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मंगलवार, 8 नवंबर 2016

खींच जायेगी खाल

ठाकुर दास सिध्‍द

पानी अपनी उम्मीदों पर फिरता आया।
है जन - जन का, मौसम - मौसम मन मुरझाया।।
जो ऊँचे पद पर बैठे हैं, वे नाचें बेताल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना, खिंच जाएगी खाल।।1।।
वहाँ खनकते रहते मदिरा के नित प्याले।
और यहाँ जल की बूँदों के होते लाले।।
उनके सुख की खातिर आते, अपने देश अकाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना, खिंच जाएगी खाल।।2।।
उजले - उजले तन होते पर नीयत खोटी।
होते उनके हाथ, हमारी होती चोटी।।
मुख खोला तो सर पर अपने, नहीं बचेंगे बाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना, खिंच जाएगी खाल।।3।।
धन धनवानों का बढ़ता है, दिन.दिन दूना।
नित निर्धन के सपनों को है, लगता चूना।।
पोर - पोर इनका बिकने को है उनकी टकसाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना, खिंच जाएगी खाल।।4।।
होता उसका जीवन - यापन ख़ूँ पी - पी के।
इधर तिमिर है, उनके घर पर, दीपक घी के।।
हथिया सूरज - चाँद.सितारे, शैताँ है खुशहाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना, खिंच जाएगी खाल।।5।।
इठला - इठला कर चलते हैं, झूठ हठीले।
निज को पर्वत समझ रहे हैं बौने टीले।।
अपने मन में ऊँचाई के भ्रम को रखते पाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना, खिंच जाएगी खाल।।6।।
कोई ना हो रोक - टोक कर पाने वाला।
उनका मन है होवे हर इक मुख पर ताला।।
तुरत दबा देते वे अपने उठते हुए सवाल ।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।7।।
क्या बतलाएँ अभी पड़ेगा क्या - क्या खोना।
अब जाने क्या हाल गुलिस्ताँ का है होना ।।
फौज उलूकों की है बैठी आ के इक - इक डाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।8।।
आए अंधों की महफिल में पुजते काने ।
कहाँ शिकायत लिखवाएँ जब उनके थाने।।
उनके आघातों पर हँसना होना हमें निहाल ।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।9।।
उनकी रग - रग में ख़ूँ के संग हिंसा दौड़े ।
ये निर्बल हैं वो बलशाली हाथ हथौड़े ।।
जो जयकार न की उसकी तो देगा फोड़ कपाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।10।।
झूठों का दरवार लगा बस झूठे जाते ।
दूर - दूर से देखो उनको शोर मचाते ।।
भूले से हम जो जा पहुँचे देंगे हमें निकाल ।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।11।।
भेद भरे ही होते आए हैं बँटवारे।
अपने हक को वे खाते हैं ले चटकारे।।
भरी - भरी हैं देहें उनकी अपने तन कंकाल ।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।12।।
मतलब साधे वह आश्वासन देकर झूठा।
दिखला देता है हमको वह फिर अंगूठा।।
मतलब होगा तो आश्वासन देगा पुन: उछाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।13।।
कुछ मत कह वह चाहे जितना पीटे - मारे ।
मुख खोला तो उगले उसका मुख अंगारे ।।
आँसू की इक बूँद न टपके चाहे हो बेहाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।14।।
सभी बिके हैं कौन करेगा उस पर शंका।
सच सुबके है झूठे का ही बजता  डंका।।
मौन खड़ा है सिहर गया सच, झूठा है वाचाल ।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।15।।
काम रहे तक नित - नित उसका आना - जाना।
काम नहीं तो काम रहा है आँख  चुराना।।
व्यर्थ गया हर बार हमारे उर में उठा उबाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।16।।
अपनेपन का लगा मुखौटा घर पर आता।
घुसकर घर में फिर जी भर वह लूट मचाता।।
जो चुपचाप नहीं लुटता है उससे उसे मलाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।17।।
कड़वापन है नख.शिख लेकिन मीठी वाणी।
नहीं कहीं है और अजूबा ऐसा  प्राणी।।
हिय होता ना होने जैसा होता पेट विशाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।18।।
लगी हाट ही दिखती चहुँदिश जिधर निहारो।
वे धन खनका कर कहते हैं मोल  उचारो।।
होता इन्सानों का सौदा पाते माल दलाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।19।।
कदम - कदम पर छल के बल वे हम से जीते।
लपक लिए हैं उनने जग के सभी सुभीते।।
अपने मुख पर काली कालिख उनके भाल गुलाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।20।।
आते लेकर नूतन - नूतन  नित.नित घातें।
हर दम उगला करते वे विस्फोटक बातें।।
वे आते तो उनके संग - संग आ जाता भूचाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।21।।
रहते उनके पास लूट के सौ हथकंडे।
देवालय का माल उड़ाते आए पंड़े।।
देखे सदियों ने निज नयनों, उनके कपट कमाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।22।।
वह कहता है लूट हमारी है लाचारी।
नामुमकिन है करे घास से घोड़ा यारी।।
वाह - वाह कहिए जब शैताँ देता गजब मिसाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।23।।
बैठ मचानों पर कुछ कायर वीर कहाते।
था साहस तो उतर धरा पर नीचे आते।।
कितने खतरे साथ हमारे दिशा.- दिशा दोनाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।24।।
बँधे हाथ मुख आजादी का राग अलापें।
अपने श्रम के औजारों पर उनकी छापें।।
जो अपने हाथों में है वो अपनी नहीं कुदाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।25।।
कपट छुपा कर सम्मुख आकर कहते भाई।
हैं युग - युग से करते आए कुटिल कुटाई।।
नयनों में गीलापन लेकर आते हैं घड़ियाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।26।।
वह चाहे उसके हों होटल पाँच.सितारे।
आम आदमी चाहे घुट - घुट दिवस गुजारे।।
मिले पेट को रोटी तो हो ठुमरी और खयाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।27।।
ख़ास.ख़ास का पल पल उत्सव सा है होता।
खाता खुशियों के सागर में नित.नित गोता।।
आम आदमी का इक.इक पल जीवन का जंजाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।28।।
लगी चोर के हाथ हमारे घर की चाबी।
रोक सकेगा कोई कैसे यहाँ खराबी ।।
अपने घर का कोना - कोना लेगा चोर खंगाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।29।।
उनका भारी भार उठाना है लाचारी।
निरख.निरख हलकापन उनका मन है भारी।।
कितना भारी जीवन होगा दिवस लगे जब साल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।30।।
गद्दा तकिया सिफ़र्  विदेशी उनको होना।
हमें शिलाओं पर ही पड़ता आया सोना।।
हमको केवल मुख ढकने को मिलता नहीं रुमाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।31।।
खेल रहा है उनका हर दम  ख़ून - खराबा।
अलग - अलग हैं उनके कारण काशी - काबा।।
उनकी तेगें कंठ हमारे होना हमें हलाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।32।।
क्या कहिएगा हुई व्यवस्था कैसी लूली।
अब लाखों की लूट कहाती है मामूली।।
नई सदी के द्वार खड़ा है कैसा काल कराल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।33।।
आयातित है गाड़ी उसकी सरपट भागे।
बचना! उसको जीवन अपना सस्ता लागे।।
हम जिसको कहते अनहोनी होती होनी टाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।34।।
जिसको अपना समझा उसने गरल परोसा।
अगर करे तो कोई किस पर करे भरोसा।।
तूफाँ के हो गए यार हैं  निज नौका के पाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।35।।
होती हर दम उनके सम्मुख अपनी थाली।
हमको  खाने मिलती केवल उनकी गली।।
पूरे तन में आग लगाती उठी पेट की ज्वाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।36।।
उनके सम्मुख सारे मंतर पड़ते ढीले।
टप - टप टपके जहर ज़ुबाँ से हैं जहरीले।।
डसने को तत्पर हैं चहुँ दिश फन फैलाए व्याल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।37।।
देखो इतरा कर चलते हैं साहब - जादे।
तम का शासन भटकी दुनिया कौन दिशा दे।।
फैशन में आ गया पतन तो लेगा कौन सँभाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।38।।
कौन खरा है कौन यहाँ पर होता खोटा।
जो श्रम करता वह कहलाता आया छोटा।।
बड़ा वही कहलाता जो है होता बड़ा अलाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।39।।
महल दुमहलों की ड्योढी पर बैठे चंदा।
सूरज के भी गले पड़ा  शैताँ का फंदा।।
तम के किरण.किरण पर पहरे रोती फिरे मशाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।। 40।।
लगे दूर से बड़े ज्ञान की चर्चा होती।
रुपया - पैसा हीरा - पन्ना माणिक - मोती।।
चोरी - चुरफंदी की बातें चोरों की चौपाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।। 41।।
हैं पग - पग पर जाल बिछे हम को उलझाने।
मनभावन लगते हैं उनके ताने - बाने।।जो उलझा फिर नहीं निकलता ऐसा मायाजाल।
सितम सहो चुप रहकर वर्ना खिंच जाएगी खाल।।42।।


सिद्धालय 672/ 41 सुभाष नगर, 
दुर्ग - 491001 (छत्तीसगढ़ )
मो.919406375695

शेष आगामी अंक में ....

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