इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 24 अगस्त 2016

वाक्‍या ऐसा यह हुआ कैसे



हरदीप बिरदी

वाक्या ऐसा यह हुआ कैसे
सब हैं हैराँ कि मैं बचा कैसे
तूने सोचा नहीं कभी शायद
तेरा चेहरा निखर गया कैसे
यह ख़बर तू ही अब हवा ला दे
जी रहा है वो यह बता कैसे
मैंने ख़ुद को बहुत संभाला था
ले गई दिल वो इक अदा कैसे
बातों .बातों में रूठ जाओगे
ज़िन्दगी देगी फिर मज़ा कैसे
उसके हाथों का इक खिलौना हूँ
उसको देता भी मैं सज़ा कैसे
चाँद में दाग़ है मगर ' बिरदी' 
इतना लगता है वो भला कैसे
पता
लुधियाना
9041600900

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