इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 9 नवंबर 2016

बाल साहित्‍य का उदभव और विकास

यदुनंदन प्रसाद उपाध्‍याय


       साहित्य समाज का दर्पण होता है! प्रत्येक साहित्यिक विधा तत्कालीन परिस्थितियों की उपज होती है! हिन्दी साहित्य का क्षेत्र विस्तृत और विविधता लिए हुए है! जो समाज के अनेक रूपों को परोसता आ रहा है! बाल - साहित्य भी कोई नया विषय नहीं है! बाल साहित्य हमारे यहॉं मौखिक रूप में सदियों से रहा है! दादी - नानी तरह - तरह की कहानियॉं सुनाती थीं और हमारे रूठने का कारण एक यह भी होता था! कभी कोई दिन ऐसा न था जब कहानी नानी नहीं कहतीं! बाल - साहित्य का जन्म उसी कहानी की कोख से हुआ है! बाद में थोड़ा परिवर्तन हुआ! पंचतंत्र और हितोपदेश की कहानी सिंहासन बत्तीसी और वेताल पच्चीसी की कहानी भी बच्चों के बीच आने लगी! जातक कथाएॅं इसी के अंतर्गत हैं! बाल साहित्य की लिखित परम्परा में अमीर खुसरो से इसकी शुरूआत मानी जा सकती है! खुसरो की कुछ मुकरियॉं और कुछ पहेलियॉं बाल मनोरंजन और उन्हें कुछ सिखाने क उद्देश्य से भी लिखी गईं! इसीलिए खुसरो को बीज - बाल साहित्य लेखक कह सकते हैं !
       मध्यकाल में सूर और तुलसी ने बाल - साहित्य को व्यापक रूप प्रदान किया! तुलसी में कम तो सूर के सम्पूर्ण काव्य में बाल मनोविज्ञान की नानाविध झॉंकियॉं दृष्टित होती हैं! बालक की विविध चेष्टाओं और विनोदों के क्रीड़ा स्थल, मातृ हृदय की अभिलाषाओं, उत्कंठाओं और भावनाओं के वर्णन में सूरदास हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ कवि ठहरते हैं! उनके पदों की यह विशेषता है कि उनको पढ़कर पाठक जीवन की नीरस और जटिल समस्याओं को भूल कर उसमें मग्न हो जाता है! तुलसी दास के राम चरित मानस में पहला कांड भी बाल काण्ड ही है! वहॉं एक प्रसंग आता है कि एक दिन राजा दशरथ भोजन करने बैठते हैं और साथ में खाने के लिए राम को बुलाते हैं! राम नहीं आते हैं! बच्चों के साथ खेल में लीन हैं! कौंशल्या की एक आवाज में खेलना छोड़कर दौड़ कर आ जाते हैं! पंक्तियॉं हैं - '' भोजन कर त बोलावत राजा! नहीं आवत तजि बाल समाजा !! कौसल्या जब बोलन जाई ! ठुमकि - ठुमकि प्रभु चलहिं पराई !!'' हम कह सकते है, बालक के लिए कोई राजा नहीं होता, वह स्वयं अपने मन का राजा होता है! बड़ी - से - बड़ी बादशाहत भी उसकी तोतली बोली और निरछल किलकारी पर नत मस्तक हो जाती है!
       रीति- काल पक्का श्रृंगार काल है। केवल भूषण और सूदन को छोड़ कर! परंतु बाल-साहित्य की दृष्टि से समस्त रीति-काल कवि सूरदास अंधा सिद्ध हुए! उनकी दृष्टि नायिका के नव यौवन ने छीन ली और उन्हें घोर श्रृंगारी बना दिया! इसी लिए श्रृंगार रस की प्रधानता के कारण रीति काल को कुछ आलोचक श्रृंगार काल भी कहते है! कुछेक कवि भी यदि सूर और तुलसी की बाल- काव्य परंपरा को बढ़ाते रहते तो शायद रीति-काल पर वे श्रृंगार के एक छत्र राज का आरोप नहीं लगता!
       भारतेन्दु युग में खुद भारतेन्दु ने '' अंधेर नगरी '' नामक प्रहसन लिखा, जिसमें बच्चों की बचकानी दुनिया का कुछ अंश देखा जा सकता है! राजा लक्ष्मण सिंह का बालक भरत नाटक भी इस नए प्रयास में कम महत्त्वपूर्ण नहीं है! सबसे बड़ा काम तो फ्रेडरिक पिंकाट ने किया! इंग्लैण्ड में बैठे - बैठे हिन्दी में किताब लिख रहे थें, वह भी बच्चों के लिए। चार भागों में! बाल दीपक नाम से उन्हीं की किताब उस समय बिहार के स्कूलों में पढ़ाई जाती थी! बाल दीपक की चर्चा आज भी होती है! '' बेताल पच्चीसी '' और '' सिंहासन बत्तीसी '' के साथ - साथ '' पंचतंत्र '' और '' हितोपदेश '' का अनुवाद भी बालकों को रुचि के साथ पढ़ने का अवसर दिया!
       द्विवेदी युग में मैथिली शरण गुप्त ने '' सरकस '' नामक कविता लिखी जो बहुत प्रसिद्ध हुई स्वयं द्विवेदी जी भाषा को प्रवाह मयी बनाने के साथ - साथ भावों की सरलता और सरसता के पक्ष में कलम - कलम चलाने लगे! ताकि बड़ों के साथ - साथ बच्चे भी साहित्य को अपने जीवन का अंग बना सकें! बाल साहित्य के क्षेत्र में सुभद्रा कुमारी चौहान का नाम अति महत्त्वपूर्ण है। उनकी जो कविता कभी हमने पॉंचवीं - छठवीं में पढ़ी थीं वे आज भी उतनी ही ताजा और प्रासंगिक हैं! कुछ पंक्तियॉं द्रष्टव्य हैं -
यह कदम्ब का पेड़ अगर मॉं होता यमुना तीरे
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे - धीरे
दे देती यदि मुझे बॉंसुरी यह दो पैसे वाली
किसी तरह नीचे हो वह कदंब की डाली!
       इसी तरह एक दूसरी कविता भी बालक मन को केन्द्र में रखकर लिखी गई हैं ! कुछ अंश प्रस्तुत हैं .
बार - बार आती है मुझ को मधुर याद बचपन तेरी
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी!
       इतनी मार्मिक अभिव्यक्ति अन्यत्र दुर्लभ है! वे अल्प- काल में ही विपुल साहित्य सृजन कर गयी हैं! उनका काव्य सूरदास जी की तरह वृद्ध को भी बालक बनाकर छोड़ता है! वे महान थीं! उनके बारे में डॉ. बच्चन सिंह लिखते हुए कहते हैं - घटेल कविताओं में मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी भी काफी लोकप्रिय है! इतना सहज महत्व और ऋजु वात्सल्य आधुनिक कविता में मिलना अत्यंत दुर्लभ है!
       आधुनिक-काल का सर्वोत्तम आविष्कार गद्य का विकास है! गद्य लेखन जब अपने अस्तित्व और प्रभाव में आया तो प्रेम चंद ने भी ढेरों कहानियॉं एवं उपन्यास लिखे और अनुदित किये! साहित्यकार को वर्ग - चरित्र का ज्ञान होना जरूरी है! बिना उसकी पहचान के उस पर कलम चलाना दही में मूसर देना है! प्रेम चंद अपने समय के सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक हैं! उनका ध्यान बालक वर्ग पर विशेष तरह से था! उन्होंने '' दुर्गा दास'' नामक पहला उपन्यास लिखा जो मूल रूप से बाल - बालिकाओं के लिए ही लिखा गया था! उनका मानना था कि बालकों के लिए राष्ट्र के सपूतों से बढ़कर उपयोगी साहित्य का कोई दूसरा अंग नहीं है! इससे उनका चरित्र ही बलवान नहीं होता, उनमें राष्ट्र प्रेम और साहस का संचार होता है!
       प्रेम चंद ने बच्चों को केन्द्र में रखकर कई कहानियॉं लिखीं! '' ईदगाह, बड़े भाई साहब, गुल्ली डण्डा, बूढ़ी काकी आदि!'' प्रेमचंद जानते थे कि एक बेहतर जीवन की शुरूआत बचपन से ही होती है! गुलेरी जी की कहानी '' उसने कहा था '' में भी बाल - मनोविज्ञान का आंशिक रूप देखने को मिलता है बल्कि बचपन की सहजता और लापरवाही से ही कहानी शुरू होती है! जो हिन्दी की पहली स्वप्न शैली में लिखी गयी कहानी है!
       बालक की जिंदगी को आधार बनाकर लिखा गया हिन्दी का सबसे पहला सफल और कलात्मक उपन्यास है - मन्नूभण्डारी कृत आपका '' बंटी '' सुशिक्षित आधुनिक पति - पत्नी के अहं के टकराव से तनाव और फिर संबंध - विच्छेद बण्टी का स्थितियों में पिसते जाना और अकेले पड़ जाना इसी प्रक्रिया का अंग है! पति -पत्‍नी की परस्पर वैमनस्यता की मार बण्टी को झेलनी पड़ती है! निर्मल वर्मा कृत लाल टीन की छत में किस तरह एक अबोध बच्ची अपनी निरछलता के कारण गहन यातना और अकेले पन की शिकार हो जाती है! अज्ञेय कृत '' शेखर : एक जीवनी '' उपन्यास में शेखर वह बालक है जो खुद से अपने जीवन को विस्तार देने में लगातार संघर्ष करता है! रमेश चंद्र शाह कृत '' गोबर गणेश '' में विनायक के जरिए बालकों की इच्छा - आकांक्षाओं को लेखक ने बखूबी प्रस्तुत किया है उन्हीं का एक अन्य उपन्यास '' किस्सा गुलाम '' जिसमें एक दलित बालक कुंदन जो बौद्धिक स्तर पर बहुत आगे पहुॅंच जाता है लेकिन संस्कारों की गुलामी उसका पीछा नहीं छोड़ती! अपनी साहित्यिक सीमा में यह भी बालोपयोगी है! वर्तमान साहित्य जगत् में हरिकृष्ण देवसरे, श्रीप्रसाद, विनायक ही उनकी मनोदशा को बड़ी निर्भीक और निरछल वाणी में चित्रित किया है!
       आज समय बड़ी तेजी से बदल रहा है! जिसका सर्वाधिक प्रभाव बच्चों पर है! कुछ लोगों का मानना तो यहॉ तक है कि वर्तमान जगत् का बालक संस्कार - विहीन हो गया है! पर इस बात में कितनी सच्चाई है, यह जानने से पहले इस बात पर मंथन कर लेना समीचीन होगा कि उन्हें संस्कार - विहीन कर कौन रहा है? क्या हम उन्हें धर्म - कर्म, साहित्य - समाज, संस्कार और भाव - व्यंजना की शिक्षा देते हैं? क्या कभी भगवान राज, कृष्ण या किसी अन्य महापुरूष की जीवन या प्रेरक प्रसंग बच्चों को सुनाते या उन पर अमल करने के लिए बल देते हैं? क्या हमने कभी जानने की इच्छा की कि वह किस मानसिकता को धारण करता है और उसकी दिशा क्या है? नहीं,केवल बड़े स्कूल या कॉलेज - कोचिंग में दाखिला दिलवाने से बच्चे राम,कृष्ण,गांधी,गौतम और विवेकानंद नहीं बन सकते। जब तक कि हम खुद में संस्कार डालकर बच्चों के हृदय की थाली में नहीं परोसेंगे! आज का बालक तकनीकी मस्तिष्क का हो गया है, जो शरीर और हृदय से रोबोट या मशीन बन चुका है! अगर यह ऐसे ही चलता रहा तो निश्चित ही वह दिन दूर नहीं कि रोबोट आपको और आपके समाज और संस्कृति को नष्ट कर देगा! और उसके जिम्मेदार हम होंगे न कि बच्चे! साहित्यजगत् में बालसाहित्य का बीड़ा अनेक लोगों ने उठा रखा है! परंतु उपयोगी साहित्य कुछेक लेखकों के प्रतिफल का ही परिणाम है! बाल साहित्य के प्रति हमारी उदार और सकारात्मक सोच भी इस दिशा में किए गये प्रयासों की परम्परा को प्रवाहशील बना सकती है! बाल - साहित्य के श्रेष्ठ रचनाकारों की रचनाओं का कलेक्शन होना चाहिए! बालक, चंपक, नंदन, चंदा मामा, किशोर - प्रभात जैसी पत्रिकाओं में अब तक जो बाल साहित्य पर काम हुए उनको संग्रहित कर गांव - शहर, स्कूल - स्कूल तक सस्ते दामों में उपलब्ध कराना चाहिए! पराग जैसी पत्रिका को हम नहीं भूल सकते हैं! बाल साहित्य का क्षेत्र व्यापक हो इसके लिए जरूरी समय - समय पर परिचर्चा, संगोष्ठी और सेमिनार भी हों! तभी जाकर बालक और बाल-साहित्य समृद्ध होगा !
       संदर्भ ग्रंथ
1 आजकल: बाल साहित्य - परम्परा और आधुनिकता बोध : विजय शंकर मिश्र ( पृ. क्र. 11)
2. आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास डॉ. बच्चन सिंह ( पृ.क्र.270)
3. मुंशी प्रेम चंद कृत दुर्गा दास उपन्यास की भूमिका से उद्धृत 

जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर ( म0प्र0 )

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