इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

स्वार्थ के शिरोमणी

कांशीपुरी कुंदन
 
काकूजी जब से मंत्री बने हैं उनके पहलू में शेर दिल धड़कता ही नहींं दहाड़ता भी है। बड़े - बड़े चालाक धुर्त भेड़िए काकूजी के सामने भीगी बिल्ली बने जी हुजूरी फरमानें में अपना खैर समझते हैं। वैसे भी जी हुजूरी काकूजी को खास पसंद है क्योंकि उन्हें जी हुजूरी विरासत में मिली है। उनके पिताजी हुजूर यानि स्वामी भक्ति में इस कदर आगे थे कि उन्हें खुद पता नहीं चला कि कितने स्वामी त्यागे थे, दलबदलू, बिकाऊ, खोटे सिक्के जैसे बहुमूल्य विशेषणों के मौलिक अधिकारी थे। काकूजी अपने पिताश्री से दो कदम आगे हैं। काकूजी को खुशामद विज्ञान के न्यूटन या चाटुकारिता जगत के चेम्पियन कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। काकूजी इतनी मोटी चमड़ी कहां से पाई कि कभी उनको अपने आका के पिकदान उठाते भी शरम नहीं आई दल बदल के मामले में गिरगिट खानदान के होनहार सपूत सिद्ध होने में कोई माई का लाल उन्हें रोक नहीं सकता। षड़यंत्र, विध्वंस जैसे विकासोन्मुख क्षेत्र में तो काकूजी से राम भी नहीं बचा, राम ही जाने उन्हें किस मुहूर्त में रचा।
जैसे रावण कई नाम से जाना जाता है वैसे ही काकूजी अपने इलाके में कई दिव्य नामों से प्रसिद्ध है। मसलन - भ्रष्ट निवारक, रिश्वत के आराधक, अपराधियों के पोषक, गरीबों के शोषक, बदनाम गली के दुलारे, रामप्यारी के प्यारे आदि गौरवशाली नामों कारनामों के कारण मंत्री ही नहीं गौरव पुरुष भी है, इसलिए काकूजी बड़े गर्व के साथ कहते हैं माना कि हमारे उपर शताधिक अपराधिक मामले चल रहे हैं पर गर्व हमें कोई बलात्कारी अपहरणकर्ता या डाकू कहे बर्दाश्त के बाहर है।
काकूजी में प्रारंभ से होनहार बिरवान के लक्षण मौजूद थे। पढ़ाई जीवन में खेलकूद की अपेक्षा सहपाठियों से लड़ने झगड़ने में  अधिक विश्वास रखते थे तोड़ फोड़ हड़ताल जुलूस पर तो उनका पुश्तैनी हक था। एक बार परीक्षा जैसे महज औपचारिक नियम में नकल मारते धरे गए। अनुचित साधनों का उचित उपयोग करने के आरोप में तीन वर्षों के लिए परीक्षा से वंचित कर दिया गया। लेकिन कहते हैं होनहार विरवान के होत चिकने पात। काकूजी इतने चिकने हुए कि आरोपों की घनघोर वर्षा के पश्चात भी एक बूंद इन पर नहीं टिक पाई और गर्व के साथ मंत्री की कुर्सी पर विराजमान है। वे लोग कितने माटी के माधव होते हैं जो हल्के से आरोप के एक चुल्लू भर पानी में डूब जाते हैं बड़ी शर्म की बात है।
काकूजी की रुचि भी सबसे अलग है। देश की घोर आवासीय समस्याओं को मद्देनजर रखते हुए शहर दर शहर  कोठी बनवाने के साथ पटरानियां रखने में अपनी शान समझते हैं। आज प्रभु की दया और अपनी कोशिश से कई कारखानों मीलों के साथ अनेकों वैध बच्चों के मौलिक पिताश्री होने का भी उन्हें गौरव प्राप्त है।
काकूजी राजनीति मित्रता की ताकत से नहीं बल्कि स्वार्थ के बल पर करने में विश्वास रखते हैं क्योंकि उन्हें स्वार्थ रुपी सीढ़ी द्वारा राजनीति के उतुंग को छुने की ललक है इसी ललक ने उन्हें किसी दल से बंधने नहीं दिया। उनकी मान्यता है हम दल से नहीं दल हमसे हैं इसलिए वे निर्दलीय है। दल बदल के मामले में गिरगिट से दो कदम आगे हैं। काकूजी को पद और पैसा इस कदर अंधा कर दिया हैं कि रिश्ते नाते को मुद्रा की तराजू से तौलने में जरा भी संकोच नहीं करते हैं। आत्मीयता उनके शब्दकोश से बाहर की वस्तु है, दिखावा उनकी फितरत में शामिल है यानि मगरमच्छ की आँसू बहाने में उन्हें महारत हासिल है। काकूजी मत से मुद्रा तक केवल लेना जानते हैं, देना केवल आश्वासन की सीखे हैं। जिसे पूरा करना छूत की बीमारी समझते हैं। कभी किसी गरीब लाचार व्यक्ति से सामना पड़ा तो सहानुभूति भी भीख से देना मुनासिब समझते हैं। चालीस वर्षों से ईमानदारी पूर्वक गरीबी दूर करने पर तुले हैं। अगर वोट का सवाल खड़ा नहीं होता तो वे गरीबी के बदले गरीबों को हटाने में संकोच नहीं करते लेकिन जैसे ही चुनाव पर्व हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ काकूजी के सामने रंग बदलने में खरबूजे भी बौना सिद्ध हो जाता है। ईमानदारी नैतिकता को माला की तरह खूंटी मे टांगकर राजनीति करना काकूजी बुद्धिमानी समझते हैं फिर भी उनके समर्थकों की फौज ईमानदारी के विरुद्ध डग नहीं भरते हैं, बल्कि बेईमानी भी ईमानदारी पूर्वक करते हैं।
काकूजी कालाबाजारी, मुनाफाखोरी के घोर समर्थक हैं। इनकी सीधी सी तर्क है, व्यापारी भाई इन्हीं शर्तों पर हमें थैली भेंट करते हैं। रही बात महंगाई बढ़ने पर हाय तौबा मचाना मूर्खता के सिवाय कुछ नहींं है। कारण बढ़ना यानि विकास करना प्रकृति का नियम है हमें तो खुश होना चाहिए पर इन मुर्खों को कौन समझाये भारत जैसे विकासशील देश में कम से कम महंगाई तो विकास कर रही है। महंगाई के बढ़ने पीछे भी जनता का भला है। जनता को महंगाई और सरकार का शुक्रगुजार होना चाहिए क्योंकि महंगाई के बहाने लोग कम से कम जागरुक तो हैं। अगर महंगाई खत्म हो जाएगी तो मुई ये जनता सुख की नींद सो जायेगी।
काकूजी की मान्यता है - राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी स्थाई नहीं होता। बस स्वार्थ ही अंगद के पांव के समान स्थाई होता है। जैसे क्रेता युग में अंगद के पांव को रावण जैसे महारथी धरती से टस से मस नहीं कर सका था वैसे ही कलयुग में स्वार्थ रुपी अंगद के पांव आज तक हमारे जैसे स्वार्थ शिरोमणि नेता भी अपने दिल से तिल भर अलग नहींं कर सके हैं। स्वार्थ की सीढ़ी पर चढ़कर ही हम सफलता के नये नये आयाम उद्घाटित कर सकते हैं जिस दिन स्वार्थ खत्म हो जायेगी राजनीति अर्थात नेता का भी नेस्ताबूद हो जायेगा।
सोचता हूं काकूजी जैसे राजनीनिज्ञों के कारण सूर्य के देश में रात है। स्वार्थ शिरोमणि होना भी कितनी शर्म की बात है।
पता
'' मातृछाया ''
मेला मैदान, राजिम
मोबा.- 09893788109

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