इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

डॉ. कौशल किशोर श्रीवास्‍तव की दो कविताएं

            बसन्त    

जो विषम वाण से सज्जित है
मकरध्वज रथ को साथ लिये
मन पर शासन करने आया
ऋतुराज मदन को साथ लिये
स्वागत में पुष्पित पूर्ण धरा
कल कल झरना विरूदावलि है
मदमस्त पवन है अस्त शस्त्र
सेना उसकी भ्रमरावलि है
उच्छंृखल बहती चलती थी
सकुचाकर लज्जावनत हुई
किसा स्पर्श हुआ उसको
मर्यादित चंचल नदी हुई
वृक्षो ने वस्त्र नये पहिने
सर मुकुर बना कर देख रहे
कब लता उठे वे जरा
कब से उसका रूख देख रहे
तन बोराये मन बोराये
बोराये आमए बगीचो में
पदत्राण रहित वे नाच रहे
जो चलते सदा गलीचो में
पक्षी पेड़ो पर नाच रहे
नर्तन रत पुष्प हुये सारे
ऋतुराज नचाता तितली दल
नर्तन रत जग को करता रे
हिम ऋतु में सोये सिकुड़े थे
हिम खण्ड पिघलने लगते है
नदियों में अपने को खोकर
सागर तक चलने लगते है
वन श्री कर जागृत पुष्प खिला
केशरिया भाव जगाता रे
फिर वन नि:संग क्यों सोंप उसे
वह प्रचार ग्रीष्म को जाता रे
उदयाचल शिशिर ग्रीष्म पश्चिम
है ग्रीष्म पृष्ट और पूर्व शिशिर
है ऋतु वसन्त जलता दीपक
और शिशिर पिघलता एक तिमिर

          क्या वह धुंधलका है
प्रकाश कुछ छिपा नहीं सकता।
और अंधकार कुछ प्रकाशित नहीं कर सकता।
सब कुछ छिपा कर रखता है।
मगर इन दोनो का संधि स्थल
रहस्यमय लगता है।
बिल्कुल एक किशोर या किशोरी
जैसा वह विस्तृत क्षेत्र/जिस में प्रकाश
डूबता जाता है अंधकार में/या
अंधकार क्रमश: निर्वस्त होता
जाता है प्रकाश के समक्ष।
उसका क्या नाम सकता है घ्
संध्या तो हो नहीं सकता।
संध्या तो दिन और रात का
संधि स्थल है।
छाया के लिये प्रकाश
और सतह के बीच में एक
अमेद्य पदार्थ होना चाहिये/पर
छाया भी वह क्षेत्र नहीं है।
जिसे प्रकाश एवं
अंधकार के मध्य का स्थान कहां जा सके।
मेघो की धरती पर परछाई
वह स्थान हो सकती है क्या घ्
जलते दीपक और अंधकार के
गहन तिमिर के मध्य/वह
क्षेत्र हो सकता है जहाँ अंधकार
प्रकाश में चहलकदमी करता है
और प्रकाश अंधकार को 
अनावृत करने का प्रयत्न करता है।
ऐसा होता है वह विस्तृत क्षेत्र
जहाँ जागरण क्रमश: समाधि में
डूबता है और समाधि क्रमश:
जागरण में खुलती है।

पता

विष्णु नगर,परासिया मार्ग
छिन्दवाड़ा ( म.प्र.)पिन 480002
मोबाईल 09424636145

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