इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

यही शहादत भारत मां के

विवेक चतुर्वेदी

आज फिर अजनबी सायों की ज़रुरत है तुम्हें
वक्त पे अपने परायों की ज़रुरत है तुम्हें
हम तो सू$फी है कहीं रात बिता लेंगे पर,
तुम मुसा$िफर हो सरायों की ज़रुरत है तुम्हें
हि$फाज़त ढंग से करते अगर तुम क्यारियों की
तो ऐसी दुर्दशा होती नहीं फुलवारियों की
हरे पेड़ों को जंगल में भी अब खतरे बहुत है
दरख्तों से पुरानी दुश्मनी है आरियों की
दिल से फूलों की मोहब्बत बिसार आयी है
$िखजाँ को साथ में लेकर बहार आयी है
मेरी बर्बादियों को देखने की हसरत में
शर्म आँखों से ये दुनिया उतार आयी है
दर्द की रोशनी देने लगी एहसास की लौ
जला न दे कहीं पानी के लिए प्यास की लौ
अटूट होता है रिश्ता दीए से बाती का
जन्म लेती है इसी रिश्ते से विश्वास की लौ
हो जाओ बलिदान देश में कुर्बानी इतिहास रचेगी
परिवर्तन की हर मशाल में चिन्गारी से आग लगेगी
तन- मन अर्पित, प्राण समर्पित कर देना मिट्टी की खातिर
यही शहादत भारत माँ के स्वाभिमान की लाज रखेगी

म.नं. 164/10-2,महल्ला बाजार कला,
उझानी (बदायूँ)उ.प्र. 243 639,मोबा.09997833538

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