इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 28 मई 2016

धान के कटोरा के '' बीजहा धान ''


विनय शरण सिंह

        छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से छत्तीसगढ़ी रचनाओं की बाढ़ सी आ गई है। इनमें से ज्यादातर रचनाएंछत्तीसगढ़ी भाषा में प्रकाशित किताबों में केवल संख्यात्मक वृद्धि करती हुई लगती है। इन रचनाओं में छत्तीसगढ़ की माटी महतारी के प्रति प्रेम एवं यहाँ के लोक - जीवन के कार्य व्यवहारों की झलक तो है पर छत्तीसगढ़िया जीवन के संत्रास एवं पीड़ा को अभिव्यक्त करने में कम रचनाएं ही समर्थ दिखाई देती है इस दिशा में रचनाकारों के प्रयास अथवा प्रतिबद्धता में कही कोई कमी है, ऐसा नहीं है। ऐसा लगता है कि बदलते समय के साथ लोक - जीवन की जटिलताओं की तह में पहुंचकर उसे माया में व्यक्त करने में बहुत से कलमकारों की लेखनी में वह पैनापन नहीं आ पाया है। ऐसे में जीवन यदु जी के छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह धान के कटोरा की कविताएं सुधी समीक्षकों एवं पाठकों को यह आश्वस्त करती है कि छत्तीसगढ़ी में भी ऐसी कविताएं लिखी जा रही है जैसी अन्य  समृद्धि भाषाओं में लिखी जा रही है।
         धान के कटोरा में जीवन यदु जी की प्रारंभिक रचनाओं से लेकर प्रकाशन पूर्व तक लिखी गई कविताएं संकलित है। जीवन यदु जी प्रगतिशील विचारधारा के कवि है। संकलन की कविताओं में उनकी इसी प्रगतिवादी चेतना के स्वर साफ - साफ सुनाई देते हैं। कवि को छत्तीसगढ़ के किसानों और मजदूरों के प्रति गहरी सहानुभूति है। आजादी के इतने वर्षों बाद भी उनकी माली हालात में कोई खास सुधार नहीं आया है। अन्नदाता खुद आज भूखों मर रहा है। उसमें अपने आँसू पोंछने की भी सामर्थ्य नहीं रह गई है।
भूख के मुसुवा जिनगी ला खोले तरी - तरी भइया।
आँसू ला कामें पोंछय अँचरा लरी - लरी भइया।।
       
        भूखे किसान के सिर पर कर्ज का बोझ लदा हुआ है। उसे अपने भूखे पेट की जितनी चिंता नहीं है, उससे अधिक उसे कर्ज चुकाने की चिंता है। उसकी पीड़ा की सुध लेने वाला कोई नहीं है। बेबस किसान बादलों से प्रार्थना करता है कि वे इतना जल बरसाएॅ कि उसके गले से कर्ज का फँदा छूट जाए।
आसो अइसन बरस रे बादर, कुछ तो करजा छूटे रे।
मुड़ के बाझा उतरे तो कुछ, गर के फँदा छूटे रे।।

         कवि किसानों की इस स्थिति के लिए भ्रष्ट व्यवस्था को जिम्मेदार मानते हैं। भ्रष्टाचार ने शिष्टाचार का रुप धारण कर लिया है। सत्ता के शिखर पर बैठे लोगों को पैतरेबाजी से फुरसत नहीं है। उन्हें आम जन की तकलीफों से कोई सरोकार नहीं है।
गोल्लर मन के झगरा मा खुरखुँद होवत हे बारी।
चोर  हवँय रखवार तो बारी के कइसे रखवारी।।

         आजादी के लिए संघर्ष के दिनों में तब की पीढ़ी ने सपना देखा था कि आजादी के बाद देेश में रामराज्य आएगा। किन्तु यह सपना, सपना बनकर ही रह गया। निराश और हताश लोगों ने फिर भी उम्मीद नहीं छोड़ी है। अब तो यह पीढ़ी - दर - पीढ़ी चलने वाली बीमारी जैसी लगने लगी है। कवि ने देशवासियों की इस मनोदशा का बखूबी चित्रण किया है।
हम देखत हन अउ पुरखा मन देखिन पारी - पारी।
रामराज के सपना लगथे पुरखउती बैमारी।

        यदु जी अपनी कविताओं के माध्यम से अपने समय को जीते हैं। उसके नब्ज को टटोलते हैं और जहाँ उन्हें विसंगतियाँ दिखाई देती है वहीं करारा व्यंग्य करते हैं। यह उनकी शैली की विशिष्टता उन्हें छत्तीसगढ़ी के रचनाकारों के बीच अलग पहचान देती है। आज के जनमानस के बाजारवाद के प्रभाव पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं-
बस्सावत बस्ती म टी.वी. खुसरगे।
सपना देखावत हे बस महर - महर के।

000
माल म खुसरबे त जेब ल टमर ले
हटरी झन खोज वो तो कब के नंदा गे।।

        दुनिया में प्रजातांत्रिक मूल्यों की स्थापना के बाद भी आज का मानव समाज वर्ग - भेद की पीड़ा से संत्रस्त है। छत्तीसगढ़िया समाज भी इससे अछूता नहीं है। एक ओर सुविधा सम्पन्न लोग है तो दूसरी ओर झोपड़ियों में रहने वाले साधन हीन आम जन। सुविधा भोगी वर्ग प्यास लगने पर मिनरल वाटर पीते हैं तो वंचित वर्ग को प्यास लगने पर नदी का पानी भी नसीब नहीं होता है। कवि अपनी कविता के माध्यम से प्रश्र उठाते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है।
तोर हे कुरिया - कुरिया काबर?
वो हे मोठ अउ तॅय काबर पातर?

000
तैँ हा पीथस मिनरल वाटर रोज गटागट,
हमला नोहर नदिया पानी जउँहर भइगे।
   
        इस वर्ग भेद से उपजी पीड़ा से मुक्ति पाने की छटपटाहट में कवि को लगता है कि छत्तीसगढ़ के माटी पुत्रों को जगाने की आवश्यकता है। दिन बादर को देखते हुए उन्हें शोषक वर्ग से सावधान रहने की जरुरत है। उन्हें उनका हक माँगने से नहीं मिलेगा, बल्कि इसके लिए संघर्ष करने की जरुरत है। संकलन में ऐसे बहुत से प्रेरणा एवं जागरण के गीत संकलित है, जिनमें कवि मजदूरों और किसानों को सचेत, जागृत और प्रेरित करते दिखाई देते हैं। अपन मुड़ मा पागा बाँधव, रहिबे हुसियार भइया, सुटुर - सुटुर, चलो - चलो रे भइया, गीत मा अँजोर के आदि ऐसे ही गीत है।
        छत्तीसगढ़ की संस्कृति मूलत: कृषि कार्य में लगे हुए सीधे सरल लोगों के क्रिया - कलापों एवं उनसे जुड़ी भावनाओं की उपज है। संकलक की कविताओं में यहां की संस्कृति और यहां की मिट्टी के प्रति कवि का गहन प्रेम झलकता है।
सग भले सगा हो जावे छूटय नहीं जँवारा,
हवय भोजली गंगाजल हा सुख दुख के अधियारा।
कोनो बदथे फूल फूलवारी, कोनो बदय मितानी।
   
        संग्रह की कविताओं में एक ओर कवि ने जहाँ छत्तीसगढ़ महतारी की महिमा का गान किया है तो दूसरी ओर दक्षिणी छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद उपद्रव से जूझते वनवासियों के दर्द का भी हृदय विदारक चित्रण किया है। मेरी दृष्टि में सिविर बनिस वनवास और बता कहाँ हम जावन कविताएँ बस्तर वासियों के अंतस के हाहाकार को बयान करने वाली छत्तीसगढ़ी की सर्वश्रेष्ठ कविताएँ हैं।
        शिल्प विधान की दृष्टि से देखें तो संग्रह में गीत है, गजलें हैं, सवैया है और अतुकांत कविताएं भी। किसी छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह में काव्य - शिल्प के इतने विविध रुप, भाषा के पूरे सौंदर्य और सामर्थ्य के साथ पाठकों ने नहीं देखा होगा।
        छंद विधान और भाषा प्रयोग की दृष्टि से नि:संदेह जीवन यदुजी छत्तीसगढ़ी कवता के समर्थ कवि हैं।
पता
पानी टंकी के पास, गंजी पारा
खैरागढ़ (छ.ग.)
मोबा. -09406033489़

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