इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 28 मई 2016

गरजत.घुमरत आबे रे बादर

सुशील भोले

गरजत.घुमरत आबे रे बादर, मया.पिरित बरसाबे
मोर धनहा ह आस जोहत हेए नंगत के हरसाबे... रे बादर....
जेठ - बइसाख के हरर - हरर म, धरती ह अगियागे
अंग - अंग ले अगनी निकलत हे, छाती घलो करियागे
आंखी फरकावत झुमरत आके, जिवरा ल जुड़वाबे ... रे बादर...
तरिया - नंदिया अउ डबरी ह, सोक - सोक ले सुखागे हे
कब के छोड़े बिरहिन सही, निच्चट तो अइलागे हे
बाजा घड़कावत आके तैं हए फेर गाभिन कर देबे ... रे बादर....
जीव- जंतु अउ चिरई.चिरगुनए ताला - बेली होगे हें
तोर अगोरा म बइठे - बइठे, अधमरहा कस होगे हेंं
जिनगी दे बर फिर से तैं हए अमरित बूंद पियाबे ... रे बादर...
नांगर - बक्खर के साज - संवांगा, कर डारे हावय किसान
खातू पलागे गाड़ा थिरागे, अक्ती म जमवा डारे हे धान
अब तो भइगे आके तैं ह, अरा - ररा करवाबे... रे बादर...

संजय नगर, रायपुर ( छ.ग.)
मोबा. नं.  98269.92811, 80853.05931

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