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शनिवार, 21 मई 2016

गांधी जी के सामाजिक आर्थिक विचार की उपयोगिता : एक समाजशास्‍त्रीय अध्‍ययन

थानसिंह वर्मा - सहा.प्रा. (हिन्दी), शास. शहीद वेंकटराव महा. बीजापुर
पी.डी.सोनकर - सहा.प्रा. (इतिहास), शास. दिग्विजय महा. राजनांदगाँव

थानसिंह वर्मा
पी. डी. सोनकर
          महात्मा गांधी भारत के महान् सपूत थे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। स्वतंत्रता आन्दोलन में उनके योगदान को रेखांकित करते हुए ए.आर. देसाई ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय राष्ट्रवाद की सामाजिक पृष्ठभूमि‘ में ठीक ही लिखा है- ’’राष्ट्रीय मुक्ति के संग्राम में जन साधारण और जन आन्दोलन की महत्वपूर्ण भूमिका को समझने वाले वे पहले राष्ट्रीय नेता थे। ...................... गाँधी ने संघर्ष का एक ऐसा कार्यक्रम बनाया जिससे जन साधारण राष्ट्रीय आन्दोलन के लिए जागरूक हो सके और मजदूर, किसान, पूंजीपति, विद्यार्थी, वकील, दूसरे पेशेवर लोग, महिलाएं आदि सब तरह के लोग इस आन्दोलन में भाग ले सकें। अपने विचार तंत्र की सीमाओं, खामियों, कमजोरियों के बावजूद पहली बार गाँधी ने ही राष्ट्रीय आन्दोलन को जन साधारण का बहुवर्गीय आधार प्रदान किया।’’
        गाँधी जी ने लगान बंदी, नमक सत्याग्रह, स्वदेशी तथा नागरिक अवज्ञा आन्दोलन चलाकर देश में अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरोध को नेतृत्व प्रदान किया। इसके लिए उन्होंने अहिंसा, सत्याग्रह, जुलूस, भूख हड़ताल का सहारा लिया। ’’वे हिन्दू मुस्लिम एकता के पक्षधर थे। उन्होंने जीवन भर साम्प्रदायिकता का विरोध किया। गाँधी अपने को सनातनी हिन्दू मानते थे, वर्ण व्यवस्था के पक्षधर थे पर आज के प्रचलित भौंडे़ रूप में नहीं, बल्कि विशुद्ध वैदिक रूप में, गौ-रक्षा में विश्वास करते थे, मूर्ति पूजा में अविश्वास न हीं करते थे। धर्म के प्रति उनकी समझ प्रतिक्रियावादी विचारों से भिन्न थी, जिनका रूढ़िवादी दक्षिणपंथी हिन्दू प्रचार किया करते हैं। ........ गाँधी जी का धर्म कोई कुंठित धर्म नहीं था वरन् वह एक गतिशील धर्म था।’’ (1)
        गाँधी जी धर्म को नितांत निजी मामला मानते थे, जिसकी राजनीति में कोई जगह नहीं। वे कहते है ’’मेरी अपनी धर्म पर गहरी आस्था है और मैं इसके लिए प्राण भी दे सकता हूं। लेकिन धर्म मेरा व्यक्तिगत मामला है। राज्य का मेरे धर्म से कोई संबंध नहीं।’’ इसी आधार पर गाँधी जी सावरकर के द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को खारिज करते हैं- ’’आज हमारे देश में कुछ ऐसे लोगों का दल है जो यह मानते हैं कि हिन्दू-मुसलमान साथ-साथ नहीं रह सकते कि या तो हिन्दूस्तान से मुसलमानों को निकल जाना चाहिए या उन्हें हिन्दूओं का चाकर बनकर रहना चाहिए। इसी तरह पाकिस्तान में सिर्फ मुसलमानों को ही रहना चाहिए।’’ (2)
        गाँधी जी ने हिन्दू राष्ट्र का विरोध किया तथा जन साधारण के प्रतिनिधित्व पर आधारित, विभेद से परे धर्म निरपेक्ष राज्य की अवधारणा को स्वीकार किया। उन्होंने धार्मिक कट्टरता तथा असहिष्णुता का पुरजोर विरोध किया। इसके लिए उन्होंने अपने प्राणों तक की आहूति दे दी। 1948 में एक कट्टर हिन्दुत्ववादी ने उनकी हत्या कर दी।
        गाँधी जी सत्य को ही ईश्वर मानते थे, अहिंसावादी थे। पर अपने सनातनी हिन्दू विचार किसी पर थोपते नहीं थे। वे परम्परावादी थे पर अपने तई आधुनिक भी थे। उनके हृदय में सब के लिए समान जगह थी। असहयोग आन्दोलन के दौरान यह अफवाह उड़ा दी गई कि उन्होंने हिन्दुओं, मुसलमानों को मांस के प्रयोग से रोक दिया है, कट्टरपंथियों ने इसकी आड़ में साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने का प्रयत्न किया। गाँधी जी को यह पता चला तो उन्होंने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा -’’लोग जानते हैं कि मैं कट्टर निरामिषभोजी सुधारक हूं। पर सब लोग इस बात को नहीं समझते कि अहिंसा का भाव सबके लिए बराबर है और इसीलिए मैं मांसाहारियों से भी बिना किसी असद्भाव के मिलता-जुलता रहता हूं। न तो गो-रक्षा के लिए मैं किसी मनुष्य का वध कर सकता हूं और न किसी मनुष्य की रक्षा के लिए गो-वध कर सकता हूं।’’ (3) उन्होंने स्पष्ट किया कि निरामिषभोजी होना हमारे असहयोग कार्यक्रम का अंग नहीं है। .................. हिन्दुओं को यह कभी भी उचित नहीं है कि वे मुसलमानों को मांस, गो-मांस तक खाने से रोकें। इसी तरह से निरामिषभोजी हिन्दुओं को भी मांस-मछली खाने वाले हिन्दुओं पर किसी तरह का दबाव नहीं डालना चाहिए।’’ (4)
        गाँधी जी छुआ-छूत तथा अस्पृश्यता को हिन्दू समाज के लिए कलंक मानते थे। वे यह चाहते थे कि यह जितनी जल्दी मिट जाय समाज के लिए अच्छा होगा। वे कहते हैं - ’’हमें औंरों के साथ वहीं व्यवहार करना चाहिए जो हम अपने लिए दूसरों से चाहते हैं।’’ (5) हिन्दू समाज में अस्पृश्यता का कारण वे जाति या वर्ण व्यवस्था को नहीं मानते। ’’हमारी आज जो दशा है जिस वर्तमान अवस्था को हम पहुंचे हुए हैं उसका कारण जाति या वर्णाश्रम धर्म नहीं है। हम लोगों ने उसमें जो गुण था उसको स्वीकार करना छोड़ दिया और इसी से हमारी यह दशा हो गई।’’ (6)
        गाँधी जी यह भी मानते थे कि सहभोज या असवर्ण-विवाह से यह खत्म नहीं होगी। वे कहते थे कि इसके लिए समाज में रीति-रिवाज और खान-पान के स्वतंत्रता बनी रहे। वे आशावादी थे और यह उम्मीद करते थे कि समय के साथ समाज में बदलाव आयेगा और यह ’ अस्पृश्यता ’ खत्म हो जायेगी। गाँधी जी विभिन्नता में एकता के पोषक थे। वे कहते हैं - ’’चाहे कितने भी उदारभाव और स्वतंत्रता के विचार लोगों में प्रचलित हो जाएं पर इससे यह बात कभी नहीं आ सकती कि लोगों के आचार-विचार और रीति-रिवाज सदा एक तरह के हो जायेंगे। विभिन्नताओं में ही हमें मेल की स्थापना करनी होगी।’’ (7)
        गाँधी जी के आर्थिक विचार दर्शन ’बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ पर आधारित थे। वे पश्चिमी सभ्यता को ’इविल’ (अशुभ) मानते थे। और इसीलिए भारत में अंधाधुन्ध औद्योगीकरण के खिलाफ थे। उनका यह विरोध मनोगत नहीं था बल्कि तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों की उपज थे। जैसा कि पूरनचंद जोशी ने लिखा है - ’’गाँधी दर्शन का विरोध औद्योगीकरण से न हीं, अनियंत्रित औद्योगीकरण के उस स्वरूप से है जिसके फलस्वरूप् एक ओर स्वयं यूरोप में भुखमरी और बेरोजगारी, प्राकृतिक विनाश और विकृतियां पैदा हुई तो दूसरी ओर एशियाई देशों में गुलामी और शोषण के अलावा किसानों और दस्तकारों की आजीविका पर कुठाराघात हुआ।’’ (8) जिन लोगों ने गाँधी के दर्शन को भारत के सांस्कृतिक प्रश्न के साथ जोड़कर देखने का प्रयास नहीं किया, उन्हें गाँधी जी मशीन तथा औद्योगीकरण विरोधी नज़र आये। जबकि गाँधी ने स्वयं कहा है कि वे मशीन के विरोधी नहीं हैं। बकौल पूरनचंद्र जोशी - ’’ एक नये भारतीय आर्थिक मॉडल की खोज में गाँधी का समस्त दर्शन जिस प्रश्न पर केन्द्रित है वह भारत के किसानों और दस्तकारों का प्रश्न कि क्या भारत का औद्योगिक युग में प्रवेश किसानों और दस्तकारों पर आधारित अर्थव्यवस्था को उसी  प्रकार छिन्न-भिन्न और विनष्ट करते हुए होगा जिस प्रकार यूरोप में औद्योगीकरण का मार्ग प्रशस्त करने वाली प्रारंभिक पूंजी संचय की प्रक्रिया द्वारा हुआ था।’’ (9)
        गाँधी जी साम्राज्यवादी,पूंजीवादी और भारतीय औद्योगिक पूंजीवादी वर्ग तथा सामान्ती व्यवस्था के बीच विकसित हो रहे उस संबंध को देख रहे थे जो केवल मजदूर विरोधी ही नहीं, बल्कि किसान विरोधी था। इसके लिए उन्होंने वर्ग संघर्ष को टालने का प्रयत्न किया और वर्ग समन्वय का रास्ता अपनाया जो वास्तव में अपनी प्रकृति में ही प्रतिकूल था। इस मुद्दे पर नेहरू उनसे असहमत थे। उन्होंने लिखा था - ’’कई वर्षाें से मैं इस समस्या में उलझा हुआ हूं। निर्धन और गरीब के लिए अपने तमाम प्रेम और स्नेह के बावजूद गाँधी जी एक ऐसी व्यवस्था का समर्थन क्यों करते हैं, जो अनिवार्यतः निर्धन और गरीब व्यक्ति को पैदा करती है और उसे कुचलती है, क्यों वह अहिंसा के प्रति अपने तमाम उद्गारों के बावजूद एक ऐसे राजनीतिक और सामाजिक ढाँचे का समर्थन करते हैं, जो पूर्णतः हिंसा और दमन पर आधारित है। शायद यह कहना सही नहीं होगा कि वह ऐसी व्यवस्था का समर्थन करते हैं। वह किसी हद तक दार्शनिक अराजकतावादी हैं।’’ (10) ;जवाहर लाल नेहरु ऑटोबायोग्राफी पृष्ठ 515 पर नेहरू जी असहमत होते हुए भी विरोध नहीं कर सके।
        निश्चित रूप से गाँधी जी का वर्ग संघर्ष या टकराव को रोकने के लिए पूंजीपतियों को समाज का ट्रस्टी बताना और जमींदारों को काश्तकारों, बटाईदारों के  पोषक व संयुक्त परिवार के पालक के रूप में उन्हें प्रस्तुत किया जाना अतार्किक, अव्यवहारिक है। पर भारत के औद्योगिक तथा उपनिवेशवादी आर्थिक नीतियों की वजह से आजीविका से वंचित समूह को चरखा-करघा से जोड़ना गाँधी जी का महत्वपूर्ण कदम था। दस्तकारी, कुटीर उद्योगों से जोड़कर गाँधी जी ने आत्म-निर्भरता की दिशा में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनः जीवित करने का प्रयत्न किया। यह तत्कालीन भारत के लिए भले ही पीछे ढकेलने वाला लगता रहा होगा पर आज उसकी प्रासंगिकता समझी जा सकती है। जब औद्योगीकरण बढ़ती जनसंख्या के लिए रोजगार सृजन करने में अक्षम साबित हो रही है। पूंजीवादी व्यवस्था ने जल, जंगल, जमीन पर एकाधिपत्य स्थापित कर समाज के बहुसंख्यक समुदाय को हाशिए पर ढकेल दिया है तब उसके विरोध में हाशिए के लोग नर्मदा घाटी, उत्तराखण्ड, झारखण्ड, मणिपुर या बस्तर के जनजातियां समूह संघर्ष के रास्ते पर उतर आये हैं। गाँधी इस संघर्ष को आत्मीन संबल प्रदान करते हैं। गाँधी जी आज इसी अर्थ में प्रासंगिक हैं।
        अपनी तमाम सीमाओं, कमजोरियों के बावजूद उनकी त्याग, बलिदान की भावना, जनता की सृजनात्मक शक्ति में विश्वास, अस्पृथ्यता का विरोध और सबसे बड़ी चीज सहिष्णुता जैसे गुण महत्वपूर्ण हैं जिसके लिए रविन्द्रनाथ टैगोर जी ने यदि गाँधी जी को ’महात्मा’ कहा तो इसमें कोई अत्युक्ति नहीं है।
: सन्दर्भ.:
1. भारतीय चिंतन परंपरा - लेखक : के. दामोदरन, पी. पी.एच, नई दिल्ली.पृष्ठ 439
2 . भारतीय चिंतन परंपरा - लेखक : के. दामोदरन, पी. पी. एच. नई दिल्ली.पृष्ठ 445
3 . सामाजिक क्रांति के दस्तावेज  भाग 1  गाँधी के निबंध  हिंन्दुवो सावधान से
  संपादक : शम्भूनाथ, वाणी प्रकाशन दिल्ली पृष्ठ 464
4 . सामाजिक क्रांति  के दस्तावेज  भाग 1  गाँधी के निबंध  हिंन्दुवो सावधान से
  संपादक : शम्भूनाथ, वाणी प्रकाशन दिल्ली पृष्ठ 464
5. सामाजिक क्रांति  के दस्तावेज  भाग 1  गाँधी के निबंध - अछूत से
  संपादक : शम्भूनाथ, वाणी प्रकाशन दिल्ली पृष्ठ 471
6 . सामाजिक क्रांति  के दस्तावेज  भाग 1 गाँधी के निबंध  वर्णआश्रम धर्म से
   संपादक : शम्भूनाथ, वाणी प्रकाशन दिल्ली पृष्ठ 468
7 . सामाजिक क्रांति  के दस्तावेज  भाग 1 गाँधी के निबंध  वर्णआश्रम धर्म से
 संपादक : शम्भूनाथ, वाणी प्रकाशन दिल्ली पृष्ठ 469
8 . परिवर्तन एवं विकास  के सांस्कृतिक आयाम - लेखक - पूरन चन्द्र जोशी,
  राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली पृष्ठ 49
9 . परिवर्तन एवं विकास  के सांस्कृतिक आयाम : लेखक - पूरन चन्द्र जोशी,
   राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली पृष्ठ 50
10 . भारतीय चिंतन  परंपरा : लेखक - के. दामोदरन, पी. पी . एच. नई दिल्ली.पृष्ठ 449

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