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शुक्रवार, 20 मई 2016

घरेलू कामगार : अस्मिता का नियतिपरक प्रस्थान

प्रो0  अजय कुमार साव

       घरेलू कामगारों का चलन बहुत पुराना है, पर आज़ाद भारत में औद्योगीकरण के तहत शहरीकरण की प्रक्रिया घटित हुई और आज भी बदस्तूर जारी है। इसका परिणाम घरेलू कामगारों और परिवार के मालिक सदस्यों के संदर्भ में जितना संवेदनशील रहा है, उतना ही जटिल, अंतर्विरोधी और विडंबनात्मक भी। घरेलू कामगारों के हित में जितने क़ानून बनेए निस्संदेह इनकी ज़रूरत है, पर यह मानवीय संवेदना के धरातल पर ही विकसित है, जबकि साहित्य में इसकी जटिल यथास्थितियों के बीच विकसित अंतर्विरोधी एवं विडंबनात्मक मन:स्थितियों का आकलन और मूल्याँकन मुख्य लक्ष्य रहा है। अमरकांत की कहानी '' बहादुर '' भीष्म साहनी की '' संबल के बाबू '' यशपाल की '' कुत्ते की पूंछ ''शेखर जोशी की '' दाज्यू '' जैसी कहानियाँ अवश्य ही स्मरणीय हैं, पर ये कहानियाँ या तो संवेदनात्मक भाव - भूमि पर खड़ी हैं या विचारधारात्मक आक्रोश से लैस है। संवेदनात्मक पहलू  और विचारधारात्मक संभावनाएँ आज असंभव संबावना ही है। कृष्ण बलदेव वैद का उपन्यास '' एक नौकरानी की डायरी '' और गीता श्री की कहानी '' डाउनलोड होते हैं सपने '' आज घरेलू कामगारों और मालिकों के संदर्भ में जिन विडंबनाओं का संकेत किया गया है, उसका चरम अपनी स्वाभाविक जटिलताओं और विडम्बनाओं के साथ मृदुला गर्ग की कहानियाँ '' अनाडी '' '' उसका विद्रोह '' '' बाहरी जन'' ''कि़स्सा आज का''  तथा उपन्यास '' कठगुलाब ''और अनित्य में अभिव्यक्त है।
        मृदुला गर्ग ने घरेलू कामगारों को निरी संवेदना से न तो सींचा है, ना ही विचारधारात्मक आग्रह का संबंल प्रदान किया है। उन्होंने मालिक और घरेलू कामगारों के आचरण को उनके पारस्पर्य में बहुआयामी तटस्थ अध्ययन का विषय बनाया है। कारण यही है कि आचरण सोच से संचालित होते हैं, तो सोच प्रतिपक्ष के मान.मूल्यों के प्रति संवीकार.अस्वीकार के माध्यम से बनी अस्मिता.बोध ही है। इसकी परख के लिए इनके प्रति प्रयुक्त संबोधन में निहित अस्मितापरक अनुभूति, घरेलू काम के प्रति नज़रिया, मुख्यधारा के बीच हाशियापन के विविध आयामों का अध्ययन करते हुए अंतत: घरेलू कामगारों की अस्मिता के दिशागत स्वरूप का मूल्याँकन प्रस्तुत आलेख का अभीष्ट है।
1. संबोधन : अस्मितापरक अनुभूति
        अस्मिता का प्रत्यक्ष संबंध प्रतिपक्ष की धारणा के स्वीकार - अस्वीकार की चेतना से है। धारणा का आश्रय है प्रयुक्त संबोधन। मृदुला गर्ग लिखती हैं . पुराने वक्तों में जिसे ग़ुलाम या दासी कहा जाता था, आजकल घरेलू कर्मचारी कहते हैं। शब्द बदला है, अर्थ नहीं।''1 यहाँ महज़ शब्द परिवर्तन का बोध घरेलू कामगारों के प्रति जारी रूढ़ मानसिकता का ही परिणाम है। इतना ज़रूर है कि इन कामगारों के हित में प्रस्तावित '' घरेलू कामगार विधेयक '' में प्रयुक्त शब्द '' कामगार '' अनिवार्य बदलाव की संभावना व्यक्त करता है। '' घरेलू कामगार विधेयक '' में प्रस्तावित है ... ऐसा कोई भी बाहरी व्यक्ति जो पैसे के लिए या किसी भी रूप में किए जाने वासे भुगतान के बदलें किसी घर में सीधे या एजेंसी के माध्यम से जाता है, जो स्थायी - अस्थायी, अंशकालिक या पूर्णकालिक हो, तो भी उसे '' घरेलू कामगार ''की श्रेणी में रखा जाएगा।ष्2 स्पष्ट है कि इनके प्रति नौकर शब्द की जगह कामगार का प्रयोग किया जाना चाहिए। जब नौकर कहा जाता है तब व्यक्ति के प्रति भाव व्यक्त होता हैए पर जब श्कामगारश् कहा जाता हैए तब काम का भाव प्रकट होता है। काम छोटा.बड़ा नहीं होता। इसका महत्व अपनी जगह अतुलनीय है। श्कामगारश् संबोधन से किसी की अधीनता की बू नहीं आती है। अन्य कामगारों की तरह इनके साथ भी काम की महत्ता का संदर्भ जुड़ता महसूस होता है।
        समय के साथ इन कामगारों के प्रति मालिकोंं की सोच भी बदली है। मृदुला गर्ग की कहानी श्कि़स्सा आज काश् में मालकिन वकीलन का अनुभव उल्लेख योग्य है ...ष् शायद पहली बार वकीलन को पता चला कि वह आज कल में रह रही हैए गुज़रे वक्तों में नहीं ण्ण्ण् वकीलन की समझ में आया कि आज कल के राजा रानी बिना मुक़दमे प्रजा के आदमी को हवालात में बंद करवा सकते हैंए पिटवा सकते हैंए पर क़ानूनन मरवा नहीं सकते।ष्3 यहाँ इतना अवश्य ही बदलाव घटित हुआ है कि मालिकों की तानाशाही ढीली हुई है। साथ ही इस बदलाव की प्रतीक्षा भी बनी हुई है कि मालिक आज भी झूठे मामले बनवा कर हवालात में बंद करवाने की मानसिकता को भी छोड़ दे। सुरभि टण्डन मेहरोत्रा का अनुभव है ...ष् अब नौकर शब्द की जगह श्कामवालीश् शब्द का इस्तेमाल होने लगा है जिससे पता चलता है कि पहले से उसका सम्मान बढ़ गया है।ष्4 श्कामगारश् संबोधन में मालिक कितना सम्मान व्यक्त करना चाहते हैए यह तो व्यावहारिक स्थिति है हीए इससे भी बड़ी वास्तविकता यह है कि ये कामगार संबोधन के धरातल पर पहले की तरह अपमानित महसूस नहीं करते। इस संबोधन का मनोवैज्ञानिक परिणाम अवश्य ही अस्मितापरक अनुभूति से समृद्ध है।
2. घरेलू काम : अस्मिताओं की विडंबना  ...
        घरेलू काम के प्रति स्वयं घरेलू कामगारों का नज़रिया मालिक सदस्यों की तुलना में बेहतर नहीं है। कामकाजी महिलाओं की व्यस्तता और मध्यवर्गीय मानसिकता के तहत घरेलू काम घर की ज़रूरत के हिसाब से सामान्य ही नहींए हीन और अपमानजनक भी प्रतीत हुआ। साथ ही सामंती संस्कारों के प्रतिकार स्वरूप पतियों के आदेश के रूप में भी हीनता बोध का सूचक ही अधिक महसूस हुआ। ऐसी दशा में घरेलू काम के लिए विशेषकर महिला कामगार की ज़रूरत पड़ी। घरेलू काम अपनी प्रकृति में आज भी औरतों का काम ही अधिक रहा है। संभवतरू यह भी एक कारण हो सकता है कि पुरुष की बराबरी में आर्थिक आत्मनिर्भरता को प्राप्त महिलाएँ घरेलू काम से किनारा कर औरत की सामंती छवि से मुक्ति का अनुभव करती हैं। सच तो यह है कि घरेलू काम करते हुए मध्यवर्गीय समाज में हैसियत का सवाल स्त्री की सामाजिक अस्मिता को आहत करती हैए तो सामंती संस्कारों से मढ़े पुरुषों का पौरुष हीनता का शिकार होता महसूस होता है। आशय इतना है कि घरेलू काम में स्त्री.पुरुष में से किसी को रुचि नहीं है। कहानी श्कि़स्सा आज काश् में वकीलन के पास पार्टी में जाने का गर्व हैए पर अपने काम के लिए भी बालिका रामलीला को रखती हैघ् किसी भी काम करते ही श्बड़ी मुश्किल हैश् का जुमला बहुत प्यारा है।
        घरेलू काम को कामगार मजबूरी में ही करना स्वीकारते हैं। डूठे बर्तन माँजनाए पोंछा लगाना किसे अच्छा लगता हैघ् कहानी श्अनाड़ीश् में सुवर्णा के परिवार की माली हालत पर मालिक सेठ के द्वारा सहानुभूति प्रकट करने पर सुवर्णा की भावनात्मक प्रतिक्रिया विवेचनीय है ...ष् इतना तरस आ रहा है तो भेज दो ना इस्कूल। ण्ण्ण् फिर कौन करेगा झाड़ू.फटगाए कौन मलेगा भाड़े।ष् 5 घरेलू काम की जगह स्कूल जाना पसंद है।सुरभि टण्डन मेहरोत्रा का अनुभव है ....ष् यह सोच सांस्कृतिक विचारधारा से जुड़ी है कि बर्तन माँजने का काम गंगा और कमतर माना जाता है। ण्ण्ण् कामगारों के नजरिये से उनके पास कोई अन्य चुनाव न होने की वजह से वह हीन काम करते हैं। प्रायरू सभी नहीं चाहते है कि उनकी बेटियाँ इस पेशे में आए।ष्6 ग़ौरतलब यह है कि कामगारों की नज़र में भी यह कोई काम नहीं हैए बल्कि मजबूरी में ढोया गया बोझ.सा है। वे अपनी संतान को तो इस क्षेत्र में देखना भी नहीं चाहते। घरेलू काम घर के सदस्यों के मान.सम्मान पर बट्टा लगाने वाला दिखता हैए तो कामगारों के लिए हीन और गंदा होने के कारण एक बड़ी मजबूरी है। आश्चर्य है कि घर हैए तो घर के काम निकलेंगे हीए पर यह ज़रूरी किसी के लिए नहीं। काम करते हुए उपलब्धि का बोध नहीं होता। इस विडंबना पर सुरभि टण्डन की टिप्पणी द्रष्टव्य है ...ष्यह बात नोट करने की है कि भले ही कामगार अपने काम को सम्मान से नहीं देखतेए मगर उनकी उम्मीद होती है कि मालिक उनके साथ मान.सम्मान का व्यवहार करे।ष्7 मान.सम्मान का भाव आचरण में ही संचित होता है। घरेलू काम के प्रति जब सद्भावना ही नहीं रहीए तब मजबूरी में ही सहीए इस काम को करने वाले को सम्मान का आचरण कैसे मिलेगाघ् इस दृष्टि से कामगारों और मालिक सदस्यों के बीच परस्पर का आचरण स्वाभाविक नहीं रहकर विडंबनात्क हो जताता है।
        मृदुला गर्ग के उपन्यास श्कठगुलाबश् में नर्मदा अपेक्षित आचरण के अभाव में अपने काम का महत्व अवश्य ही प्रतिपादित करती है .....ष् अरे मैं ना होती तो कर सके थेए ये बड़े.बड़े बंगलेए कारख़ाने। ण्ण्ण्ण् मैं ना होती तो इस कुतिया के बच्चे आवाराए नशेड़ी बनतेए डाक्टर इंजीनियर ना।ष्8 मृदुला गर्ग ने प्रतिपादित किया है कि महत्व की दृष्टि से मध्यवर्गीय परिवार की सामाजिक अस्मिता के पर्याप्त ही नहींए सारे अवसर गढ़ने में महिला कामगारों की मुख्य भूमिका होती है। परिवार की सामाजिक अस्मिता की मुख्य भूमिका में कार्यरत कामगारों के प्रति सामान्य आदर का भाव भी नहीं होता हैए यह तब तक विडंबना बनी रहेगी ए जब तक कामगार इन कामों में उपलब्धियों की जगह महज अर्थोपार्जन की संबावना को तलाशते रहेंगे। अर्थ सत्ता का स्रोत मात्र है। देने वाला सत्तासीन और लेने बाले की दशा सत्तासीनों के अधीन की होती है। यहाँ यह अभीष्ट है कि घरेलू काम के प्रति नज़रिया में बदलाव की जरूरत है। इसके अर्थ.संदर्भ की जगह सृजन.संदर्भ को व्यवहार में अपनी सोच का     हिस्सा बनाना होगा। ऐसी धारणा से ही उपलब्धि.लाभ संभव है। अस्मिता अर्जित उपलब्धि के प्रति सामाजिक गौरव बोध है। ज़रूरत है कामगारों के द्वारा किए गए ऐसे घरेलू कार्यों की सृजनात्मकता को सामाजिक.पारिवारिक संदर्भ में गौरव.बोध के साथ मालिकों की स्वीकृति की। काम के प्रति मालिक.कामगार दोनों की धारणा में अपेक्षित बदलाव से ही अस्मिता का सृजनात्मक बोध संभव है।
3.  मुख्यधारा के बीच का हाशिया: विविध संदर्भ
        सामाजिक विकास में प्रत्यक्ष.अप्रत्यक्ष रूप से शामिल एवं इससे प्रभावित.लाभान्वित समाज.परिवार मुख्यधारा में आते हैंए जबकि इस विकास के लाभ से वंचित समुदाय श्हाशियेश् का समाज कहलाता है। श्हाशियेश् का बोध प्रतिवादमूलक होता है। यह सदा मुख्यधारा को जीवन.लक्ष्य बनाए रहता है। घरेलू कामगार जिन परिवारों में काम करते हैंए वे अपने समय के विकास की दिशा मेंं शामिल होने के कारण मुख्यधारा के अंतर्गत आते हैं। घरेलू कामगारों को मुख्यधारा के बीच हाशिया के रूप में लिए जाने के पीछे का कारण स्पष्ट करते हुए देवेन्द्र चौबे ने लिखा है ... ष् यह अजीब विडंबना है कि जीवन की सारी सुविधाओं को वे अपनी नज़रों से देखते हैं। ण्ण्ण्ण् मुख्यधारा के बीच रहते हुए भी उसमें सार्थक ढंग से हस्तक्षेप नहीं कर पाने तथा अजनबीपन और संकट के अनुभव से गुज़रते हुए अपने अस्त्त्व की रक्षा का उपाय करे।ष्9 ;र49द्ध हाशियापन मानवीय प्राप्य से वंचित मनोदशा का सूचक है। वंचित.दमित.शोषित समुदाय के रूप में तो दलित.आदिवासी भी हैं। इनकी दिशा मुख्यधारा के समानांतर हैए पर परिवार के सुख.सुविधाओं के रख.रखाव में लगे रहने के बावजूद इनके सुख से वंचित जीवन.स्थिति की विवशता में दिन काटते रहने के कारण ही इन्हें मुख्यधारा के बीच का हाशिया कहा जाना बिल्कुल सही है। अजनबीपनए अभावग्रस्तताए अपमान संकट इनके जीवन बोध के पर्याय हैं। इस संदर्भ में हाशियेपन के विविध आयामों का चित्रण मृदुला गर्ग ने किया है ......कद्ध आर्थिक आयाम रू उपन्यास श्कठगुलाबश् में गंगा की प्रतिक्रिया प्रसंगानुकूल है ...ष्अब दोनों में से एक भी काम पर न पहुँचीए तो पैसे काटने को दौड़ेंगी हमारी बीबियांए ऊपर से मार ग_र भर कपड़े जमा होंगे धोने को।ष्10  यहाँ मुख्य रूप से दो संदर्भ कामगारों को अपमान और संकट का अनुभव कराते हैं। पहलाए काम पर नहीं पहुँचने पर वेतन में कटौतीए दूसराए काम का बोझ बढ़ जाना। हशियेपन का मसला यह है कि इन कामगारों के प्रति मालिक मानवीय सरोकार से बेख़बर हैंए साथ ही सारे कपड़े जमाकर रखनाए मानों यह नहीं आने की दोहरी सज़ा हो। इसके बावजूद काम पर लगे रहने की विवशता रहती है। संकट का यह संदर्भ आए दिन अपमान का अनुभव कराता रहता है। कामगारों के काम को तो महत्व मिलता नहींए पर काम नें कमी आते ही वेतन में कटौती का संकट मंंडरारे लगता है। सच तो यह है कि मालिक काम के प्रत्येक क्षण का हिसाब वेतन के समय कर लेता है।
'' यौनिक ''  महिला कामगार की उपस्थिति मुफ़्त का दृष्टि.सुख प्रतीत होता है। कृष्ण बलदेव वैद ने उपन्यास श्एक नौकरानी की डायरीश् में दिखाया है ...ष् माँ अक्सर कहती है कि नौकरानियों के साथ बेहयायी करना सब लोग अपना हक़ समझते हैं।ष्11 स्त्री.मुक्ति में देह मुक्ति की बात आम हो चली हैए पर जब महिला कामगार के साथ घटित यौनिक संदर्भ से गुज़रती हैंए तब प्रतीत होता है कि देह के प्रति समाज में जो दृष्टि बन चुकी हैए उसका परिष्कार.संस्कार ही सच्चे अर्थ में देह.मुक्ति को सार्थक कर पाएगा। गीता श्री की कहानी श्डाउनलोड होते हैं सपनेश् में भी नौकरानी सुमित्रा की माँ का ऐसा ही अनुभव है। उपन्यास श्कठगुलाबश् में नर्मदा कहती है ...ष् नौकरी पर गई तो बोली बाक़ी बखत मेरे घर पर रहो। रह गई। छरू महीने ना गुज़रे होंगे कि उसका खूँटे आदमी ण्ण्ण्ण्ण्ष्12  यहाँ संकेत में ही मृदुला गर्ग ने मालिकों के यौनाचार के कारण जन्मे संकट और अपमान का बोध भली.भाँति करा दिया है। ग़ौरतलब यह है कि महिला कामगार ऐसे आचरण के कारण असुरक्षित रह कर सदा संकट से गुज़रती रहती हैए पर आश्चर्य कि कहीं शिकायत नही करती हैं। वह नर्मदा की तरह या तो काम ही छोड़ देती हैए या ख़तरों से समझौता कर लेती है। इसके कारण पर प्रकाश डालती हुई सुरभि टण्डन लिखती हैं ...ष् घर जैसे स्थान पर हिंसा का कोई चश्मदीद गवाह मौजूद  न होने की वजह से हिंसा साबित करना कठिन हो जाएगा।ण्ण्ण्ण् 13। इस हालात में काम छोड़ने के अलावा और कोई उपाय नहीं रहता। यहाँ अस्मिता के हनन का संकट महिला कामगार को हाशिये की ज़िंदगी जीने को मजबूर कर देती है।
  ग़ सामुदायिक रू घरेलू कामगारों के प्रति रूढ़ सामुदायिक धारणा मालिकों के आचरण को क्रूर.हिंसक बना देती हैघ् कहानी श्अनाड़ीश् की सुवर्णा जब बाई से अपने नाख़ून पालिश करने की इच्छा रखती हैए तब की आहत मनरूस्थिति उल्लेखनीय है...ष्अपने रंगती है तो बाई कित्ता मन लगाकर। जित्ती बार रँगेगीए उत्ती बार सुखायेगी और सुवर्णा को! ऐसे जैसे कुर्सी पर फटका मार रही हो।ष्14  यहाँ सुवर्णा की इच्छा का कोई मोल नहीं है तो इसीलिए कि वह काम करने वाली है। अपमान और कुंठा का कारण यही है कि सुवर्णा सब कुछ अपने सामने देखती हैए पर अपने लिए कुछ भी पाती नहीं। तिस परए आलमारी में बंद कर रखे जाने की बात सुवर्णा  को कामवाली से चोरी के अपमानजनक दंश का भी अनुभव करा जाती है।
कहानी '' उसका विद्रोह '' हो या '' बाहरी जन '' कामगार को कोई भी गाली.गलौज कर जाएए प्रतिरोध का अंधकार नहींए क्योंकि वे काम करने वाले होते हैंए उसका मान.सम्मान क्या। समस्या यह नहीं कि उसके साथ बुरा होता हैए समस्या है कि वह विरोध करें तो कैसेघ् उसके भी सपने हैं। उसका विद्रोह के युवा नौकर के सपने हैं। क्या होगा सपनों काघ्  इसका अत्यंत यथार्थ अनुभव होता है गीता श्री की कहानी श्डाउनलोड होते हैं सपनेश् में। कामगारों के साथ ऐसे संकटए असुरक्षाए अपमानए कुंठा के पीछे कामगारों के प्रति मालिकों की सामुदायिक धारणा ही मुख्य कारण होती है।
4.  कामगारों का अस्मिता - बोध दिशागत स्वरूप
        घरेलू काम के प्रति मालिक और कामगारों का नजरिया प्रायरू एक जैसा होने के कारण कामगार अपनी अस्मिता की रक्षा में बिद्रोही नहीं हो पाता। वैसे इन कामगारों को मालिकों के विरुद्ध खड़ा करने का विचिरधारात्मक प्रयास भीष्म साहनी ने अवश्य कियाए पर अमरकांतए यशापलए शेखर जोशी ने कामगारों के प्रति संवेदनात्मक लेखन किया। इस पृष्ठभूमि में मृदुला गर्ग की रचनाधर्मिता अधिक यथार्थपरक है। उन्होंने संवेदना और विचारधारा की जगह मालिक और कामगारों की अस्मिताओं के वर्तमान द्वंद्वात्मकए अंतर्विरोधी एवं विडंबात्मक दिशागत स्वरूप को ही लेखन का विषय बनाया। इनके यहाँ घरेलू कामगार मौन हैंए पर शांत नहीं। मुखर होकर विद्रोह नहीं कर पाने की नियति हैए पर अपनी चेतना में कहीं अधिक प्रतिक्रियाशील और प्रतिवादी हैं।
'' कठगुलाब '' की नर्मदा की अंतरू ध्वनि नमिता के विरुद्ध अपनी सामर्थ्य में स्वत्व की रक्षा इस प्रकार करती है ...ष् रहने दो बीवीजीए  कोसने मत दो! नौकरी का अकाल न पड़ रहा। एक छोड़ो दस मिले है। कर लेंगे कहीं और।ष्15 अस्मिता का अनुभव इस दिशा में है कि मालिकों की मन.मज़ीर् आदतें नर्मदा स्वीकार नहीं करतीए पर इस असंमिता का दिशागत स्वरूप पुन: नए परिवारों में संघर्ष से जुड़ा हुआ है। अस्मिता का गतिमान स्वरूप यही है। इसके कारण सुरभि टण्डन मेहरोत्रा के शब्दों में ...ष् मालिक और कामगार के बीच सत्तात्मक संबंध उनके साथ होने वाले भेद.भाव या उनकी शिकायत को नकारा जाने वाला रवैया भी उन्हें चुप करा जाता है।ष्16  सत्ता अस्मिता का स्रोत है। नर्मदा के पास असीमा और दर्जन बीबीसी का भरोसा है। इस भरोसे नर्मदा की मौन प्रतिक्रिया का अवलोकन अपेक्षित है ...ष् मेरी बिचारी इकली बीबी! बुड़.बुड़ करती नर्मदा धीरे.धीरे पुरसुकून गहरी नींद में डूबती चली गई।ष्17 यहाँ विशेष यह है कि नर्मदा अकेली नहीं हैए अकेली ही नहीं बिचारी भी है तो नमिता। साथ ही श्बुड़.बुड़श् की व्यंजना नमिता के समक्ष उसकी अस्मिता के सवाल भी खड़ा कर देती है।
        गंभीर मुद्दा यह है कि कामगारों के समक्ष दो ही रास्ते अब तक दिखते रहे। या तो कामगार मालिकों के साथ एडजस्ट करें या तब तक एडजस्ट करेंए जब तक दूसरे काम की व्यवस्था हो जाए। सुरभि टण्डन ने भी लिखा है ...ष् उत्पीड़क मालिकों के घर काम न करना उनके पास एक मात्र विकल्प था। फिर भी उनकी पैसे की ज़रूरत ने उन्हें वहाँ काम करने पर मजबूर किया। ण्ण्ण् जल्दी ही कोई विकल्प मिलने पर कामछोड़ देती है। मगर ग़लत आरोपों का विरोध नहीं कर सके।ष्18  यह स्वाभाविक है कि विरोध की सामर्थ्य नहीं रहने पर विद्रोह का भ्रम ही शेष बचता है। मृदुला गर्ग के यहाँ मालिकों के उत्पीड़न के प्रति कुछ और भी घटित होता है। श्उसका विद्रोहश् कहानी में युवा नौकर की प्रतिक्रिया मुखर नहीं हैए पर तीव्रता और तीक्ष्णता में अवश्य ही अस्मितापरक है ...ष्उसका मन हुआए पूरा दम लगाकर चीखे और कहेंए गधे.बंदरए छछूंदर तुम हो। यह लो अपनी नौकरी मैं जा रहा हूँए पर उसके गृह देवता ने रोक लिया। ण्ण्ण् उसने मुँह से कुछ नहीं कहाए पर इसका मतलब यह नहीं कि उसका विद्रोह शांत हो गयाण्ण्ण् वह तैश में आ गया था।ष् 19 उसके विद्रोह की प्रक्रिया के बारे में मृदुला गर्ग ने लिखा है ...ष् उसने गैस पर चढ़ी दाल की पतली धन से नीचे पटकी। ण्ण्ण्रसोई घर का दरवाज़ा धड़ाक से मारकर आँगन में जा पहुँचा ण्ण्ण् अपनी भोंड़ी आवाज़ में ज़ोर.ज़ोर से गाने लगा ण्ण्ण्इतनी ज़ोर से कि पड़ोसियों के कानों तक भी पहुँचे और वे कह उठे कि पड़ोस का नौकर कितना उद्दण्ड और ग़ुस्ताख़ है।ष्19  आगे यह भी सोचता है ..ष्वह चाहता था कि कोई ऐसा काम करें जिससे सब मान जाए कि उसे बेबाक़ इधर.उधर नहीं खदेड़ा जा सकता ष्20   विद्रोह की चेष्टा स्वाभाविक है ए कहीं से थोपा गया प्रतीत नहीं होता है। इस दिशा में यह भी विचारणीय है कि मालिक उसे निकाल क्यों नहीं देताघ् स्पष्ट है कि उसे जब निकाल दिए जाने का ही भय नहीं है तो उसे ऐसी संभावना दिखती ही नहीं है। अब काम से निकाल दिए जाने के भय के कारण मौन बना रहना नियति थीए पर अब समय बदल चुका है।
        अस्मिता महज़ सफलता का पर्याय नहीं हैए बल्कि निज के प्रति पल भर के लिए ही सहीए मान.अपमान से ऊपर सार्थक अनुभूति है। इसी दिशा में ये कामगार काम नहीं छोड़ने तक  अंतरूध्वनि में निहित अस्मिता का अनुभव करते रहते हैं। कुछ ऐसा ही हम कहानी श्किस्सा आज काश् में पाते हैं। मालिक करनेवाली अंगूरों के उन आचरणों को भी मालिकों वकीलन नज़रअंदाज़ कर जाती हैए जो उसकी बदतमीज़ी तक महसूस होती है। मृदुला गर्ग लिखती हैं ...ष् बदतमीज़ जवाब मानकर भी बीबी चुप लगा गईं तो अंगूरी के हाथ के हुनर के कारण ही। मालिश जो करानी थी उससे।ष् 21 इस संदर्भ में यह ध्वनित है कि मालिक.कामगार के बीच अस्मिता.बोध का स्वरूप आज बदला हुआ है। निरीहता और मौन.मूक समझौता की जगह द्वन्द्व अस्मिताओं के पारस्पर्य को दिशा दे रहा है। रामकसी का बिना किसी मुखर प्रतिवाद के रुपये की गड्डी लेकर भाग जाना सिफ़र् चोरी नहीं हैघ् जिन सुविधाओं के सामने वह कुंठित रह जाया करती थीए उसको पूरा करती हुई कहीं से न तो बदलें का उफान नज़र आता है और ना ही विचारधारात्मक उपलब्धि। सिफ़र् इतना ही पर्याप्त और सार्थक अनुभूति है कि अब मालिक पक्ष को भी अपनी अस्मिता को लेकर सजग बने रहने की ज़रूरत है। अंगूरी पुलिस को नहीं बताती है कि  रामकली कहाँ है। अंगूरी का यह कहना कि ..ष्पुलिस वालों के हाथ लगती तोघ्ष् मृदुला गर्ग लिखती है...ष्यानि इज़्ज़त थी। रामकली की इज़्ज़त थी। बस उसे ख़ुद उसका पता नहीं थाष्।
निष्कर्ष : परिवार में घरेलू कामगार हाशिये की ज़िंदगी जीने की प्रक्रिया में आज अपनी अस्मिता को लेकर इतने सजग.सक्रिय हैं कि अब मालिकों को भी अपनी अस्मिता का परंपरा पोषित चोला उतारने की दिशा में संघर्षरत रहना पड़ता है। इस दिशा में मालिक और कामगार अस्मिताओं के नियतिपरक अंतर्विरोधों से गुज़रते रहते हैं। अब ना तो अमरकांत की संवेदना अपेक्षित हैए ना ही भीष्म साहनी का विचारधारात्मक सरोकार। मालिक पक्ष के द्वारा कामगारों की ओर से निष्ठा का भाव आज असंभव हैए तो साथ ही मालिकों की ओर से कामगारों के प्रति आदर भाव। प्रतीक्षा ही कर सकते हैं कि घरेलू कामगार विधेयक अस्तित्व में आए और परिकल्पित राष्ट्रीय नीति के तहत एक कामगार की भाँति घरेलू कामगार अपने कार्य करें और सरकार निर्धारित सुविधाएँ मालिक प्रदान करते रहें। दुखद हैएपर इसके अलावा दूसरा सत्य भी नहीं कि सरकारी प्रावधान बनने में सदियों लग जाएँगे। तब तक के लिए अस्मिताओं के अंतर्विरोध को नियति के रूप में स्वीकार कर लेना मालिक और कामगार दोनों के लिए अनिवार्य है।
संदर्भ सूची ...
1. कि़स्सा आज का संगति - विसंगति - पृष्ठ.693
2. महिला कामगार विधेयक।
3. कि़स्सा आज का- संगति - विसंगति, पृ0 693
4. घरेलू कामगार : स्थितियाँ, हक़ और ज़िम्मेदारियाँ, अनुवाद - सीमा श्रीवास्तव, प्रकाशक - जागोरी संस्करण .2010, पृ0 55
5. अनाड़ी़ संगति - विसंगति, पृ0 499
6. समकालीन कहानी का समाज शास्त्र : देवेन्द्र चौबे, प्रकाशन संस्थान, संस्करण 2001, पृ0 49
7.  घरेलू कामगार : स्थितियाँ, हक़ और ज़िम्मेदारियाँ पृ0 59
8. कठगुलाब, मृदुला गर्ग, पृ0 144
9. समकालीन कहानी का समाज शास्त्र, पृ0  49
10. कठगुलाब पृ0 131
11.. एक नौकरानी की डायरी: कृष्ण बलदेव वैद, संस्करण 2006, पृ0 34
12. कठगुलाब पृ0  12
13. घरेलू कामगार : स्थितियाँ, हक़ और ज़िम्मेदारियाँ पृ0  47
14 . अनाड़ी संगति.विसंगति, पृ0 500
15. कठगुलाब़ पृ0 131
16. घरेलू कामगार : स्थितियाँ, हक़ और ज़िम्मेदारियाँ पृ0  47
17. कठगुलाब,  151
18. घरेलू कामगार : स्थितियाँ, हक़ और ज़िम्मेदारियाँ 47
19. उसका विद्रोह, संगति.विसंगति पृ0 56
20. वही पृ0 56
21. कि़स्सा आज का, संगति.विसंगति पृ0  693
पता
हिंदी  विभाग,
सिलीगुड़ी कॉलेज, सिलीगुड़ी, दार्जिलिंग, 
पिन.734001, पश्चिम बंगाल 
मो0  8509734578

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