इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

स्‍वार्थ के वायरस

स्वार्थ के वायरस (व्यंग्य संग्रह)
प्रकाशक - अनय प्रकाशन 1/20
महरौली
नई दिल्ली 110030
समीक्षक - यशवंत

यशवंत मेश्राम
व्यंग्य के संबंध में निम्नलिखित कथन हैं, जो प्रसिद्ध हैं -
1. '' विकृतानि अंगानि सम्यात '' (शब्द कल्पद्रुम)
2.'' अंतस के खण्डन का एक प्रतिरोधात्मक चीत्कार ही व्यंग्य है।'' - सुरेशकांत
3. '' हास्य माध्यम है, व्यंग्य लक्ष्य।'' - रवीन्द्र त्यागी
4. '' व्यंग्य इस सीमा तक कटु हो सकता है कि वह किंचित भी हास्यजनक न हो। वह युग की समूची परिस्थितियों की धज्जियाँ किसी को भी क्षमा किये बगैर उड़ाता है।'' - ए. निकल
5. '' व्यंग्य शब्द में मानव तथा उसके आचरण की समस्त त्रुटियों पर किया गया प्रहार है।'' - जॉन. एम. बुलेट
6. '' व्यंग्य समाज को दुलारकर सुधार के अनुकूल बनाना नहीं, अपितु उसे छेड़कर और चिढ़ाकर स्वदोष निरीक्षण के लिए प्रेरित करना है।'' श्रीपाद कृष्ण कोल्हाटकर (मराठी)
7. '' व्यंग्य का कोई स्ट्रक्चर नहीं है। '' - हरिशंकर परसाई
          उपर्युक्त बातें वीरेन्द्र सरल जी के व्यंग्य संग्रह '' स्वार्थ के वायरस '' में कहाँ तक आ पाई हैं, क्योंकि व्यंग्य स्थापित विधा है। बेजान मूर्तियों की अभिव्यक्ति, जबानवाले समझ पायेंगे? सुजान होकर अनजान मूर्तियों वाला देश कैसे बन गया? मूर्तियाँ श्रद्धा मात्र के लिए नहीं होतीं, दिशा निर्देश भी करती हैं। मानव ने मूर्तियों को ही दिशा में ले जाने का निर्णय ले लिया। मूर्तियों की सोच दृष्टि प्रदान करती हैं। प्राण-प्रतिष्ठा करवानेवाले मरते-खपते हैं। मूर्तियाँ गरीबों-पीड़ितों की प्रतीकात्मक भाषा हैं। पौराणिक मूर्तियों को छोड़ दो। वे धार्मिक हैं। भ्रष्टाचारों से राहत नहीं। भ्रष्टाचारी नृत्य का निराकरण नहीं? जिससे न्याय-व्यवस्था प्रभावित है। गहरी चोट करती है। जेंडर परिवर्तन कर प्रथम महिला का स्थान मांगना, न मिलने पर अटैक आना और मौत हो जाना - यहाँ कहानी ज्यादा, व्यंग्य कम है! वर्तमान में कोई भी पीने की धमकी पर रूपया शराब पीने को देगा? सरल जी देते होंगे! शराब टेंशन ही बढ़ती है। पृष्ठ 33 का '' मत '' बराबर '' सम्मत '' होगा? भाव-विचार अर्थ भ्रमात्मक है। ''आज तो भिक्षा में मुझे सलाह दो, राय दो, मशविरा और मत दो।'' (पृ. वही) लोक सम्मत में तो रावण आज भी अच्छा है। (वयं रक्षाम: - आ. चतुरसेन शास्त्री) रावण में दुष्प्रवृत्तियाँ कम ही थी। मुख में राम बगल छुरी नहीं थी। नकली सीता का प्रसंग मिथक -लोकमिथक सम्मत ही नहीं है। और रावण की पीड़ा में यथार्थ नहीं है। लोग अपनी दुष्प्रवृत्तियों को रावण में थोप देना चाहते हैं। दशहरा वास्तव में रावणोत्सव ही है। भेदाभेद हो जाये। उजाले में भी लोग दुष्कर्म में लगे रहते हैं। बुरे कर्म की प्रवृत्ति वाली नाभि अमरता से बढ़ रही है। नकल की असल और असल की नकल रावण की पीड़ा है, रावण की नहीं। '' सड़क पर मछली पालन '' सुविधा-पति का प्रतीक है। श्रमसाधकों के प्रति तंग जीवन नसीब होता है। व्यंग्य में पुलिस पत्रकारिता व्यवस्था का '' छल '' दर्शाया गया है, जिसके कारण '' सपनों के सौदागर '' गरीबी, भ्रष्टाचारी, बेकारी, भूखमरी का जिन्न समाप्त नहीं हो पाते। भयंकर सम्मेलन में उपर्युक्त विशाल समस्याएँ हैं? ये अंधकार पुरम में अवतरित हैं? यह व्यंग्य ही अंधकारमय है जो धार नहीं बन पाया। ''गलती करो, क्षमा मांगो और चुनाव जीतो '' अभियान निरर्थक लगा। पंद्रह लाख की वादा-गलती पर मोदी शायद ही माफी मांगें। इसे अगले व्यंग्य में भी नहीं सुधारा गया। रूपयों से या रूपयों के, सारे लोग समस्याग्रस्त हैं। यहाँ पर लेखन सरल कैसे हो गया? अवतारी पुरूष की ओर चल दिए। लगता है सरल जी धार्मिक-रूढ़ि परंपरा में संस्कारित हुए हैं। जिससे साहित्यिक रूढ़ि कायम रखी है। '' इस युग के सारे लोग इस समस्या से ग्रस्त हैं '' में इसका प्रयोग शायद ही आवश्यक हो। (पृ. 51) व्यंग्य अतिशयोक्ति होता है! पृ. 54 पर लोक सीमा वर्णन-प्याज ने नारद को बचाया। असली बिचौलियों से व्यंग्य दूर चला गया। पकड़ से बाहर हो गया। प्रकोष्ठ बच गया, ऊँगली ही हाथ लगी। '' स्वार्थ के वायरस '' का निष्कर्ष '' सिया राम मय सब जग जानि '' वीरेन्द्र सरल को सरल लगा। इसाईमय, ब्रह्ममय, जैनमय, रोमियो-जूलियटमय, शिरी-फरहादमय, हीर-रांझामय, ढोला-मारुमय, लोरिक-चंदामय का क्या होगा? ये सब पृष्ठ 119 की शुद्ध प्रेम की भाषा '' स्वार्थ के वायरस '' (पृ. 58-66) से विलोपित हैं। एकवाद स्वार्थ में डूबा व्यंग्यकार, तंगकारक तो होगा ही। बाकी पंथों के तंतु कहँ जायेंगे बंधु जी? आजकल सवार्थवश धर्मनिरपेक्ष बनाम पंथनिरपेक्ष चर्चा जोरों पर है। मानव को सापेक्ष क्यों बनाया जाय? मानवीय स्वतंत्रता लाना व्यंग्य का प्रधान लक्ष्य है। '' स्वार्थ के वायरस '' बाप रे बाप! ही समाप्त थी। प्रभु देवता पर वायरस दो मतों में विभाजित हो गया। घर का भी और घाट का भी। एक अधिविश्वास के अंधविश्वास में, दूसरा मनुष्य लालच प्रतीक में। पूरे संकलन में मनुष्य से बड़ा भगवान को पाते हैं। वीरेन्द्र जी के लेखन पर मेरी स्पष्ट राय है - खुदा के बंदों को खुदा ने ही बिगाड़ रखा है तो स्वार्थवश ब्रह्म की चिंता की! यदि वे स्वार्थ कुण्डली न लिखते। खुदा सामने आए तब तो, वीरेन्द्र जी के शब्दार्थ स्पष्ट हों। इसी कारण '' वन महोत्सव '' विवरणात्मक हास्य होकर रह गया है। और योजना देवी के लिए परियोजना देवी की आवश्यकता पड़ी! सफल व्यंग्य है। जहाँ लोकतंत्र की जड़ें मजबूत तो हैं, वे जड़ी-बूटी से ही दवाई बनाते हैं। फिर दवा कहीं और सप्लाई की जाती है। जहाँ चूहों का रंग और चूहों का '' तन-मन-धन '' निरंतर बदनाम हो रहा है चूहों के रंग में कहीं कोई कमी नहीं आई, उल्टे वे लाल टमाटर बन गए! यही पताल '' धरती सुराज अभियान '' में व्यवस्था की ढिलाई उजागर करते हैं। महात्याधुनिक मेम ने भारतीय संस्कृति का फूट डालो-राज्य करो का ब्यौरा प्रस्तुत किया। फिर वीरेन्द्र जी ने उल्टी गंगा को सीधा बहवा दिया। पर्दा प्रथा (स्कार्फ लपेटना) ही समस्याओं की जड़ है। जो आधुनिक आदर्श आदमी की पुरस्कार से भान करता है कि लेखक सारी घटनाओं को झेल चुका है। जुगाड़ होगा? या किया होगा? अथवा करेंगे? न भी हुआ होगा तो भानुमति के पिटारे से सुराग लगा तो ली होगी? ऊपर से नीचे तक राजनीतिक खोखलेबाजी का चरित्र सर्वोत्तम की ओर अग्रसर है। लेखन के दिल-दिमाग की दौड़ाई में खोट होने पर भी अ-खोट की प्रस्तुति दी। सादर धन्यवाद। अब बाहर के भेदी लंका ढहायेंगे! महान सम्मानों से, क्योंकि झूठ बोलना हमारी परंपरा में है।(पृष्ठ 102) लेखक झूठे नहीं होते, झूठी परंपराओं को तोड़ते हैं। प्रयास से पकड़ते हैं और मोगेम्बो खुश हुआ।(पृष्ठ 40) से पंचायत के वार्ड पंच से महापंचायत के प्रमुख तक सच बोलने वालों की खबर भी लेते हैं। फाइल के प्रमाण-पत्र भानुमति के पिटारे हैं।(पृष्ठ 97) चुनावी हार-जीत फिल्मों के गीतों के तर्ज पर नहीं, अटपटी चालों से तय होती है। '' फोकटचंद का मोबाइल '' हास्य जरूर है जिसमें व्यंग्य की नोक नहीं। सांड लाल कपड़े देखकर बिदकते हैं, ये तो वीरेन्द्र जी ही जानें। जनम-जनम के साथ वीरेन्द्र जी की कठिनाई है भ्रम! यदि पृष्ठ 102 से मिलान करें तो जनम-जनम का साथ मोबाइल तो है ही नहीं। प्रश्नवाचकता में पढ़ेें तो पृष्ठ 106 से 108 मात्र हास्य है। '' जेबकतरों का सम्मान '' में जेबकतरे अ-व्यवस्थापिका का प्रिय मनुष्य है जहाँ व्यवस्था के रंग के समक्ष इन्द्रधनुषी रंग बेरंग हो चुका है।
          व्यंग्य की भावधारा संकलन में अस्पष्ट है। गड्ड-मड्ड हो गई है। '' हमारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण और शिक्षा की बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ मन के किसी कोने में पड़े-पड़े आँसू बहाने को मज़बूर हैं।'' (पृष्ठ 114) और '' सियाराम मय सब जग जानी '' (पृष्ठ 66) में तालमेल नहीं बनता। कृपा और आशिर्वाद देने-पाने से लेखन वीरेन्द्र जी की नजरों से भले ही स्वीकृत हो, दृढ़ नहीं बनते। विचार तो तर्क की कसौटी पर निर्मित होते हैं। अंधविश्वास की भट्टी में दण्डवत किया जाता है। (पृष्ठ 116) परंतु वीरेन्द्र जी का लेखन तो तर्क के विश्वास पर तनकर लिखा जाता है, घूरते हुए नहीं निकल जाता। (पृष्ठ 116) '' कलिमल बाबा की जय '' में वकील साहेब के तर्क और कलिमल बाबा के उत्तर में डरना क्यों? मालूम पड़ता है, वीरेन्द्र जी रूढ़िवादी जड़ परंपरा को बार-बार दुहराना चाहते हैं। '' आज दुनिया इक्कीसवीं सदी में पहुँच गई है और तुम वही आदिमयुग में जी रहे हो। ''(पृष्ठ 118) से पृष्ठ 66 और पृष्ठ 116 की भावधारा का कोई संगम नहीं बैठता। अर्थात वीरेन्द्र की व्यंग्य विचार भटक गई। यह तो प्रेमजन्मेजय के शब्दों से भी स्पष्ट होती है - '' व्यंग्य लेखक में खराबी यही है, बात हिन्दुस्तान के अर्थव्यवस्था की करता है और पहुँच अमेरिका के द्वार जाता है। रक्षक पुलिस की बात करते हुए भक्षक पुलिस की बात करने लगता है। देश सेवक नेता की बात करते हुए किसी स्वयं सेवक भ्रष्टाचारी की बात करने लगता है। और तो और, जब-तब धर्म की हानि होने पर अवतरित होने वाले प्रभुओं की चर्चा करने लगता है। बहुत बहकता है व्यंग्यकार। हे व्यंग्यकार भैया! तुम तो काल्हू की बैल की तरह उस मार्ग पर चलो, जो तुम्हें दिखाया जा रहा है। काहे इधर-उधर ताक-झाँक करते हो ज्यादा। ताक-झाँक करोगे तो लेखकीय बिरादरी से बाहर हो जाओगे, हुक्का-पानी बंद हो जायेगा।'' (इन्द्रप्रस्था भारती, जनवरी-मार्च 2014, पृष्ठ 117, हिंदी अकादमी दिल्ली 110007) व्यंग्य के पग जेल में होते हैं। मीराबाई ने इससे लोहा लिया। '' मीराबाई ने समाज की तमाम लाज-लज्जा त्यागकर खुलकर गाया - पग घुँघरू बांध मीरा नाची रे।'' (विक्रम शर्मा, इन्द्रप्रस्था भारती, अप्रेल-जून 2013, पृष्ठ 138, हिंदी अकादमी दिल्ली 110007)
          बेरंगों में ही प्रेम नहीं होता। प्रेम की अंतिम परिणति मौत ही है। यह कांटों की सेज है। जहाँ चलना कठिन है। प्रेम रंग की आधुनिकता स्वार्थों का वायरस है। सुदर टिकाऊ प्रयास। पर वीरेन्द्र जी अपनी उलझन को सुलझा नहीं पाते और पुन: अपनी धारावाहिक दोहराते हैं। '' जड़-चेतन-जग-जीव-जत, सकल राममय जानि। '' (पृ. 120-121) प्रेम के बहाने वीरेन्द्र जी रहस्यवाद के रसातल को छूने लगते हैं। वीरेन्द्र जी सुधरने-सुधारने का किस्सा तो ले लेते हैं पर पता नहीं, फिर डर से क्यों बच निकल भागते हैं? इसका उदाहरण '' अंग्रेजी लाल की हिंदी '' है। रोना-धोना ज्यादा! प्रत्येक महकमा कर्तव्यहीन कुछ ज्यादा हो गया है। इस पर वीरेन्द्र जी को बधाई देनी ही होगी।
          देश की कानूनी हालत पर '' बंदरों की नसबंदी '' में -  '' क्या कोई पेड़ अपना फल खाता है? '' (पृ. 141) संकेत देश के उन कर्णधारों पर ही है जो अनाप-शनाप बयान देते रहते हैं - '' इसमें विदेशी ताकतों का हाथ है। मुझे बदनाम करने की साजिश है। इसमें मेरा कोई हाथ नहीं है।'' (पृ. 144) तोड़-मरोड़कर बयान पेश किया गया। करना, भाषावैज्ञानिक पृष्ठभूमि पर ही प्रश्नचिह्न लगाती है। इसीलिए वीरेन्द्र जी सनातनी उपमानों को शामिल करते हैं, जो दर्शाता है कि '' भैयाजी  की आँखें '' ही सरलकोण है। उलझी को सुलझाने का ऑपरेशन व्यंग्य है! सोच-विचार करें! पृष्ठ 146 पर इसका सुंदर चित्रण वीरेन्द्र जी ने किया है। भविष्यदृष्टि अंधकारमय क्यों है? कला, करनेवाला '' भलाईदास '' से इसे समझ सकते हैं। बिजली देवी उजाला कम, अँधेरा ज्यादा देती है। यहाँ भी सनातन दृष्टिकोण को वीरेन्द्र जी ने उपयोगी बना दिया कि लोगों में पानी की कमी है। पानी है तो नानी है। इसी को बचाने के फलस्वरूप सामाजिक-राजनीतिक-धार्मिक मानसमूह कमजोर पड़ते हैं। जबकि कुदरत ने चेतना की संपन्न दृष्टि दी है। इस नजर से निष्कर्ष '' स्वार्थ के वायरस '' देती है -
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती, मानुष, चून।।
          रहिमन के पानी को वीरेन्द्र जी भी जानते हैं। अब हम वीरेन्द्र जी के पानी (मूल्य) जो '' स्वार्थ के वायरस '' व्यंग्य संग्रह में व्यंग और व्यंग्य से पीते हैं। विकृति या दोषों का धारदार शैली में न होना व्यंग है, जो '' ऋणंकृत्वा मद्यम पीबेत् '' , रावण की की पीड़ा'', '' सपनों के सौदागर'', '' संकटमोचन समाज '' आदि में सम्मिलित है। विकृतियों-दोषों पर किया गया कठोर आघात व्यंग्य होती है। '' मुर्गे का चौदस प्रेम '' में होता तो है पर करुणा उछलती नहीं है, खुशी का इज़हार होता है।
          व्यंग्य के माध्यम हैं - पैरोडी, स्वगत-कथन और वृत्तांत। पैरोडी को छोड़कर शेष दोनों का प्रयोग वीरेन्द्र जी ने किया है। परंतु वृत्तांत देने में तत्प्रचलित मान्यताओं और आदर्शों पर ठेस लगाकर चूर-चूर करने में कमजोर पड़ गए हैं। '' देवी की पूजा करने बाद ही उन्हें होश आयेगा। '' (पृ. 154) '' बाप रे बाप, सचमुच इनके पास खतरनाक सीढ़ी होती है जो हर बार इन्हें फंसने से बचा लेती है।'' (पृ. 141) आदि बहुतायत में मिलेंगे। ये तत्प्रचलित मान्यताओं को चूर-चूर नहीं करते - '' मैं तुरंत वहाँ से निकल गया।'' (पृ. 126) '' मैं डर के मारे उनके चरणों में दण्डवत हो गया और उनको घूरते हुए वहाँ से निकल गया।'' (पृ. 117) '' वहाँ एक बार फिर से सामूहिक ठहाका गूँजा और पुण्य कमाने की तैयारी शुरू हो गई। ''(पृ. 70) .... आदि। व्यंग्य के वातावरण में संगत क्यों आया! जबकि व्यंग्य का उद्भव ही विसंगत वातावरण में होता है।
          वीरेन्द्र जी ने हास-परिहास, वाग्वैदग्ध, उपालंभ, अतिशयोक्ति, वक्रोक्ति, विरोधाभाष्, असंगत कथन, भर्त्सना, आक्षेप, छिन्द्रन्वेषन, उपदेश, वक्रोक्ति का प्रयोग भरपूर तो किया अर्थात उद्दीप्त उजागर जरूर किया पर भाव-विचार में तालमेल नहीं बैठने से कला-कल्पना और प्रज्ञा सामान्य दशा में पहुँची और पाठक अपनी कल्पना से अनेकानेक छलांग लगा नहीं पाया। (यदि दूसरे पाठक ऐसा महसूस नहीं करते तो मेरे विचार स्वत: खंण्डित माने जाएँ, पर ठोस उदाहरण '' स्वार्थ के वायरस '' से ही प्रस्तुत करना होगा।) वैसे भी, समीक्षा लेखन से के पीछे ही चलती है। व्यंग्य के प्रतिमान बदल भी सकते हैं। वीरेन्द्र जी अपने स्वगत-कथन में अपने विचार मढ़वाने की कोशिश करते हैं जबकि व्यंग्यकार अपने विचारों से व्यक्ति को कायल करके उसे मनवा लेता है। यही कमी मुझे वीरेन्द्र जी के व्यंग्य में लगी। जैसे उपर्युक्त पृ. 66, 120, 121 के उदाहरणों से स्पष्ट होता है। सुरेशकांत के शब्दों में - '' जिन रचनाओं का प्राण व्यंग्य है, वे किसी भी विधा में लिखी जाय, व्यंग्य ही कहलायेगी।'' (हिंदी गद्य में व्यंग्य और विचार - राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, पहली आवृत्ति, 2013, पृ. 69) चूँकि व्यंग्य स्थापित विधा है तब व्यंग्य रचना को उन्हीं मापदण्डों में परखने पर वीरेन्द्र जी की रचनाएँ भाव-विचार-प्रज्ञा की प्रतिबद्धता के अभाव में शिथिल पड़ती दिखाई देती हैं, जिसमें व्यंग्य की उक्तियों का पृथक मूल्यांकन हो सकता है। फिर भी वीरेन्द्र सरल अपने तेज प्रयास से व्यंग को व्यंग्य तक पहुँचा ही देंगे। शुभकानाओं के साथ! कि मैं '' स्वार्थ के वायरस '' के लिए व्यंग्य से संबंधित अन्य पुस्तकों और उनके पाठों का पुन: अवलोकन कर सका।
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पता 
शंकरपुर, वार्ड नं. 10,
गली नं. 4, राजनांदगाँव,
पिन - 491441, (छ.ग.)

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