इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शनिवार, 28 मई 2016

गुलामी के गेरवा गर म

डॉ.पीसीलाल यादव

बिरो पाही कइसे ओहा, जेन बंधाय हे खूँटा म।
अंजोरी बर भटकट मूरख, सुरुज धरे मूठा म।।
        गुलामी के गेरवा गर म,
        सकीरन सोच विचार सेती।
        अवसर जिनगी ले निकलत,
        जइसे हाथ ले कुधरी रेती।।
छइंहा कइसे मिलही बतावव, कटे रुख के ठूँठा म।
बिरो कइसे पाही ओहा, जेन बंधाय हे खूँटा म।।
        सभिमान ल सऊॅहे बेच के,
        हाथ उठा करे जी हुजुरी।
        तन - मन दूनो हे गहना,
        सइघो लास जीये मजबूरी।
आजादी कइसे पाही ओहा, जे जीयत पर के जुठा म।
बिरो कइसे पाही ओहा, जेन बंधाय हे खूँटा म।।
        लोकतंत्र के भाव भर हे,
        लोक तो इहॉ बरबाद हे।
        तारा टोरय गुलामी के,
        मनखे तभे आजाद हे।
लोक के तन चिथरा - गोंदरा, तंत्र लदाये गहना गूँठा म।
बिरो कइसे पाही ओहा, जेन बंधाय हे खूँटा म।।
                    पता
            साहित्य कुटीर
                 गंडई
      जिला - राजनांदगांव

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें