इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 24 अगस्त 2016

वाक्‍या ऐसा यह हुआ कैसे



हरदीप बिरदी

वाक्या ऐसा यह हुआ कैसे
सब हैं हैराँ कि मैं बचा कैसे
तूने सोचा नहीं कभी शायद
तेरा चेहरा निखर गया कैसे
यह ख़बर तू ही अब हवा ला दे
जी रहा है वो यह बता कैसे
मैंने ख़ुद को बहुत संभाला था
ले गई दिल वो इक अदा कैसे
बातों .बातों में रूठ जाओगे
ज़िन्दगी देगी फिर मज़ा कैसे
उसके हाथों का इक खिलौना हूँ
उसको देता भी मैं सज़ा कैसे
चाँद में दाग़ है मगर ' बिरदी' 
इतना लगता है वो भला कैसे
पता
लुधियाना
9041600900

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें