इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 28 मई 2016

अशोक '' अंजुम '' की दो हास्‍य - व्‍यंग्‍य ग़ज़लें

अशोक '' अंजुम ''

खेल के परिणा सारे फिक्स हैं।
फिक्स है ईमान सारे फिक्स हैं।
आपकी बारी भी आएगी हुजूर,
मैकदे में जाम सारे फिक्स हैं।
किस तरह का चाहिए वर आपको,
बोलिये भी दाम सारे फिक्स हैं।
और बढ़कर एक भी तिनका नहीं,
दफ्तरों में काम सारे फिक्स हैं।
तू भले प्रैक्टिस दिन - रात कर,
नौकरी को नाम सारे फिक्स है।
फेंक कर मजनूं का खत लैला कहे,
क्या पढूँ पैगाम सारे फिक्स है।
आप मत इतनी सफाई दीजिये,
आप पर इल्जाम सारे फिक्स है।
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प्यार है, इजहार है बाजार में।
इश्क का व्यापार है बाजार में।
कैद दफ्तर में रहे सप्ताह भर,
और अब रविवार है बाजार में।
देखकर विज्ञापनों का बाँकपन,
रोज कुल परिवार है बाजार में।
ये भी लें, हाँ ये भी लें, हाँ ये भी लें,
बस यही तकरार है बाजार में।
बिक रहा है आम जनता का सुकूँ
और हर सरकार बाजार में।
क्यों घरों में आज सन्नाटा लगे,
और हर त्यौहार है बाजार में।
एक जादू हर तरफ तारी हुआ,
खींचता हर बार है बाजार में।

पता
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