इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 9 नवंबर 2016

चेहरा

मोनी सिंह

         सुबह उठते ही शीशे में मैं अपना चेहरा देखा करती हूं। हर दिन की शुरूआत मेरी वही से होती है। जिस दिन न देखूं कुछ अधूरा सा लगता है। ऐसा लगता है जैसे मैने खाना न खाया हो। किसी से बात करने का मन नही होता। अजीब से ख्याल आते मेरे मन में। राम जाने आज क्या होगा ? आज के दिन तो मैने अपना चेहरा शीशे में नही देखा। यही सोचकर मैं कालेज में प्रेक्टिकल देने जा रही थी। मां ने बड़े प्यार से लंच पैक किया था। घर से निकल कर बस स्टाप के लिए रिक्शा लेने को खड़ी थी। काफी देर से कोई रिक्शा वाला तैयार नही होता, जो होता पैसे ज्यादा मांगता। प्रेक्टिकल के लिए देरी हो रही थी।
         तभी मैने एक रिक्शे वाले को रूकाया बस स्टाप चलने को कहा। उसने हां कर दिया। बड़ी खुशी से मै जैसे बैठी। तभी, मैडम 30 रुपए लगेगें।
         मेरे तो होश उड़ गए थे। 15 रूपए की जगह 30 रूपए मांग रहा है, हलकट कहीं का। जैसे मैं बैठी वैसे ही रिक्शे से नीचे उतर आई।
        एक बार दिल मे ख्याल आया चलो पैदल ही चलते हैं। इतनी देर में तो बस स्टाप क्या कॉलेज पहुंच जाते।
मन में एक बात बार - बार मचल रही थी। अपना चेहरा क्यों नही देखा। जल्दी - जल्दी में क्यों भूल गई। इतनी देर से यहां खड़ी हूं। 2 मिनट वहां नही दे सकती थी।
        उदास मन लिए तेजी से पैदल बस स्टाप के लिए चल दिया। समय भी कम था। वहां पहुंचकर बस का इंतजार भी करना था।
        मैं पैदल चल रही थी तभी पीछे से गाड़ी का हार्न सुनाई पड़ा। और मेरे बगल में आकर गाड़ी रूक गई। हेलमेट होने की वजह से मैं उसे पहचान न सकी थी।
         मैने अपना कदम और तेजी से बढ़ा दिया। ऐसे लोगों का काम होता है सरे राह अकेली लड़की देखी, छेड़ दिया।
         तभी उस लड़के की आवाज आती है- रानी पहचाना नही क्या ?''
        अपना नाम सुनकर मै थोड़ा हैरान रह गई। पीछे मुड़कर देखा तो मेरे भाई का दोस्त था। जो कभी एक या दो बार घर आया था।
         वह मेरे पास आया और बोला - कहा जा रही हो। पैदल ही।'' अपनी परेशानी मैंने उसे बताई '' रिक्शा नही मिल रहा है। आज कॉलेज में प्रैक्टिकल है। देर हो रही थी इसलिए पैदल बस स्टाप जा रही हूं।''
- चलो मै छोड़ देता हूं। उधर ही जा रहा हूं।'' बस स्टाप पहुंचकर मैने उसे '' शुक्रिया '' कहा। अब बस का इंतजार था।
         इंतजार की घड़ी की फिर से शुरूआत हो चुकी थी। आधे घण्टे बीत चुके थे। अब क्या होगा ? प्रैक्टिकल शुरू होने में सिर्फ  45 मिनट बचे थे। मै नरबस होती जा रही थी। ऐसा लग रहा है कि अब तो ये साल गया अगले साल फिर इसी क्लास में गुजारना पड़ेगा। उलझन से इधर से उधर क्या करूं ? भाई भी घर पर नही था कि फोन कर लेती।
        सिर नीचे किए मैं वही पर बैठी थी। तभी एक नया करिश्मा होना था। कोई आवाज आई - तुम अभी तक यहीं हो। पेपर नहीं देना क्या? कब से पेपर शुरू है? मुझे लग ये आवाज भगवान की तो नही है। ऊपर चेहरा किया तो आदित्य मेरे भाई का दोस्त था। वहीं से गुजरा।
        जिसने मुझे बस स्टाप छोड़ा था। पीठ पर बैट टांगे लगता है कही क्रिकेट खेलने जा रहा है। मैंने कहा - पहले रिक्शा अब बस नहीं मिल रही है।
- चलो कॉलेज छोड़ देता हूं।''
- नहीं आप जहां जा रहे है, आपको देर हो जाएगी।''
- कोई बात नहीं पर तुम्हारा पेपर तो छूट जाएगा। मेरे देर से पहुंचने के बाद भी काम चल जाएगा।''
         मैं उसके साथ गाड़ी पर बैठ गई। टोपी लगाए हुए, लम्बे बाल, सफेद लोवर और टी शर्ट पहने। आदित्य ने कॉलेज के सामने हमें उतारा। और कहा - दो तीन घण्टे बाद मैं वापसी करूंगा। अगर पेपर हो जाए तो साथ चल लेना। मेरा नम्बर ले लो। बता देना मुझे।''
        नम्बर को लेकर मै कॉलेज चली गई। वहां अपनी सहेली रीता से सारी बात बताई - यार आज का दिन तो मेरे लिए तो खतरनाक था। रोज मैं अपना चेहरा शीशे मे देखकर निकलती थी। आज जल्दबाजी में भूल गई। न रिक्शा मिल रहा था। न बस वो तो आदित्य मिल गया तो आ गई नही तो पेपर नही दे पाती।''
- अरे क्या बात है, बहाना अच्छा है। अपने ब्यायफ्रेंड के साथ घूमने का।''
- अरे नही कहां ले जा रही हो बातों को। मेरे भाई का दोस्त है। एक दो बार घर गया है।''
- ओह, तो घर भी हो आया है। रानी तेरी तो कहानी शुरू हो गई।''
- अरे नहीं ऐसी कोई बात नहीं हैं।''
- तो कैसी बात है, मेरी जान। '' हम दोनों हँसने लगे।
        तभी घण्टी की आवाज सुनाई देती है। प्रैक्टिकल शुरू हो गया था। दो घण्टे बाद हम बाहर निकले तो सोंचा कि फोन कर ले। लेकिन तब तक बस आ गई थी। तो उसी से लौट आए। घर आकर मैंने मम्मी को सारी बात बताई। चलो भला हो उसका जो उसने छोड़ दिया नहीं तो पेपर छूट जाता। मैंने मां से कहा - उसे मैंने पहचाना नहीं था।''
        उस रात मुझे नींद नही आ रही थी। पूरी रात उस घटना के बारे में सोचती रही। सबसे ज्यादा तो रीता की बातों को। और हंसती रही। उसके लम्बे बाल, वो टोपी लगा कर रखना। क्या लग रहा था। खैर, रात बीत गई किसी तरह। दूसरे दिन रीता का फोन आया। हाल - चाल पूछने के बाद उसने कहा - तुम्हारे उनका क्या हाल है।'' मेरी जुबान से न चाहते हुए भी निकल गया - ठीक है। '' तभी उसने कहा - अभी कल कह रही थी कुछ नहीं है और आज कह रही हो ठीक हैं।'' मैं बातों को बनाने लगी। पर वो एक न मानी।
         सच्चाई ये थी कि कुछ नही था। लेकिन उसकी बातों को सुनकर कुछ जरूर होने लगा था। फोन कटते ही याद आया कि अरे, मैं कितनी अहसान फरामोश हूं। शुक्रिया तक नहीं किया उसका। चलो, ये तो एक बहाना था। बात करने का। फोन किया पर कोई जवाब नहीं। गुस्सा आया कोई परवाह ही नहीं। जैसे मैं कोई रोज फोन करती हूं उसे।
        दिन में भी ख्याल शुरू हो गए थे। तबी फोन की घण्टी सुनाई देती है। फोन उठाते ही - हैलो, कौन।'' उधर से आवाज आई।
        मन मे सोचा कल कॉलेज छोड़ा और आज भूल गया। मैंने भी अंजान बन कहा - किससे बात करनी है।''
उसने कहा '' आपका फोन आया था।''
         कितना अजीब बंदा है नम्बर भी सेव नही किया था। फिर मैंने कहा ' रानी बोल रही हूं। कल आपने कॉलेज छोड़ा था। याद आया।''
- हाँ, बताओ, रानी पेपर कैसा गया।''
- ठीक गया। मैंने सोचा शुक्रिया अदा कर दे आपका। आप न आते तो पेपर छूट गया होता।''
         फोन कट चुका था। शायद बैलेंस खत्म हो गया था। बात पूरी नहीं हो सकी थी। दिल में बहुत कुछ था। उस दिन से ऐसा लग रहा था कि जैसे मैं खो चुकी हूं। अब न तो चेहरा देखने की फिकर नहीं थी। दिल में जो आदित्य का चेहरा उतर गया था। अब हर दिन उससे बात करने का मन होता था। वो नासमझ इससे अंजान था। उसे क्या फर्क उसे क्या पता कि कोई उसके फोन का इंतजार कर रहा हैं।
         काफी दिन हो गए थे मेरी बात उससे नहीं हुई थी। परेशान खोई, मैं कोई बहाना तलाश रही थी। पर साला बहाना ढूंढो तो नहीं मिलेगा। आखिर वो दिन आ ही गया। बहाने का दिन। मेरा जन्म दिन था।
        मैने मां पूछकर आदित्य को बुलाया था।
         शाम को मेहमान आने से ज्यादा मैं आदित्य का इंतजार कर रही थी। निक्कमा कहीं का। अभी तक आया नहीं। समय की कोई परवाह नहीं है।
        मेहमान आ गए थे। केक भी कटने जा रहा था। तभी पीछे से हैप्पी बर्थ डे की आवाज सुनकर मुड़ी तो देखा आदित्य खड़ा था। खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। केक पर चाकू नहीं चल रहा था वो अब दौड़ने जा रहा था। केक काटकर मां को खिलाया। और लोगों को खिलाया पर दिल कह रहा था सबसे पहले आदित्य को खिलाऊं पर चाहते हुए भी न कर सकी।
        तभी फोटो खींची जा रही थी। मैंने भी मोबाइल में उसकी फोटो खींच ली। किसी को पता न चले और न ही उसको की मैंने फोटों खींची है उसकी।
        सब खाना खाकर जा रहे थे। दिल कह रहा था कि आदित्य को रोक लूं। थोड़ी देर बाद जाए पर कैसे रोकूं। वो तो तैयार बैठा था, घोड़े पर। वो चला गया था। अब उसकी फोटो मेरी पास थी। उसका एक चेहरा मेरे पास था। जिसे देखने के लिए मैं बेचैन रहती थी।
        अब क्या था ? अपने चेहरे को देखना छोड़ सुबह मोबाइल में उसका चेहरा सामने देखती थी। इस पूरे बात से आदित्य अंजान था। पर उस दिन से मैं उसे बेपनाह चाह रही हूं। अब ऐसा लगता है कि उसका चेहरा ही सब कुछ है। न देखो तो दिन नहीं जाता सही से। फर्क इतना था कि पहले शीशे में अपना चेहरा देखती थी और आज मोबाइल पर हर रोज आदित्य का।
        इस इंतजार में कि उसे इस बात की खबर हो जाए। वो मुझसे बात करना शुरू कर दे। कभी - कभी तो अपने आसूंओं से तकिए को गीला कर देती थी।
         चेहरे के साथ मेरी सारी दिन चर्या बदल गई थी।

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