इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

दो नवगीत

टीकेश्‍वर सिन्‍हा '' गब्‍दीवाला ''

1
देखो आई मेरे गाँव में होली।।
फागुन आते गलियों में,धूल की भीनी महक उठी।
खिल उठा मन मेरा,इच्छा मेरी लहक उठी।
माधव भइया खुश है, भाभी की मीठ बोली।
देखो आई मेरे गाँव में होली।।
देखो उगते सूरज ने,हर चेहरे पे उल्लास।
छाया बसंत राहों पे,नये पन का आभास।
घटौंदे में चर्चे खूब हैं, पनिहारिन की ठिठोली।
देखो मेरे गाँव में आई होली।।
धरती हुई सतरंगी,गगन में उड़े अबीर।
एक रंग में रंगे सब,न गरीब न अमीर।
माँ - बहने बिधुन हैं, नफरत सब ने धोली।
देखो मेरे गाँव में आई होली।।
सेमल पलास हँसते लगे,बिखराये सुंदर लाली।
कोयल की सुरीली तान से,बगिया में है खुशहाली।
बड़ी सुहानी धूप है, मस्त ही हवा डोली।
देखो मेरे गाँव में आई होली।।
ढोल - नगाड़े की धुन,कोई गाता फाग गीत।
गाँव रंगता श्यामवर्ण में,और बृजरानी की प्रीत।
हर गली में धूम है, नन्हें मुन्नों की टोली।
देखो मेरे गाँव में आई होली


2
लो बसंत आ गया।
हर्ष - उमंग छा गया।
मतवाली हवा बहने लगी,
गीत कविता कहने लगी।
तरुवर नव परिधान पा गया,
लो बसंत आ गया।
कलियों ने मुस्कान बिखेरी।
फूलों ने दिलवायी दिलेरी।
मदमस्त भौंरे को भा गया।
लो बसंत आ गया।
धरती में रौनकता छाई।
नील गगन ने ली अंगड़ाई।
सब में प्यार लुटा गया।
लो बसंत आ गया।

शिक्षक, शास. पूर्व माध्य शाला सुरडोंगर
जिला - बालोद (छ.ग.) 491 230, मोबा. : 09753269282

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