इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शनिवार, 28 मई 2016

अशोक '' अंजुम '' की दो हास्‍य - व्‍यंग्‍य ग़ज़लें

अशोक '' अंजुम ''

खेल के परिणा सारे फिक्स हैं।
फिक्स है ईमान सारे फिक्स हैं।
आपकी बारी भी आएगी हुजूर,
मैकदे में जाम सारे फिक्स हैं।
किस तरह का चाहिए वर आपको,
बोलिये भी दाम सारे फिक्स हैं।
और बढ़कर एक भी तिनका नहीं,
दफ्तरों में काम सारे फिक्स हैं।
तू भले प्रैक्टिस दिन - रात कर,
नौकरी को नाम सारे फिक्स है।
फेंक कर मजनूं का खत लैला कहे,
क्या पढूँ पैगाम सारे फिक्स है।
आप मत इतनी सफाई दीजिये,
आप पर इल्जाम सारे फिक्स है।
                     2
प्यार है, इजहार है बाजार में।
इश्क का व्यापार है बाजार में।
कैद दफ्तर में रहे सप्ताह भर,
और अब रविवार है बाजार में।
देखकर विज्ञापनों का बाँकपन,
रोज कुल परिवार है बाजार में।
ये भी लें, हाँ ये भी लें, हाँ ये भी लें,
बस यही तकरार है बाजार में।
बिक रहा है आम जनता का सुकूँ
और हर सरकार बाजार में।
क्यों घरों में आज सन्नाटा लगे,
और हर त्यौहार है बाजार में।
एक जादू हर तरफ तारी हुआ,
खींचता हर बार है बाजार में।

पता
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क्वारसी बाईपास, अलीगढ़ - 202001
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