इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

हर तरफ चली है

कविता सिंह ''वफा ''

हर तरफ चली है बात अपनी शनासाई की
साथ ही बात है अब तेरी बेवफाई की।

अब भी वही रात है चांदनी भी फैली है
पर सियाही कितनी है शब तेरी जुदाई की ।।

तस्कीन - ए - दिल था फिर से आमद का तेरे
कैसे कहूँ भूल गया बात थी रुसवाई की !!

रूदाद - ए - ग़म कह न सकी ख़त्म आशिकी का
बात दूर तक़ गई है तेरी आशनाई की !!

तुझमें '' वफ़ा '' थी नहीं कोई कहाँ माना ये
लोग जानते थे बात तेरी मसीहाई की ।।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें