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इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

बुधवार, 24 अगस्त 2016

वाक्‍या ऐसा यह हुआ कैसे



हरदीप बिरदी

वाक्या ऐसा यह हुआ कैसे
सब हैं हैराँ कि मैं बचा कैसे
तूने सोचा नहीं कभी शायद
तेरा चेहरा निखर गया कैसे
यह ख़बर तू ही अब हवा ला दे
जी रहा है वो यह बता कैसे
मैंने ख़ुद को बहुत संभाला था
ले गई दिल वो इक अदा कैसे
बातों .बातों में रूठ जाओगे
ज़िन्दगी देगी फिर मज़ा कैसे
उसके हाथों का इक खिलौना हूँ
उसको देता भी मैं सज़ा कैसे
चाँद में दाग़ है मगर ' बिरदी' 
इतना लगता है वो भला कैसे
पता
लुधियाना
9041600900

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