इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

दो रचनाएं

 सपना मांगलिक
सपना मांगलिक

( 1 )
समेट रहा है हर कोई 
दे रहा है तड़ातड़ हाथों की थाप
उसके नाजुक बदन पर
कोई कुल्लड़ बनाना चाहता है 
तो कोई गमला या सुराही 
कोई खिलौने वाला सिपाही 
मगर उसे तो भाता है 
रिमझिम बूंदों संग बहना 
खुली हवा में सांस लेना 
और उसी के संग उड़ना 
उड़ते - उड़ते लपकना कुछ बीज
उन्हीं से सीखना जीने की तमीज
मगर उसे बनाया जा रहा है 
एक बनावटी सामान 
जो बिकेगा एक दिन 
किसी ऊंची सी दुकान 
दिलाएगा पैसा, रुतवा,सम्मान
वो सहम रहा है,टूट रहा है
उसके नैसर्गिक विकास में 
आ रही है अड़चन 
क्योंकि उसका होते हुए भी 
नहीं हो पा रहा है उसका
कच्ची माटी सा बचपन।

( 2 )
कभी ओस तो कभी बन बादल
उड़ता फिरे बिन पंख ही पागल महल बनाये कैसे . कैसे
गिरें जो पल में पत्ते जैसे
दहकाये कभी शक की ज्वाला
कभी पिलाता प्रेम की हाला
कभी  बंधन एकभी यह लगे चन्दन
मन ये मेरा एपागल सा मन।

एफ. 659, कमला नगर ,आगरा 282005
मो.न.09548509508
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