इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 24 अगस्त 2016

नासिरा शर्मा के उपन्‍यासों का राष्‍ट्रीय एवं अर्तराष्‍ट्रीय परिदृश्‍य

पूजा ( शोधार्थी )


     महिला कथाकारों में नासिरा शर्मा एक सशक्त हस्ताक्षर हैं जिनकी दृष्टि में परिपक्वता और लेखन में व्यापकता है। दैनिक जीवन की घटनाओं, घर-परिवार की विडम्बनाओं और नारी जीवन की पीड़ा के साथ - साथ अपने समय में व्याप्त विसंगतियों और कुरूपताओं को रचनाकार ने यथार्थता के साथ आंका और किसी विषेष क्षेत्र में बंधकर नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्‍व को केन्द्र में रखकर अभिव्यक्ति प्रदान की।
      उपन्यासकार के रूप में नासिरा शर्मा ने हिन्दी साहित्य जगत् को आठ उपन्यास दिये हैं। वर्ष 1984 में ‘सात नदियां एक समंदर’ से प्रारम्भ उनकी औपन्यासिक यात्रा अनवरत विकास करती तथा विविध विषयों को समेटती हुई सन् 2011 में पारिजात तक विस्तृत है। रचनाकार के शब्दों में -‘‘एक के बाद एक तीन उपन्यास इलाहाबाद के परिवेश पर आये वरना पिछले चार उपन्यासों का परिवेश तो ईरान, पैरिस, दिल्ली, दुबई, यू॰ पी॰ का कस्बा-बस्ती और फैज़ाबाद लाहौर रहा। ....मेरी रचनाएँ हिन्दुस्तान के बाहर विभिन्न देशों व शहरों पर लिखी गई।’’1
     नासिरा शर्मा के प्रथम उपन्यास ‘सात नदियां एक समंदर’ की कथावस्तु का ताना-बाना ईरानी क्रांति से संपृक्त, सात सहेलियों के जीवन की उठापटक के साथ-साथ एक साम्राज्य के अंत व दूसरे के प्रारंभ से उपजे द्वंद्व की कथा को प्रस्तुत करता है। ‘ इन्कलाब - ए - सफेद ’ के नाम से चर्चित यह क्रांति ईरान में पश्चिमीकरण के बढ़ते सैलाब पर बाँध बाँधने के लिए प्रभाव में आई थी ‘‘ जिसका मूक संदेश धार्मिक एकता और मॉडर्नाइजेशन के विरूद्ध प्रतिरोध ’’ 2 था। आंदोलन के परिणामस्वरुप अंततः सत्ता परिवर्तित हुई और लोगों का धार्मिक नेता अय्यातुल्ला खुमैनी शासनारूढ़ हो गया। अब धर्म सर्वशक्तिमान हो गया था और जिस धर्म की रक्षा हेतु यह क्रांति वजूद में आयी थी वही धर्म अब निरंकुश तानाशाह में परिवर्तित हो चुका था। उपन्यास में आई सात सहेलियों ( महनाज़, सूसन, परी, मलीहा, तय्यबा, अख़्तर, सनोबर ) में तय्यबा एक ऐसी सशक्त पात्रा है जो एक स्वतंत्र व्यक्तित्व की स्वामिनी है। वह पेशे से पत्रकार है तथा कलम के सहारे जनसामान्य में चेतना उत्पन्न करती है कि ‘‘मौलवियों का हमारे प्रति झुकाव सिर्फ एक चाल है, वह भी हमें जानने की, पहचानने की, हमें फँसाने की इसलिए मौलवियों के हाथों में नकेल थमाना उचित नहीं क्योंकि धर्म और कम्यूनिज़्म तर्क के स्तर पर कभी एक म्यान में नहीं रखे जा सकते और न ही एक साथ चल सकते हैं।’’3 इतिहास साक्षी है कि सत्ता के विरोधियों को कारावास में यातनाएँ झेलनी पड़ती हैं। तय्यबा इसी शोषण का शिकार हुई किंतु न पथ विचलित हुई और न ही पीछे हटी अपितु अंतिम साँस तक परिस्थितियों से संघर्ष करती रही। ईरान की कारावासों में तय्यबा व अन्य महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों के माध्यम से रचनाकार ने संपूर्ण विश्‍व में स्त्रियों की स्थिति पर प्रकाश डाला है। अंततः अत्यंत निर्भीकता से समाज से यह पूछती हैं कि ‘‘समाज के हर बदलाव की मार औरत की पीठ पर ही क्यों पड़ती है?’’4
     भारतीय परिवेश पर आधृत ‘शाल्मली’(1987) और ‘ठीकरे की मंगनी’(1989) में दो विभिन्न समाजों में नारी के संघर्ष को लिपिबद्ध किया गया है। शाल्मली भारतीय परिवेश के हिन्दू समाज में दाम्पत्य संबंधों में आए तनाव के साथ साथ स्त्री अस्तित्व पर प्रश्‍नचिह्न लगाया गया है कि ‘‘स्त्री आखिर है क्या ? युगों - युगों से पीढ़ी - दर - पीढ़ी चली आ रही मान्यताएं तथा संस्कार औरत को गीली मिट्टी से अधिक संज्ञा नहीं देते। पहले पिता की छत्रछाया में उनके अनुरूप वह ढलती है, बाद में पति उसे अपनी इच्छानुसार ढालता है और उसके बाद पुत्र; स्त्री का अपना कोई अस्तित्व है ही नहीं।’’5 ऐसी ही स्थिति शाल्मली की है जो कार्यक्षेत्र में तो सम्मान की अधिकारिणी बन चुकी है लेकिन घर में विशेषकर पति (नरेश ) की दृष्टि में उसका कोई अस्तित्व नहीं है। वह उसे मात्र भोग्या समझ निरंतर उसका तिरस्कार करता है। शाल्मली, नरेश के दुर्व्यवहार से कुंठित होती किंतु उसे क्षमा भी करती है। शाल्मली आधुनिक और स्वावलम्बी होते हुए भारतीय नारी के संस्कार, विवाह संस्था के प्रति निष्ठा तथा पति के प्रति अगाध प्रेम व सत्कार भावना समाहित हैं इसीलिए शाल्मली का ‘‘विश्‍वास न घर छोड़ने पर है, न तोड़ने पर, न आत्महत्या पर है, न अपने को किसी एक के लिए स्वाहा करने पर। मैं तो घर के साथ - साथ औरत के अधिकार की कल्पना भी करती हूँ और विश्वास भी। अधिकार पाना यानी ‘ घर निकाला ’ नहीं और घर बनाए रखने का अर्थ ‘ सम्मान ’ को कुचल फेंकना नहीं है।’’ 6 इसी सकारात्मक प्रवृत्ति के कारण वह न तो तलाक लेती और न ही पुनर्विवाह करती है क्योंकि ” इतना बड़ा संसार तो यही, जब उसमें खुशियाँ प्राप्त न हो सकीं, तो द्वार - द्वार भटकने से भीख मिलेगी, प्रेम और आदर नहीं।’’7
     मुस्लिम परिदृश्य पर आधृत ‘ठीकरे की मंगनी’ उपन्यास शाल्मली का ही विस्तार है जो स्वतंत्र अस्तित्व हेतु संघर्षरत स्त्री की दास्तान से सम्बद्ध है। शिक्षा ने नारी को एक नवीन पथ प्रदान किया जिससे वह आत्मनिर्भर होकर नारी शोषण व जड़ रूढ़ियों का विरोध करने में सक्षम हो पाई जिसका सटीक उदाहरण है उपन्यास की नायिका महरुख़। इसीलिए नारी शोषण के विरूद्ध प्रश्‍न उठाती हुई कहती है- ‘‘ सही गलत की कसौटी औरत होती है, मज़हब और रीति - रिवाज़ों की ज़िम्मेदारी भी औरत होती है, राजनीतिक बदलाव को दर्शाने वाली भी औरत होती है। कुल मिलाकर इस दुनिया को ज़िंदा रखनेवाली शै भी औरत होती है।’’8 तो ‘‘फिर औरत को इतनी हिकारत की नज़र से क्यों देखा जाता है? ’’ 9 परिस्थितियों की समझ महरुख़ को सुदृढ़ता प्रदान करती है और मंगेतर रफत के पर- स्त्री से संबंधों का भान होते ही उसके प्रति अनासक्त हो विवाह का प्रस्ताव ठुकराती है। लेकिन वह पुरूष विरोधी नहीं है अपितु वह मानती है कि ‘‘मर्द न हमारा दुश्‍मन है न हरीफ। वह हमारी तरह इन्सान है।’’10 लेकिन पुरूष का नारी के प्रति परिवर्तित व्यवहार का सबसे बड़ा कारण ‘‘आज की बदलती औरत है जिसे वह समझ नहीं पा रहा है’’,11 को मानती है। इसके द्वारा रचनाकार की साकारात्मक दृष्टि उजागर होती है कि न तो हमें (स्त्रियों) पुरूष बनना है और न ही पुरूषों को स्त्रियां। अपितु अपने - अपने कर्तव्‍यों का भलीभांति निर्वाह करना है। यही सब समझाकर महरुख़ रफत की कुंठाओं का निवारण करती हुई अन्यत्र विवाह हेतु परामर्श देती है। केवल इतना ही नहीं अपितु वह भारतीय परम्परागत समाज में व्याप्त रूढ़ियों विषेषकर ‘स्त्री की एकमात्र धुरी पुरूष है’, ‘नारी पुरूष पर अवलम्बित है’, ‘नारी अस्तित्व पुरूष के कारण है’, की भी विरोधिनी है। वह स्वयं को किसी पर आश्रित न मानते हुए अपने स्वतंत्र अस्तित्व की घोषणा करते हुए कहती है-‘‘एक घर औरत का अपना भी तो हो सकता है उसके बाप या पति से अलग, उसकी मेहनत और पहचान का।’’12 महरुख़ का रफत के प्रति प्रेम व समर्पण उदारीकृत होकर समाज के प्रति प्रेम व समर्पण में परिवर्तित हो जाता है। सामाजिक समस्याओं की जटिलता और उन्हें सुलझाने की कर्मठता में प्रेम की असफलता और मंगेतर रफत के आचरण से उत्पन्न हुई खीझ पूर्णतः विगलित हो जाती है तथा वह कुंठाविहीन नारी के रूप में पाठकों के समझ आती है।
     राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय परिदृष्य में मुसलमानों की स्थिति को केंद्र में रखकर लिखा गया उपन्यास ‘जिंदा मुहावरे’(1994) में ‘‘विभाजन की पीड़ा, दंगे, असुरक्षा, महाजिर की विडम्बना, सम्बन्धों में समाई प्रतीक्षा, यादों के तहखाने, स्वार्थी राजनीतिक अस्मिता का संघर्ष, धर्म, षिक्षा, संस्कृति, अर्थ’’13 जैसे ज्वलन्त प्रष्न उठाए गए हैं। विभाजन एक ऐसी त्रासदी थी जिसने हँसते-खेलते परिवारों को बाँटकर रख दिया और ये परिवार आज भी विभाजन के दर्द को झेल रहे हैं। रहीमुद्दीन का परिवार ऐसे ही परिवार का प्रतिनिधित्व करता है जिसका बड़ा पुत्र इमाम तो उनके पास है किंतु छोटा बेटा निजाम बंटवारे के समय पाकिस्तान को अपना देष मान कराची में जा बसता है। समयोपरांत प्रतिष्ठित व्यापारी बनने पर भी सम्मान न मिला और ‘मुहाजिर’ की संज्ञा पा उसका अंतर्मन व्यथित है। भारत में सम्बन्धियों से मिलने पर सत्य उसके समक्ष आया कि ‘‘रिष्ते तो टूट चुके हैं, मियां.....रिष्तों को अब कोई नहीं पहचानता। एक चने की दाल दो दरख्तों में बदल चुके हैं, हमारा माहौल, हमारी सोच, हमारी चुनौतियां सब एक-दूसरे से जुदा हैं।’’14 इस प्रकार निजाम निरंतर मानसिक षांति का अनुभव करता है। विवेच्य रचना में नासिरा ने मुस्लिम समाज की दयनीय दषा के निरूपण के साथ-साथ भारतीय समाज में उनके बढ़ रहे सम्मान को गोलू के माध्यम से यह कहते हुए दर्षाया है कि ‘‘एक मुसलमान अफसर के नीचे हजारों मातहत हिंदू भी हो सकते हैं और .......दंगे-फसाद.....असलियत वह नहीं, जो बताई जाती है, बल्कि सच्चाई वह है, जो नज़र आ रही है।’’15 इन सभी तथ्यों से अवगत हो निजाम निरंतर पष्चाताप की अग्नि में जलता रहता है और अपनी विवषता पर केवल आँसू बहाने का मजबूर है। यह केवल विभाजन और उसके पष्चात् की समस्या नहीं है अपितु इतिहास में हुए अमानवीय अत्याचार के परिणामस्वरूप समसामयिक परिवेष में भी मनुष्य जाति, धर्म, सम्प्रदाय आदि के नाम पर टुकड़ों में बंटा है और उसकी सोच इन्हीं दायरों में सिमटकर रह गई है। इसी सोच से उबारने के लिए नासिरा आने वाली पीढ़ियों को संदेष देती है कि ‘‘विष्वास है कि वे मानवीय पीड़ा और पहले अनुभवों से सबक लेंगीं और ऐसी राजनीति से हाथ खींचेंगी जो अभिषाप बन दिलों को काटती, जमीन को बाँटती, घरों को उजाड़ती, बारूद के ढेर पर बैठे इन्सान को रूहानी तौर पर लगातार कमजोर बनाती जा रही हैं।’’16
      ‘अक्षयवट’ ( 2003 ) और ‘कुइयांजान’ ( 2005 ) की कथावस्तु का गठन इलाहाबाद को आधार बनाकर किया गया है लेकिन दोनों के सरोकार वैश्‍िवक हैं। ‘अक्षयवट’ की पृष्ठभूमि इलाहाबाद है जिसमें नासिरा शर्मा ने विभिन्न घटनाक्रमों के माध्यम से विभिन्न प्रकार की समस्याओं से जूझते, डूबते - उतराते मनुष्य और जर्जरित जीवन से त्रस्त किंकर्त्तव्यमूढ़ समाज का खाका खींचा है। पुलिस और अपराधियों की साँठगाँठ, चोरी, डकैती, जेबकतरी, लूटमार, अपहरण, हत्याएँ, बलात्कार, फिरौती, अवैध कब्ज़े, जमीन के घपले, तस्करी, माफिया, शराब की भट्टी के कारनामों का सुसंगत तरीके से पर्दाफ़ाश किया है। सरकारी अस्पतालों, दफतरों, महापालिका, कचहरी और शंकित न्यायपालिका पर तीखी नज़र डाली है। नस- नस में व्याप्त भ्रष्टाचार के माहौल में पल रहे नौजवानों, बेरोज़गारों की पीड़ा को गहराई से विश्लेषित किया है। यदि कह दिया जाए कि इसके माध्यम से लेखिका ने केवल इलाहाबाद के ही नहीं अपितु वैश्विक स्तर पर हो रहे भ्रष्टाचार को दर्शाया है तो अतिश्‍योक्ति न होगी। इन सभी को उद्घाटित करने में उपन्यास का मुख्य पात्र ज़हीर व उसके अन्य साथी रमेश, जुगनु, मुरली, बसंत, सुुरेंद्र, सतीश मोजमदार, अशोक मिश्रा व श्यामलाल त्रिपाठी महत्‍तवपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ज़हीर, मुरली, सलमान, बसंत, रमेश, जगन्नाथ मिश्रा ऐसे पात्रों के रूप में उभरे हैं जिनके स्वप्न विपरीत परिस्थितियों के कारण पूरे न हो सके। ये सभी घनिष्ठ मित्रता के सूत्र में बँधकर न केवल समाज में हो रहे अनाचार व दुराचार के विरूद्ध आवाज उठाते हैं अपितु शोषित जनों की सहायता को तत्पर रहते हैं।
     इंस्पेक्टर त्रिपाठी उपन्यास में खलनायक की भूमिका का निर्वाह करता है। स्वयं पर हुए अत्याचारों का बदला लेने के लिए इलाहाबाद में ही पुलिस इंस्पेक्टर का पद प्राप्त करता है तथा अत्याचार, जालसाज़, भ्रष्ट और घिनौनी हरकतों का प्रतीक बन जाता है। ‘‘ऐसा कोई भी अपराध नहीं था जो उसने न किया हो। हत्या, अपहरण, कत्ल, कब्ज़ा, बलात्कार न जाने क्या - क्या कर डाला है। इतना बडा़ क्रिमिनल पुलिस डिपार्टमैंट में, पुलिस की वर्दी पहने बैठा है, यह बहुत आश्‍चर्य की बात है। ’’ 17 इन सब कार्यों में वह अकेला नहीं था बल्कि राजनीतिज्ञ देवीशंकर, विश्वकर्मा, रामसेवक, वकील जमील अंसारी इसका साथ देते हैं। लेकिन कहा जाता है कि ‘ सत्यमेव जयते ’ अर्थात् सत्य की हमेशा जीत होती है। इसीलिए श्यामलाल व उसके अत्याचारों का अंत होना अनिवार्य था। एस॰ एस॰ पी॰ सतीश मोजमदार, गौरव दत्ता व अशोक मिश्रा द्वारा श्यामलाल को पकड़ने का प्रयास किया जाता है जिसमें वे सफल भी होते हैं और वह इन सबसे बचने के लिए आत्महत्या कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेता है। इस स्थानीय संघर्ष के पश्चात् जहीर और उसके मित्रों की मनोदशा भी परिवर्तित हो चुकी थी। उनके अन्दर का आक्रोश अब तर्कसंगत सोच में बदल चुका था। जहाँ ललकार, पुकार, चुनौती का कोई अर्थ नहीं रह गया था बल्कि उस परिसंवाद की उन्हें तलाश थी जिससे वह अपना और दूसरों का जीवन सुधार सकें। मगर उन्हें गलत समझौता अब भी मंजूर न था अतः अब उनका एकमात्र मंतव्य यही है कि ‘‘ जहाँ अन्याय हो रहा हो, वहाँ न्याय दिला सकें। जहाँ अत्याचार हो रहा है, उसके विरूद्ध आवाज उठा सकें। जहाँ कोई किसी को सता रहा हो उसको मुक्ति दिला सकें तो दिलाएं। ’’ 18 इस सोच के माध्यम से उपन्यासकार समाज को सकारात्मक सोच अपनाने का संदेश भी देती हैं।
     जल धरती पर पाए जाने वाले पदार्थों में सबसे साधारण लेकिन गुणों में विशिष्ट एवं असाधारण है। इसके इन्हीं गुणों के कारण पृथ्वी पर जीवन न केवल अस्तित्व में आया और विकसित हुआ अपितु आज भी पृथ्वी पर बरकरार है। लेकिन वर्तमान समय में जल का गिरता स्तर केवल भारत के लिए ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्‍व के लिए एक गंभीर समस्या बन चुका है जिसके लिए सभी चिंतित हैं। इन्हीं जल समस्याओं को केंद्र में रखकर ‘ कुइयांजान ’ ( 2005 ) की कथा का ताना - बाना बुना गया है और गिरते जल - स्तर की वैश्‍विक विकरालता से साक्षात्कार करवाती लेखिका कहती हैं - ‘‘ आज विश्‍व के आँकड़ों द्वारा ज्ञात होता है कि लगभग एक अरब से ज्यादा लोगों को साफ पानी पीने के लिए उपलब्ध नहीं है। दो अरब लोगों को नहाने - धोने के लिए पानी नहीं मिल पाता, जिससे लोग अनेक तरह के रोगों का शिकार हो रहे हैं। मृत्यु - दर दिन - प्रतिदिन बढ़ती चली जा रही है। भारत में गाँवों, कस्बों, शहरों में लोग कुआँ, तालाबों और नदियों से पानी लेते हैं जो अधिकतर गंदा और कीटाणुयुक्त होता है। उसमें प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले संखिया की मिलावट होती है।...’’ 19 इसीलिए राजस्थान में लोग कहीं सूखेपन से व्याकुल हैं तो कहीं गंदे पानी से वहाँ ऐसी बीमारियाँ फैल रही हैं कि ‘‘ पैरों से पतले - पतले केचुएनुमा लंबे - लंबे कीड़े बाहर निकलते थे जो पैरों की माँसपेशियों को शिथिल बना देते थे। ’’ 20 नासिरा शर्मा ने उपन्यास में इस तथ्य की ओर भी इंगित किया है कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो ‘‘ ऐसा दौर जल्द ही आ जाएगा जब हीरे के मौल पानी मिलेगा और पूँजीपति उसको अपनी तिजोरी में बंद कर रखेंगे। तब डकैतियाँ पानी की बोतल के लिए पड़ेंगीं। बैंक लॉकर लूटे मिलेंगे केवल खालिस पानी के लिए जिसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में करोड़ों होगी। यह फैंटसी नहीं, बल्कि आने वाले समय में पानी की दुर्लभता की पूर्वघोषणा है। यह मज़ाक नहीं, बल्कि पानी के बढ़ते महत्‍तव का सच है। ’’ 21 इस प्रकार रचनाकार ने भविष्य के यथार्थ का चित्रांकन कर अपनी सूक्ष्म दृष्टि का परिचय दिया है। ऐसा नहीं है कि लेखिका ने केवल समस्या को ही उभारा है अपितु उसके समाधान के रूप में जहाँ एक ओर ‘ कुइयांजान ’ में बरसात के पानी को एकत्रित करने के साथ राजस्थान की प्राचीन जल - संचय परम्परा ‘ वोज ’ और ‘ कुइयां ’ के द्वारा अधिकाधिक जल संचय का तथा ‘ ज़ीरो रोड ’ उपन्यास में ‘‘ गंदे पानी को रिसायकिल कर काफी हद तक समस्या को हल करने ’’ 22 का संदेश दिया है। पानी की भीष्ण व ज्वलंत समस्या के साथ - साथ मध्यवर्गीय जीवन की दास्तान को भी उपन्यास में प्रस्तुत किया गया है जिसमें प्रेम, छेड़छाड़ तथा विभिन्न परिस्थितियों में पारिवारिक - सामाजिक बनते - बिगड़ते संबंधों का प्रकटीकरण किया गया है। इन सभी विशेषताओं के कारण प्रसिद्ध आलोचक डॉ॰ नामवर सिंह ने ‘ कुइयांजान ’ को सन् 2005 का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास घोषित किया और इसी उपन्यास के लिए सन् 2008 में हाऊस ऑफ लॉर्डस ( लंदन )  में नासिरा शर्मा को 14 वें अंतरराष्ट्रीय ‘ इंदू कथा सम्मान ’ से सम्मानित किया गया।
      लेखिका ने अपने दो अंतिम उपन्यासों ‘ ज़ीरो रोड ’ (2008) व ‘ पारिजात ’ (2011) में मनुष्य की संवेदना - शून्य मानसिकता एवं परिवर्तित संबंधों की कहानी को कहा है। ‘ ज़ीरो रोड ’ के कथातंतु इलाहाबाद से दुबई तक विस्तृत हैं जिसमें रचनाकार ने न केवल निम्न मध्यवर्गीय भारतीय परिवारों की आर्थिक तंगी को उभारा है अपितु प्रवासी मानसिकता, बड़े शहरों का अकेलापन, साम्प्रदायिकता और आतंकवाद से जूझती पूरी दुनिया को एकसूत्र में गूंथकर उपन्यास के माध्यम से पाठक के समक्ष प्रस्तुत किया है। सिद्धार्थ व उसके मित्रों - केरलवासी रामचंद्रन, इंजीनियर श्रीनिवासन, ईरानी फिरोज़ मीखची, जाज़फ सउद, पाकिस्तानी बरकत उसमान, बंग्लादेशी सुदर्शन, सूरत के डॉ॰ शाहआलम, इराकी असद खजूरी, लतीफ फरमान, फिलिस्तीन सफीर, जारयाब, गुलफाम आदि सम्मिलित हैं जो किसी न किसी कारणवश अपने देश से उखड़, अपने परिवारों को छोड़ दुबई में रहते हैं। प्रत्येक शाम इकट्ठे होकर अपने दुःखों व अकेलेपन को बांटने का प्रयास करते हैं। इन बैठकों में आधुनिक समस्याओं से जुड़ी विभिन्न प्रकार की वार्ताएँ होतीं। इनकी बातचीत के माध्यम से ही नासिरा शर्मा ने विश्व में हो रही हिंसा को व्यक्त किया है। जैसे - गोधरा कांड, निठारी कांड में बच्चों पर हुए अमानवीय अत्याचार, रामजन्मभूमि-बाबरी - मस्जिद विवाद में हिंदू - मुस्लिम मतभेद, मुम्बई में बम - विस्फोट, अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला, अमेरिका का कुवैत पर आक्रमण, ईरान - इराक युद्ध आदि। भारतीय परिवेश में ‘‘आज भ्रष्टाचार, दुल्हन को जलाना, बाबरी - मस्जिद व रामजन्म भूमि समस्या, भूख से दम तोड़ते लोग, आत्महत्या करते किसान ’’ 23 आदि समस्याएँ प्रमुख रूप से देश के विकास को अवरूद्ध करती है। आधुनिक युग में मानव - मानव का तो शत्रु बनता ही जा रहा है। साथ ही साथ उन बच्चों के प्रति भी, जो मासूम व दुनिया के छल - कपट से दूर हैं, वैमनस्य रखता है। स्पष्ट है कि ‘ज़ीरो रोड’ उपन्यास में युगीन परिवेश की यथार्थता व उससे जूझते मानव की दशा को प्रकट किया है। उनके शब्दों में ‘‘यह समय, जिसमें हम जी रहे हैं, वास्तव में सनसनी और सदमों से भरा हुआ है। घटनाएँ हर दिन नये ढंग से इन्सान के विश्वास को तोड़ने का षड्यंत्र रचती है। ...लाख अवसाद से भागने, बचने की कोशिश करो मगर वह आपका पीछा लगातार करता रहता है। एक भय की संरचना लगातार आपकी कोशिकाएँ रचती रहती हैं जो आपको निरंतर निर्बल बनाती हैं, लाख आप आत्मा को मजबूत रखने की कोशिश करें मगर शरीर इन सदमों से कमज़ोर पड़ता है। ’’ 24
     ‘पारिजात’ उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता साम्प्रदायिक सद्भाव है जिसका प्रकटीकरण तीन मित्रों प्रह्लाद दत्त, बशारत हुसैन, जुल्फिक़ार अली के माध्यम किया है जो प्रत्येक स्तर पर एक - दूसरे का साथ देते हुए भावनाओं को महत्त्व देते हैं। नासिरा शर्मा ने किसी एक धर्म को विशेष महत्त्व न देकर सभी धर्मों को समान माना है क्योंकि ‘‘ धर्म केवल योजनाबद्ध तरीके से जीवन जीने का एक रास्ता है। आज धर्म को समझना बेहद जरूरी हो जाता है क्योंकि उसका गलत प्रयोग इंसानों की जिंदगी को बेहद दुश्वार बना रहा है। ’’ 25 अतः स्पष्ट है कि इसका नामकरण ‘ पारिजात ’ भी शायद इसी आधार पर रखा गया है। जब यह पेड़ फूलता है तो बराबर इसके फूल झरते रहते हैं और यह फिर भी फूलों से लदा रहता है या इसलिए कि यह दोरंगी फूल हैं जिसमें फर्क कर पाना मुश्किल है कि एक रंग कहां खत्म होता है और दूसरा कहाँ से शुरू। जैसे भारत के दो धर्मों का एक - दूसरे में रचा - बसा होना या फिर इस फूल की यह खूबी कि सूख जाने के बाद भी अपनी खुशबू और रंग दोनों कायम रहते हैं जैसे इस देश में हिंदुओं और मुसलमानों का रिश्ता, जो लाख अलगाववाद के बाद भी दोस्ती और मोहब्बत से महकता है।
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि नासिरा शर्मा का औपन्यासिक साहित्य राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय परिदृष्य को अपने में समाहित किये हुए है। भू - मण्डलीकरण की जिस प्रवृत्ति ने विश्‍व को एक सूत्र में बांध दिया वह प्रवृत्ति नासिरा षर्मा के साहित्य में स्वतः उदघाटित हो उठती है जिसके माध्यम से लेखिका ने सम्पूर्ण विश्‍व की ज्वलंत समस्याओं को वाणी प्रदान की है। यही कारण है कि नासिरा शर्मा समसामयिक युग की पहचान बन सकी।
संदर्भ सूची :
1 रवींद्र कालिया ( संपादक ) - नया ज्ञानोदय, ( नासिरा शर्मा से जाबिर हुसैन की बातचीत ) , अंक - जून 2007, पृ॰ 62.
2 नासिरा शर्मा - सात नदियां एक समंदर, नई दिल्ली: सामयिक प्रकाशन, पृृ० 54.
3 यथावत्, पृृ० 289.
4 यथावत्।
5 नासिरा शर्मा-शाल्मली, नई दिल्ली: किताबघर प्रकाशन, सन् 1987, पृ॰ 75.
6 वही, पृ॰ 164.
7 वही, पृ॰ 161.
8 नासिरा शर्मा - ठीकरे की मंगनी, नई दिल्ली: किताबघर प्रकाशन, सन् 1989, पृ॰ 178.
9 पूर्ववत्।
10 पूर्ववत्, पृ॰ 179.
11 पूर्ववत्।
12 पूर्ववत्, पृ॰ 197.
13 मधु संधु - ‘ महिला उपन्यासकार 21वीं सदी की पूर्व संध्या के संदर्भ , दिल्ली: निर्मल पब्लिकेशन्स, सन्  2000 पृ॰ 17.
14 नासिरा शर्मा- जिंदा मुहावरे, नई दिल्ली: वाणी प्रकाशन, सन् 1994, पृ॰ 123.
15 वही, पृ॰ 127.
16 वही, पृ॰ 08.
17 नासिरा शर्मा- अक्षयवट, नई दिल्ली: भारतीय ज्ञानपीठ, सन् 2003, पृ॰ 312.
18 यथावत्, पृ॰ 228.
19 नासिरा शर्मा- कुइयांजान, नई दिल्ली: सामयिक प्रकाशन, सन् 2005, पृ॰ 88.
20 पूर्ववत्, पृ॰ 118.
21 पूर्ववत्, पृ॰ 37.
22 पूर्ववत्।
23 नासिरा शर्मा - ज़ीरो रोड, नई दिल्ली: भारतीय ज्ञानपीठ, सन् 2008, पृ॰ 313.
24 नसिरा शर्मा - पारिजात, नई दिल्ली: किताबघर प्रकाशन, सन् 2011, पृ॰ 32.
25 नासिरा शर्मा - खुदा की वापसी, नई दिल्ली: किताबघर प्रकाशन, सन् 1998, पृ॰ 9.
हिंदी - विभाग
पंजाब विश्‍वविद्यालय
चंडीगढ़

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें