इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

'' शिकंजे का दर्द '' में निहित दलित चेतना

         अब्दुल हासिम

       दलित चेतना मूलतः वर्णव्यवस्था  के तहत जारी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दमन के प्रतिरोध और प्रतिकार की चेतना है। प्रतिरोध का आशय है उस यथास्थितिवादी व्यवस्था को आदर्श मानने से इंकार करना जो सामाजिक,सांस्कृतिक और आर्थिक स्तर पर मानवीय गरिमा के भौतिक विकास के अवसरों को सबके लिए सुलभ नहीं होने देना चाहती और प्रतिकार का आशय है सदियों के सामाजिक अपमान और उत्पीड़न को अपनी नियति मानने से इंकार करते हुए सामाजिक ' स्व' के पक्ष में खड़ा होना। इस प्रकार दलित चेतना जातिवादी दंश से उपजा सवाल है जो ईश्वर, आत्मा, अंधश्रद्धा और उस पर आधारित समस्त नैतिकता और धर्म - सत्ता को अस्वीकार करता है।
        दलित चेतना को समझने के लिए इसके विकास को समझना अति आवश्यक है । दृष्टीगोचर है कि प्रायः सभी योगों में दलित चिंतन तो था पर उसका स्वरुप नैतिक और अाध्यात्मिक ही था। प्राचीन इतिहास में दलित चेतना के सम्बन्ध में बुद्ध को प्रथम सामाजिक प्रणेता कहा जा सकता है, जिन्होंने हिन्दू जाति व्यवस्था को अस्वीकार कर अस्पृश्यों को एक नए धर्म में प्रवेश करने का मार्ग प्रशस्त किया। शूद्र के घर में पैदा होने वाला ' अस्पृश्य ' ही माना जाता है, चाहे वह कितना ही विद्वान, सदाचारी और ज्ञानी क्यों न हो। तुलसीदास का एक दोहा प्रस्तुत है.'' पूजिए विप्र ग्यान गुण हीना, नाही न सूद्र गुण ग्यान प्रवीना '' १ सामाजिक असमानता कि इस खाई को सबसे पहले गौतम बुद्ध ने मिटाने का प्रयास किया। उन्होंने जाति - पाति, वर्ण - भेद का विरोध किया तथा समानता का मार्ग दिखलाया।
      तेरहवीं से पंद्रहवीं सदी के बीच समाज में महत्वपूर्ण राजनैतिक व आर्थिक परिवर्तन हुए जिनसे जनमानस के सोच में कुछ तब्दीली आई। तेरहवीं से सोलहवीं सदी जिसे हिंदी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल के रूप में जाना जाता है, के बीच भारत में अनेक संतों का प्रादुर्भाव हुआ। मध्युगीन संतों ने धार्मिक कट्टरता, शास्त्रबद्धता, पुरोहिताई,पाखंड एवं कर्मकांड पर गहरे प्रहार किये और समाज कि जड़ मान्यताओं तथा उपासना पद्धति पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाये। यद्यपि उन्होंने समाज में मौलिक परिवर्तन पर जोर नहीं दिया तथापि समाज के उपेक्षित व पीड़ित लोगों को सम्मानपूर्ण जीवन का मार्ग दर्शाते हुए जाति व्यवस्था की विसंगतियों को उजागर किया और ब्राह्मणवाद को चुनोती दी। चूँकि मध्यकालीन संतों ने ईश्वर के अस्तित्व को नकारा नहीं था इसलिए उनके चिंतन को दलित चिंतन नहीं कहा जा सकता है लेकिन दलित चिंतन के बिंदु यहाँ से ज़रूर दिखाई देते हैं। ओमप्रकाश वाल्मीकि के अनुसार '' भक्तिकाल में भी कई संतकवि दलित थे। लेकिन वे सामाजिक चेतना का कोई ऐसा आयाम स्थापित नहीं कर पाए जिससे दलितों में किसी परिवर्तन की सुगबुगाहट होती '' चूँकि संत कवियों ने ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल नहीं उठाया बल्कि धार्मिक बाह्याडम्बरों तथा सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया,इसलिए समाज में कोई मूलभूत बदलाव नहीं आ सका।
       सामजिक  व सांस्कृतिक परिवर्तन का वास्ताविक  उदय पराधीनता के युग में सामाजिक पुनर्जगरण आन्दोलन के रूप में हुआ। वास्तव में जिसे हम नवजागरण काल कह सकते हैं, उसकी लहर महाराष्ट्र में भी पैदा हुई और वह लहर थी - दलित मुक्ति आन्दोलन की, जिसने न सिर्फ भारत का बल्कि पूरे विश्व का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट  किया था। इस लहर को पैदा करने वाले थे महात्मा ज्योतिबा फुले जिनका जन्म १८२७ में और निधन १८९० में हुआ था। महात्मा फुले की भूमिका तत्कालीन परिवेश में सामाजिक.सांस्कृतिक परिवर्तन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थी। उनके विचार और व्यवहार क्रन्तिकारी थे। उन्होंने समाज में व्याप्त उन गंभीर समस्याओं की पहचान की तथा निदान के उपाय तलाशना आरंभ किया जो हजारों सालों से समाज में चली आ रही थी। उन्होंने ब्राह्मणवाद और जातिप्रथा के खिलाफ विद्रोह किया था और दलित - पिछड़ी जातियों तथा स्त्रियों की मुक्ति के लिए सामाजिक आन्दोलन चलाया था। वे पहले भारतीय थे जिन्होंने महाराष्ट्र में अछूतों और लड़कियों के लिए स्कूल खोला था। वे शूद्रों, अतिशूद्रों और स्त्रियों की अज्ञानता दूर करके उनकी गुलामी की जंजीरें तोड़ना चाहते थे। उन्होंने सन १८७३ में ' सत्यशोधक समाज' की स्थापना की थी और इसी वर्ष उनकी क्रन्तिकारी पुस्तक ' गुलामगिरी' प्रकाशित हुई थी। उन्होंने ब्राह्मणी शास्त्रों, पुरोहितवाद और जातिप्रथा पर जो कठोर प्रहार किया उससे आगे आने वाले दलित आन्दोलन और दलित चेतना की सुदृढ़ पृष्ठभूमि दिखाई पड़ती है।
      दलित आन्दोलन को सबसे बुलंद आवाज़ दी बाबा साहेब आंबेडकर ने और यहीं से दलित चेतना कि निर्मिति भी होती है। डॉ अम्बेडकर विद्वान विचारक, राजनेता, व समाज सुधारक थे। उन्होंने विभिन्न सामाजिक और राजनैतिक विषयों पर व्यापक पैमाने पर लिखा है। '' जातिविनाशक'' '' शूद्र कौन थे '' '' अस्पृश्य '' '' बुद्ध और उनका धम्म'' आदि उनकी महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं। उनका चिंतन समानता और स्वतंत्रता के लक्ष्य की गूढ़ आस्था पर आधारित था। उनका मुख्य संघर्ष जातिव्यवस्था से था। जाति राष्ट्रीय भावना के विकास में एक प्रमुख बाधक है अतः वे जातिप्रथा को समूल उखाड़ फेंकना चाहते थे।
       डॉ अम्बेडकर ने भारत की सामजिक, राजनैतिक विचारों की पृष्ठभूमि, चिंतन एवं जीवन पद्धति को गहरे स्तर तक प्रभावित किया। शरण कुमार लिंबाले के अनुसारए '' बाबा साहेब आंबेडकर ने मानवतावाद को सर्वोच्च स्थान दिया है । आंबेडकर प्रेरित दलित साहित्य ने मनुष्य को केंद्र माना है मनुष्य की स्वतंत्रता कि घोषणा की है '' डॉ. अम्बेडकर ने मनुस्मृति पर आधारित श्रेणीबद्ध असमानता और राजनैतिक विधानों के प्रति खुली चुनौती दी। सदियों से प्रचलन में रही वर्णव्यवस्था, जातिव्यवस्था, उच्चवर्गों के विशेषाधिकार एवं निम्न वर्गों के लिए अमानवीय और शोषण.युक्त व्यवस्था, भारतीय समाज में रच बस गयी थी। डॉ. अम्बेडकर ने इसका पुरजोर विरोध किया तथा ऐसे समाज की परिकल्पना की जो जन्म के स्थान पर कर्म तथा शोषण के बजाय पोषण पर आधारित हो। सन १९३५ में डॉ. आंबेडकर ने हिन्दू धर्म में न रहने की घोषणा कर दी। इस व्यवस्था से व्यथित  व आक्रोशित होकर उन्होंने कहा था कि हिन्दू धर्म के भीतर पैदा न होना मेरे बस में नहीं था किन्तु इसके भीतर रहकर नहीं मरूँगा, और यह मेरे बस में है।'' १४ अक्टूबर सन १९५६ ई. को दशहरे के दिन सुबह ९.४५ डॉ. आंबेडकर ने अपनी पत्नी के साथ बौद्ध धर्म के विख्यात महास्थिविर चंद्रमणि से नागपुर में लाखों अनुयायियों के समक्ष दीक्षा ली। करीब ३ लाख अनुयायियों ने उनका अनुशरण किया। इसी समारोह में उन्होंने २२ प्रतिज्ञाएं की जिनमें परमात्मा, भाग्य, पुनर्जन्म, जैसी अवधारणाओं को न मानने का संकल्प लिया। यही २२ प्रतिज्ञाएं आगे चलकर दलित चेतना के मानदंड सिद्ध हुए।
       '' शिकंजे का दर्द '' सुशीला टाकभौरे की बहुत महत्वपूर्ण  आत्मकथा है। इस आत्मकथा में सामजिक, आर्थिक, राजनैतिक, नैतिक, धार्मिक आदि मुद्दे बहुत ही प्रभावी ढंग से दृष्टिगोचर होते हैं। सुशीला टाकभौरे को सामाजिक संरचना की बहुत अच्छी समझ है जिसे उन्होंने अपनी आत्मकथा में भलीभांति अभिव्यक्त किया है। इसकी सबसे महत्वपूर्ण वजह यह है कि वह एक दलित महिला हैं। उन्होंने उन तमाम कष्टों को सहा है जो सामाजिक विसंगतियों से पैदा हुए हैं। सर्वविदित है कि भारतीय समाज ने दलितों को हमेशा हाशिये पर रखा है। यही काम उसने महिलाओं के साथ भी किया है। महिला चाहे गैर दलित ही क्यों न हो फिर भी उसे  हक़ व सम्मान  के साथ जीने की आज़ादी नहीं है। सुशीला टाकभौरे अपनी आत्मकथा के आरम्भ में लिखती हैं.'' जिस तरह किसी ताक़तवर को शिकंजे में जकड़कर उसकी पूरी ताकत को नगण्य बना दिया जाता है, उसी तरह मुझे भी सामाजिक जीवन की विसमता ने वर्णवादी - जातिवादी समाज व्यवस्था ने शिकंजे में जकड़ कर  रखा, जिसका परिणाम पीड़ा, दर्द, छटपटाहट के सिवा कुछ नहीं है।'' ५  सुशीला टाकभौरे आरम्भ से ही धर्म से उपजी विषमता का उल्लेख करती हैं।
      '' शिकंजे का दर्द '' में निहित दलित चेतना पर चर्चा करने से पहले यह तय करना ज़रूरी है कि दलित चेतना के मानदंड क्या हो सकते हैं। चूँकि दलित चेतना की निर्मिति अम्बेडकरवाद से होती है इसीलिए यहीं से दलित चेतना के बिंदु भी निकलते है जो निम्नलिखित हैं।  ईश्वर का नकार, आत्मा का नकार,पुनर्जन्म का नकार, वर्णव्यवस्था का विरोध, समता - स्वतंत्रता - बंधुता की स्थापना, वैज्ञानिकता - तार्किकता - सम्मान व स्वाभिमान की ललक, पारंपरिक सौंदर्यशास्त्र का विरोध, लिंगगत असमानता का विरोध आदि। अब इन बिन्दुओं के आधार पर '' शिकंजे का दर्द '' में निहित दलित चेतना का अध्ययन कर सकते हैं।
ईश्वर का नकार-
      दलित साहित्य ने सर्वप्रथम ईश्वर के अस्तित्व को नकारा है। दलित चिंतकों ने सामाजिक विसंगतियों की जड़ धर्म को माना है। टाकभौरे भी शोषण के मूलाधार ईश्वर के अस्तित्व को नकारती हैं। टाकभौरे लिखती हैं '' नानी ने बदला लेने की यह नीति अपनाई थी, कठिन परिश्रम से थक कर, अपने कष्टों से घबराकर किलप - किलप कर गालियाँ देती हुई गुस्से से कहतीं- तेरी ठठरी बांध जाये, तेरो बुरो हो जाये भगवान। अरे तेरो सिंहासन डोल जाये तेको सब भूल जायें। नानी अपना आक्रोश इसी तरह निकालते हुए बड़बड़ाती थी, हे भगवान् तेरे मुंह में कीड़े पड़ जायें। कोई तोहे पानी देने वाला न रहे। तू तड़फ - तड़फ के मरे। कोई तेरे मौत मिट्टी पर न रोये '' ६ यहाँ टाकभौरे ईश्वर को आसमान से ज़मीन पर ला देती हैं यानी उसके ईश्वरीय सत्ता को नकार देती हैं। अब जबकि ईश्वर का अस्तित्व ही नहीं है तो उससे जुडी हुई धार्मिक मान्यताएं जैसे - भाग्य, मोक्ष, आत्मा, पुनर्जन्म आदि स्वयं ही ख़त्म हो जाते हैं।
वर्णव्यवस्था का विरोध 
     दलित चेतना का दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु वर्णव्यवस्था का विरोध है। वर्णव्यवस्था एक अभिशाप है जो मनुवाद से निर्मित है। मनु ने समाज को चार वर्णों में विभक्त किया जिसमें सबसे निचले तबके में दलित आते हैं। मनु ने अपनी इस व्यवस्था में दलितों से सारे अधिकार छीन लिए इसलिए वह हाशिये पर ही रहे। उन्हें जानवरों से भी बदतर ज़िन्दगी व्यतीत करनी पड़ी। दलित चिंतकों ने मनुवादी धर्म की साजिशों को समझा तथा इसका विरोध किया। वर्णव्यवस्था ने समाज में असमानता की खाई को बहुत गहरा कर दिया। टाकभौरे लिखती हैं '' जो लोग एक कुत्ते के लिए इतने संवेदनशील हो सकते हैं वे अपने पड़ोसी इंसान के प्रति इतने संवेदनशून्य, ह्रदयहीन क्यों हो गए। सिर्फ जाति के कारण, क्या हम कुत्ते से भी गये गुजरे हैं। इंसान होकर भी जानवरों से तुच्छ , उपेक्षित हैं। किसने निर्धारित की ऐसी धारणा। ऐसे दुष्टों को सजा देनी है, उनकी कुटिल नीतियों का पर्दाफाश कर के उनकी तथाकथित उच्चता - श्रेष्ठता को ख़त्म करना है।'' ७ सुशीला टाकभौरे ने अपने जीवन में प्रताड़ना व शोषण के कई स्तरों को सहा है। वह बचपन में शिक्षा के दौरान कई तरह की प्रताड़ना से गुजरी हैं। कार्यस्थल पर लोग इन्हें दलित समझ कर महत्त्व नहीं देते थे। वे इनको जातिसूचक बातों से अपमानित करते थे। सच्चाई तो यही है कि जातिवादी किसी दलित को प्रगति कि तरफ जाते हुए नहीं देख सकता और यदि दलित स्त्री हो तो उनका शिकंजा और भी कास जाता है।
समता,स्वतंत्रता और बंधुता की स्थापना
     सामाजिक असमानता, परतंत्रता, वैमनस्य का प्रतिरोध अथवा प्रतिकार दलित साहित्य का अहम् पहलू है। दलित चेतना का यह एक महत्वपूर्ण मानक है। दलित चेतना से निर्मित साहित्य सामाजिक समानता ,स्वतंत्रता और बंधुता पर बल देता है। वह सदियों से चली आ रही इस व्यवस्था कि जड़ तक पहुँच कर उसके कारणों को समझ कर उसे ख़त्म करने की बात करता है। इस संदर्भ में अर्जुन डांगले लिखते हैं. '' सामाजिक व्यवस्था और विसमता के विरुद्ध आन्दोलन खड़ा कर के एक नए समाज का निर्माण करना, यह दलित साहित्य का प्रमुख उद्देश्य है।'' ८ '' शिकंजे का दर्द '' में भी टाकभौरे इन सभी मुद्दे को गहराई के साथ उठाते हुए समता,स्वतंत्रता तथा बंधुता पर जोर दिया है। टाकभौरे बचपन से ही समाज में निहित कुव्यवस्था का शिकार होती आई हैं,चूँकि वह एक दलित स्त्री हैं इसलिए उन्हें दोहरे - तिहारे शोषण से गुज़ारना पड़ा है। स्कूल से ही उन्हें दलित होने का बोध करा दिया जाता है। '' शिकंजे का दर्द '' में वह लिखती है - '' कक्षा में ब्राह्मण,बनिए के बच्चे को सबसे आगे बैठाया जाता था। पिछड़ी जाति के बच्चों को पीछे बैठाया जाता। अछूत बच्चे पीछे सबसे अलग बैठते थे। कक्षा में यह श्रेणी वर्गीकरण जैसा था, इससे हमें अपने वर्ण और जाति का आभास हमेशा रहता था।'' 9 इस तरह बचपन से ही टाकभौरे को सामाजिक असमानता का बोध होने लगा था।यहाँ तक कि स्कूल के अध्यापक छात्रों को सजा देने में भी असमानता दिखाते थे।
      सुशीला टाकभौरे ने स्त्री होने का भी दंश झेला है। समाज में स्त्री पुरुषों से हीन समझी जाति है। टाकभौरे इस असमानता को चित्रित करते हुए लिखती हैं कि '' समाज में लड़कियों पर बहुत बंधन लगाये जाते थे। श्रम और संघर्ष करने के बाद भी उन्हें समता स्वतंत्रता का अधिकार नहीं मिलता था। लड़कियों के प्रति ऐसी भावना हिन्दू धर्म ग्रंथो के आधार पर उन्हें अबला मानने के फलस्वरूप थी।'' 10 टाकभौरे परम्परागत सामाजिक असमानता तथा व्यवस्था पर प्रहार करती हैं तथा समता, स्वतंत्रता एवं बंधुता पर बल देती हैं।
     वैज्ञानिकता,तार्किकता, सम्मान व स्वाभिमान की ललक दलित चेतना का एक और महत्वपूर्ण बिंदु वैज्ञानिकता, तार्किकता,  सम्मान व स्वाभिमान कि ललक है। इस चेतना ने सदियों से चली आ रही ईश्वरीय सत्ता से उत्पन्न कुरीतियों को विज्ञान और तर्क के माध्यम से गलत साबित कर दिया है। डॉ. सी.बी. भारती लिखते हैं '' नवयुग का एक व्यापक वैज्ञानिक व यथार्थपरक संवेदनशील साहित्यिक हस्तक्षेप है, जो कुछ भी तर्कसंगत,वैज्ञानिक, परम्पराओं का पूर्वाग्रहों से मुक्त साहित्य सृजन है हम उसे दलित साहित्य के नाम से संज्ञापित करते हैं। 11 टाकभौरे इस चेतना को अपनी आत्मकथा के माध्यम से आगे बढ़ाती हैं - उन्होंने ब्रह्मा तथा ब्रह्मा से उत्पन्न चार वर्णों को नकारा तथा लोगों को वैज्ञानिक ढंग  से सोचने पर बल दिया। टाकभौरे लिखती हैं - समाज में सामान्यतः लोगों  की यही धारणा रहती है, जाति भगवान् ने बनाई है, भगवान् के नियमों को मानना ही धरम है। धार्मिक पौराणिक कथाएं, प्रवचन उपदेश की बातें सभी के माध्यम से ब्राह्मण वर्ण को श्रेष्ठ बताते हुए कहा जाता है ब्राहमण, ब्रह्मा के मुख से पैदा हुए हैं। मैं कहती हूँ कि वे ब्रह्मा के मुख से पैदा कैसे हुए। यह बात क्यों लोग नहीं सोचते, कभी इस पर तर्क क्यों नहीं करते। कभी शंका - कुशंका क्यों नहीं करते। बीसवीं सदी के वैज्ञानिक युग में भी इस बात की सच्चाई क्यों कबूल नहीं की गई।'' 12 टाकभौरे की बात प्रासंगिक है। यह बात बिल्कुल सही है कि 21वीं सदी में भी हम पुरानी मान्यताओं व मिथकों को लेकर विकास के मार्ग पर चल नहीं सकते हैं।यह मनुष्यता तथा प्रगति के मार्ग में बाधक है।
लिंग - भेद
     भारतीय समाज में लिंग - भेद का बहुत बोलबाला है। बच्चे के पैदा होने से पहले तथा बाद में लिंग के आधार उससे व्यवहार किया जाता है। घर में लड़के के जन्म लेने पर खुशियाँ मनाई जाती है और यदि लड़की का जन्म हो जाए तो घर में मातम मनने लगता है। खान - पान तथा पहनावे से लेकर शिक्षा तक में उनसे भेद - भाव किया जाता है। टाकभौरे अपने माता - पिता के शिक्षा के विषय में लिखती हैं '' पिता रामप्रसाद घांवरी, अपने पैतृक गाँव  नेमावर के सरकारी स्कूल में स्वर्ण बच्चों से अलग बैठकर दूसरी कक्षा तक ही पढ़ सके थे। हम सब बहन भाइयों को अक्षर ग्यान पिता ने ही कराया था। माँ पन्नाबाई स्कूल नहीं जा सकी थीं। '' लड़की जात पढ़ कर क्या करेगी '' यह भावना और छुआछूत कि पराकाष्ठा के कारण स्कूल के दरवाजे उनके लिए बंद ही रहे। 13 इस उद्धरण में '' लड़की जात पढ़ कर क्या करेगी '' पर गौर करना चाहिए। यह भावना भारतीय समाज में कूट - कूट कर भरी थी। आज तो हालात में काफी सुधार हुआ है, फिर भी अभी काफी बदलाव कि जरूरत है।
     सुशीला जी अपनी आत्मकथा में दलित समाज में व्याप्त विसंगतियों को भी दिखाती हैं। स्त्रियों के मामले में पुरुष स्वर्ण ही होते हैं चाहे वह दलित समाज के हो या गैर दलित समाज के दलित समाज गैर दलित समाज से प्रताड़ित होने के बावजूद अपने परिवार के स्त्रियों को प्रताड़ित करता है। इस विरोधाभास को टाकभौरे अपनी आत्मकथा में उल्लेख करती हैं। टाकभौरे नौकरीपेशा होने के बावजूद अपने परिवार तथा अपने पति से लगातार प्रताड़ित तथा अपमानित होती रहती थीं। टाकभौरे लिखती हैं '' छोटी - छोटी बातों पर अपनी नाराज़गी जताना पति का गुण होता है, जैसे अपने इन्ही गुणों से वह खुद्दार व दमदार पति माना जाता हो। खाना परोसने में देरी होने पर वे खाना नहीं खाते थे, तब उन्हें घंटों मनाना पड़ता था। कभी - कभी वे स्पष्ट शब्दों में कहते थे - मेरे पैरों पर अपना सिर रख कर मांफी मांग तब मैं तेरी बात मानूंगा। 14 इस उद्धरण में अमानवीयता की सारी हदें पार कर दी गयी हैं। पैर पर सर रख कर मांफी मंगवाना ये दंभ पित्रसत्तात्मक समाज में बहुत गहराई तक व्याप्त है। पुरुष, स्त्री को यह आभास कराना चाहता है कि तुम्हारा अस्तित्व मेरे पैर पर आकर ख़त्म हो जाता है। इसी तरह से दलितों में जो जातिगत स्तर है तथा उनका एक दुसरे से कैसा व्यवहार है इसका भी विधिवत उल्लेख टाकभौरे अपनी आत्मकथा में करती हैं।
     निष्कर्षतः '' शिकंजे का दर्द '' दलित चेतना से निर्मित एक आत्मकथा है। टाकभौरे दलित विमर्श तथा दलित चेतना के बीच के फर्क को बखूबी समझती हैं इसलिए उनकी आत्मकथा में कोई कमी नज़र नहीं आती है। उन्होंने दलित चिंतन को ठीक से समझा है इसीलिए '' शिकंजे का दर्द '' वैज्ञानिकता तथा तार्किकता कि स्थापना करता है। यह आत्मकथा दलित स्त्री की पर व्यापक प्रकाश डालती है। आत्मकथा के अंतर्गत यह स्पष्ट किया गया है कि धर्म ही सभी विसंगतियों तथा कुरीतियों का मूलाधार है। समाज में जो असमानताएँ हैं वह इसी की देंन है। इसीलिए टाकभौरे अपनी आत्मकथा में धर्म को ख़त्म करने की बात करती हैं।
     यह आत्मकथा न केवल किसी लेखक या व्यक्ति विशेष की है बल्कि सम्पूर्ण दलित समाज का प्रतिनिधित्व करने वाली महागाथा है जिसके अंतर्गत सदियों से चली आ रही उनकी सामाजिक,सांस्कृतिक, आर्थिक, शैक्षिक, धार्मिक आदि स्थितियों को चित्रण हुआ है। समाज में सदियों से व्याप्त विसंगतियां, अन्याय एवं छल - प्रपंच इस आत्मकथा के माध्यम से सशक्त रूप से अभिव्यक्त हुए हैं। आज ज़रुरत है कि समस्त अच्छे - बुरे, छोटे - बड़े उत्कृष्ट - निकृष्ट के निर्धारक मापदंड मनुष्य के गुण कर्म उसकी योग्यता- कुशलता हो। दलित चेतना में निहित स्वतंत्रता,समानता,बंधुता एवं न्याय के मूलोद्देश्य को प्राप्त करने की मुहिम में इस आत्मकथा का विशिष्ट स्थान है। यह बुद्धजीवी चेतना को कुरेदकर समाज कि विसंगतियों पर विचार करने के लिए बाध्य करने वाली आत्मकथा है साथ ही सदियों अज्ञानता और अशिक्षा के कारण शोषण व अन्याय सहने पर विवश अपने जातिबंधुओं को जागृत करने तथा शिक्षित, समृद्ध एवं आत्मसम्मानपूर्वक मानवीय जीवन के पथ पर अग्रसर करने हेतु सार्थक पुकार है
संदर्भ :
1. तुलसीदास
2.ओमप्रकाश वाल्मीकी. दलित  साहित्य का सौदर्यशास्त्र,पृष्ठ.29
3.शरण कुमार लिंबाले - दलित  साहित्य का सौदर्यशास्त्र,पृष्ठ.58
4.राजू राम- बाबा साहब  डॉ.भीमराव आंबेडर,पृष्ठ.160
5.सुशीला टाकभौरे - शिकंजे  का दर्द , मनोगत
6.वही, पृष्ठ.27
7.वही पृष्ठ.241
8.अर्जुन डांगले - दलित साहित्य-  अभ्यास पृष्ठ.2
9.सुशीला टाकभौरे. शिकंजे का दर्द पृष्ठ.18
10.वही पृष्ठ.38
11.डॉ. सी.बी. भारती - दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र अभ्यास हंस अं·.1 पृष्ठ.70 - 71
12.सुशीला टाकभौरे -शिकंजे का दर्द पृष्ठ.176
13.वही पृष्ठ.15 -16
14.वही पृष्ठ144
जामिया मिल्लिया इस्लामिया
                                 नई दिल्ली

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