकर । भाजपा के लिए तो यह मुहावरा फिट बेठता है की घर को आग लगी घर के ही चिराग से । भाजपा की हार की इबारत संघ प्रमुख भागवत के आरक्षण की समीक्षा के बयान से लिखनी प्रारम्भ हो गई थी बाद मे जिस तरह बयान को लेकर सफाई दी गई उससे मामला और बिगड़ गया मोदी जी ने डैमेज कण्ट्रोल की कोशिश की । खुद प्रधान मंत्री को कहना पड़ा की की आरक्षण को खत्म करने की किसी भी कोशिस को कामयाब नहीं होने दिया जाएगा लेकिन उनके पास सावरकर द्वारा लिखी गई किताब बंच ऑफ़ थॉट का कोई जवाब नहीं जिसमे उन्होंने आरक्षण को समाप्त करने की बात की गई है । इसी बंच ऑफ़ थॉट को लालू हर रैली मैं लेकर जाते थे और कहते थे की ये किताब या तो मोदी जी फाड़ दे या हम फाड़ते है ।

भारत मैं जाति एक सच्चाई है जिससे कोई भी दल मुहं नहीं चुरा सकता हालाँकि यह दुर्भाग्य है की हम भूमण्डली करण के इस दौर मैं जिसमे ज्यादातर देश तरक्की ;विकासद्ध मैं लगे है हम जात पात मैं ही उलझे हैं । यह भी उतना ही सच है आरक्षण की व्यवस्था जिस लक्ष्य को पूरा करने के

लिए की गई थी वह लक्ष्य अभी तक हांसिल नहीं किया जा सका है । हालाँकि आरक्षण विरोधी मेरिट की बात करते है तो दलित कहते है की आप एक बहुत पड़े लिखे परिवार को चुनिए जिसमे सभी पड़े लिखे हो पी.एच डी ए ऑयण् ऑयण् टीण् ए कलेक्टर ए डीण्एमण् सभी हो फिर उनकी एक जेनरेसन को असिक्छित रख दीजिए । उसके बाद उस जेनरेसन मैं हर प्रकार की दरिद्रता देखिए । इस आधार पर आप कल्पना कीजिए की जहाँ पर हजारों जेनरेसन असिक्षित रखी गयी हो ए उनके बारे मैं आप मेरिट की बात कैसे कर सकते हो । दलित जातियाँ आज भी सामाजिकए आर्थिक और धार्मिक पिछड़ेपन की शिकार है तो फिर ये जातियाँ कैसे इस बात को स्वीकार कर लेती की इनके आरक्षण की व्यवस्था की समीक्षा हो । यह बात भागवत को समझ लेनी चाहिए थी । लेकिन भागवत का क्या कुसूर वो तो आखिर भाजपा के लिए अगड़ो के वोटो का जुगाड़ कर रहे थे । पर यह वोट तो उन्हें मिल ही रहा था फिर यह बयान देने की तुक समझ नहीं आता । इसी आलोक मैं वी के सिंह के बयान को भी देखना चाहिए जिसमे उन्होंने दलितों को जिन्दा जलाने के सवाल पर कहा की अगर कोई कुत्ते को पत्थर मारे तो इसके लिए सरकार को जिम्मेदार नही ठहराया जा सकता इस बयान को भी दलितों ने अपनी अस्मिता पर हमले के रूप मैं लिया । कहीं न कहीं दलित वर्ग इस बात को लेकर भयातुर  है की भाजपा आरक्षण के खिलाफ है । सुप्रीम कोर्ट एव हाई कोर्ट के आरक्षण के खिलाफ आये फैसलो और हार्दिक पटेल आदि के आन्दोलनो को भी यह वर्ग इसी अलोक मैं देखता है । लालू प्रसाद यादव ने इसी दुखती नस को पकड़ा और बिहार के चुनाव को अगड़ा बनाम दलित पिछड़ा बना दिया और भाजपा को करारी शिकस्त दी । इस शिकस्त मैं कहीं न कहीं ब्रांड मोदी ने अपनी विश्वनीयता खोई । मोदी जी ने जिस तरह से अपनी जाति के बारे मैं लोगो बताया वह भी बेक्फायर कर गया लोगो मैं यह संदेश गया की कभी वे अपने आपको पिछड़ा बताते है कभी अति पिछड़ा कभी दलित आखिर वे हैं क्या । ऐसा भारत के चुनावी इतिहास मैं पहली बार हुआ जब देश का प्रधानमन्त्री खुलेआम अपनी जाति का खुलासा करके वोट जुटाने की जुगत की ।

ऐसा नहीं है भाजपा ने सोशल इंजीनियरिंग की कोशिस नहीं की जीतन राम मांझी जो मुसहर समुदाय से आते है और रामविलाश पासवान के रूप मैं दलित कार्ड खेला जो इस बार चल नहीं पाया । पासवान की काठ की हांडी आखिर कितनी बार चढ़ती और मांझी अपनी विश्वनीयता नीतिश कुमार को धोखा देकर खो चुके थे । बिहार मैं भाजपा की हार को दलितों के धुर्विकरण से जोड़कर जरुर देखा जाना चाहिए । दलितों के एक बड़े वर्ग मैं यह धारणा मजबूत हुई की भाजपा शाशन मैं आरक्षण पर सुनियोजित हमले हो रहें है दलित उत्पीडन बड रहा है इस कारण दलितों का धुर्विकरण हुआ और उन्होंने उन्ही पार्टिओं को चुना जिन पर उन्हें सबसे ज्यादा विश्वास था । आगामी उत्तर प्रदेश और पंजाब के चुनावों मैं भी इसी तरह का ट्रेंड नजर आने की ज्यादा सम्भावना है । इतना तय है भविष्य मैं राजनितिक पार्टिओं का भविष्य दलितों का मिज़ाज तय करेगा ।

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