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बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं नव छंद विधान - हिन्दी की

डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' 

     हिन्दी गज़लों का इतिहास बहुत पुराना है। जिस तरह आज की उर्दू गज़लों का विकास एक बहर वाली कविता जिसे अरबी में बैत एवं फारसी में शेर कहते हैं के साथ शुरू हुआ था ठीक उसी तरह हिन्दी गज़लों का विकास भी दोहेनुमा कविता से शुरू हुआ था।
     हिन्दी गज़ल के इतिहास में दृष्टि डालें तो पता चलता है कि हिन्दी में गज़ल लिखने की परंपरा बहुत पुरानी है। कविता में अंत्यानुप्रास,तुकांत परंपरा की शुरुआत सन 690 के आसपास सिद्ध सरहपा ने की थी। जिसे आधुनिक कविता का प्रारम्भिक रूप माना जा सकता है। सिद्ध सरहपा द्वारा रचित दोहे शेर,बैत के समान ही थे। उदाहरण के तौर पर जेहि वन पवन न सचरई, रवि ससि नाह प्रवेस। तेहि वट चित्त विश्राम करूँ,सरहे करिय उवेस।। कबीर 1398 - 1318 की निम्नलिखित गज़ल पर सबसे पहले डॉ.गोविंद त्रिगुनायत का ध्यान गया। जिसके आधार पर कबीर को पहला हिन्दी गज़लकार माना गया। हमन हैं इश्क मस्ताना हमन को होशियारी क्या,रहें आज़ाद यों जग में हमन दुनियाँ से यारी क्या कबीरा इश्क का मारा दुई को दूर कर दिल से, जो चलना राह नाजुक है हमन सिर बोझ भारी क्या। हालांकि बाद के कवियों ने भी कबीर की तरह छंदबद्ध कविताओं को समृद्ध किया है। रहीम 1556 - 1627 का दोहा - रूठे सूजन मनाइ, जो रूठे सौ बार। रहिमन फिर फिर पोइए टूटे मुक्ताहार।। एकै साधे सब सधे सब साधे सब जाय। रहिमन मूलहिं सीचिबों फूलें फलै अगाय।। बिहारी 1603 - 1664 ने भी अच्छे दोहे लिखे। सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर। देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर।। जिस तरह हिन्दी दोहों से हिन्दी गज़लों का विकास हुआ ठीक उसी तरह बैत या शेर से उर्दू गज़लों का विकास हुआ है। आरंभिक उर्दू गज़लों के उद्गम की तुलना तुकांत हिन्दी कविताओं, दोहो से की जा सकती है। बहुत से समीक्षक भारतेन्दु हरिश्चंद्र 1850 - 1885 को पहली हिन्दी गज़ल लिखने वाला कवि मानते हैं। बानगी के तौर पर उनकी गज़ल का एक शेर - रूखे रौशन पे उनके गेसू - ए - शबगूं लटकते हैं, कयामत है मुसाफिर रास्ता दिन में भटकते हैं। निराला1896 - 1961की गज़लें हिन्दी गज़लों के बहुत करीब दिखाई देती हैं जैसे- जमाने  की रफ़्तार में कैसा तूफाँ मरे जा रहे हैं जिये जा रहे हैं,खुला भेद विजयी कहा हुए जो लहू दूसरों का पिये जा रहे हैं। बहुत कवियों ने बेहतरीन हिन्दी गजलें लिखीं हैं एवं आज भी लिख रहे हैं। शमशेर बहादुर सिंग,सूर्यभानु गुप्त,कृष्णा बक्शी,चंद्रसेन विराट,रघुवीर सहाय,जानकी वल्लभ शास्त्री,भवानी प्रसाद मिश्र, नरेंद्र वसिष्ट,गोपालदास नीरज,चन्द्रभान भरद्वाज,अदम गोंडवी, डॉ.दरवेश भारतीय, डॉ.गिरिराज शरण अग्रवाल, मुकीम भारती,राज मालिकपुरी, अब्दुल सलाम कौसर, जहीर कुरैशी, विज्ञान व्रत, हरीश निगम, ज्ञान प्रकाश विवेक, इसाक अश्क, देवी नागरानी, डॉ. माणिक विश्वकर्मा,नवरंग,गुलाब खंडेलवाल,विजय राठौर, महेश अग्रवाल, रमेश मेहता, आलोक श्रीवास्तव,मनोज आजिज़ राजकुमारी रश्मि,नवाब देवबंदी, अशोक अंजुम, माधव कौशिक,हंसराज रहबर,सुशील साहिल एवं बड़ी संख्या में हिन्दी साहित्य से जुड़े कवि सम्मिलित हैं जिनकी रचना धर्मिता से हिन्दी गज़ल संसार समृद्ध हुआ है और निरंतर हो रहा है। वैसे तो हिन्दी गज़लें बरसों पहले से लिखीं जा रहीं हैं लेकिन हिन्दी काव्य संसार में साये में धूप के माध्यम से इसे स्थापित करने का श्रेय स्वर्गीय दुष्यंत कुमार को दिया जाता है। उनकी हिन्दी गज़लों को जो लोकप्रियता हासिल हुई उससे साहित्य जगत में हिन्दी गज़लों की सशक्त उपस्थिति दर्ज हुई। इसका परिणाम यह भी हुआ कि उर्दू लिखने वालों ने इसका जमकर विरोध किया। उर्दू व्याकरण शास्त्र का हवाला देते हुये दुष्यंत की हिन्दी गज़लों को खारिज कर दिया गया। हिन्दी गज़लों के विरुद्ध तब से चला ये अभियान आज भी जारी है। इसका मुख्य कारण है हिन्दी गज़ल लिखने के लिए छंद विधान का न होना। हिन्दी गज़लों की व्याख्या समय समय पर हिन्दी गज़लकारों द्वारा इसे अलग - अलग नाम देकर की जाती रही है। गीतिका,मुक्तिका,नविता,हिंदकी एवं सजल आदि। दुष्यंत जी ने स्वयं इसे नई कविता की एक विधा माना था। कुछ लोगों ने इसके गीत एवं नवगीत के करीब होने की बात कही थी। हिन्दी एवं विभिन्न भाषाओ में लिखी जा रहीं गज़लों का अवलोकन करने के पश्चात मैंने हिन्दी गज़ल लेखन के लिए नए छंग की रचना करके उसे हिंदकी नाम दिया है और एक साधारण मानक स्वरूप तैयार किया है। इसके अन्वेषण का मुख्य उद्देश्य भारत की विभिन्न भाषाओं में लिखी जा रही हिन्दी गजलों, हिंदकी को मान्यता दिलाना, बढ़ावा देना एवं हिंदुस्तान में उर्दू गज़लों से अलग नई पहचान दिलाना है। छंदों की उत्पत्ति वेदों से हुई है अरबी,फारसी एवं उर्दू भाषाएँ बहुत बाद की भाषाएँ हैं। हिंदकी छंद आयातित छंदों जैसे रुबाई,ग़ज़ल,मुक्त छंद,नवगीत,प्रयोगवदी कविता एवं हाइकू से भिन्न पूरी तरह हिंदुस्तानी अर्थात भारतीय छंद है।
      हिंदकी छंद- हिंदकी हिन्दी ग़ज़ल, मात्रिक छंद की वह विधा है जिसमें चार से अधिक पद होते हैं। प्रथम युग्म सानुप्रास होता,तुकांत है एवं शेष युग्म के दूसरे पद चरण या पंक्तिद्ध का तुक पहले युग्म के दोनों पदों के तुक से मिलता है। युग्मों की न्यूनतम संख्या तीन एवं अधिकतम संख्या सुविधानुसार कितनी भी बढ़ाई जा सकती है। कवि यदि चाहे तो अंतिम पद में अपने नाम का प्रयोग कर सकता है लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है। हिंदकी मात्रिक छंद को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। सम मात्रिक छंद एवं विषम मात्रिक छंद।
     सम मात्रिक हिंदकी छंद, युक्तिका। इसकी संरचना निश्चित मात्रा भार पर आधारित होती है इसमे सभी पद 8 से 40 मात्राओं में निबद्ध हो सकते हैं । सामान्यत: 12 से 36 मात्रिक हिंदकी छंद प्रभावशाली लिखने में आसान होते हैं। ये छंद स्वभाव में गीत एवं नवगीत के करीब होते हैं। इसमे तुकांत के पश्चात पदांत हो भी सकता है और नहीं भी। उदाहरण:
गाँव छोड़ा नहीं करते शहर के डर से,
नांव छोड़ा नहीं करते लहर के डर से?
जड़ों को सींचते रहना फलों की ख़ातिर,
छाँव छोड़ा नहीं करते कहर के डर से?
                ...
पथ पे गिरने लगे नज़र वाले,
आज उड़ते हैं बिना पर वाले?
थक गए हैं सभी को समझा के,
नहीं सुधरेंगे ये शहर वाले?
उपरोक्त पदों में शहर,लहर, कहर, तुकांत एवं डर से पदांत हैं।
     विषम मात्रिक हिंदकी छंद मुक्तिका इसकी संरचना निश्चित मात्रा भार पर आधारित नहीं होती। इसमें सभी पदों की मात्राएं विषम होती है। आंशिक अंतर होता है। विषम मात्रिक छंदों मे शब्दों का संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी है कि मात्रा का अंतर दो या तीन से अधिक न हो। ये छंद स्वभाव में नई कविता के करीब होते हैं लेकिन अंतर केवल इतना होता है कि इन्हें सम मात्रिक हिंदकी छंद की तरह आसानी से गाया जा सकता है। इसमे भी तुकांत के पश्चात पदांत हो भी सकता है और नहीं भी।
उदाहरण :
हाल मौसम का बरसात बता देती है,
रिश्तों की आयु मुला$कात बता देती है?
मिलने जुलने का सलीका भी जरूरी है,
जुबां पलभर में औकात बता देती है?
               ....
इन पुराने खण्डहरों में क्या धारा है,
वो नहीं बिकता यहाँ पर, जो खरा है?
उर्वरा ये भूमि है सुनते थे लेकिन,
अंकुरित जो भी हुआ है, वो मारा है?
           ....
     उक्तिका यदि विषम मात्रा भार का अंतर तीन से अधिक हो, युग्मों के तुक भी न मिलते हों तो इसे उक्तिका की श्रेणी मे रखा जाएगा।
     मात्रा गणना- हिंदकी छंद की मात्रा गणना हिन्दी छंद शास्त्रानुसार के अनुसार होनी चाहिए ।
अंत्यानुप्रास या तुक - हिंदकी छंद में हिन्दी में प्रचलित विभिन्न प्रकार के तुकों को अलग अलग या एक रचना में संयुक्त रूप से प्रयोग किया जा सकता है। शर्त ये है कि आखिरी के दो अक्षर का तुक जरूर मिलना चाहिए। जैसे - मुलाक़ात ,बरसात ,औकात ,शुरुआत ,बिसात , सौगात ,हयात ,बात ,घात ,रात ,साथ ,कायनात ,हिला ,खिला ,मिला ,काफिला ,सिलसिला , दूर ,नूर  ,हूर दस्तूर आदि।
     हिंदकी छंद की विशेषता- भाषा सरल,सहज एवं सुबोध। प्रतीक,बिम्ब एवं मुहावरों का सटीक प्रयोग। भाषिक अभिव्यक्ति का सौष्ठव, अभिव्यक्ति की कलात्मकता, विषय वस्तु की मौलिक गरिमा, मानव जीवन से जुड़ी समस्याओं की अधिकता,मार्मिकता का जीवन के संस्कारों एवं संस्कृति से गहरा एवं गंभीर सरोकार होना चाहिए। आम बोलचाल की भाषा में प्रयुक्त होने वाले किसी भी भाषा का प्रयोग किया जा सकता है। हिंदकी के प्रत्येक युग्म के भाव एक भी हो सकते हैं और अलग अलग भी। छंद में निहित गति,लय एवं प्रवाह के कारण गीत की तरह गेय अर्थात गाने योग्य है। इस छंद में लिखी रचना को शीर्षक दिया जा सकता है।
     विभिन्न भाषाओं में लिखी जा रहीं गज़लों को पहचान देने के लिए हिंदकी छंद का प्रयोग जरूरी है अन्यथा अलग अलग नाम जैसे-गीतिका,मुक्तिका,नविता आदि देने के बावजूद हिन्दी गज़लें उर्दू छंदशास्त्र के आधार पर ख़ारिज होती रहेंगी।
संदर्भ
1. हिन्दी साहित्य का इतिहास:श्याम चन्द्र कपूर
2. हिन्दी  गज़ल की परंपरा: डॉ.जानकी प्रसाद शर्मा
3. हिन्दी  गज़ल का स्वरूप :डॉ.महावीर सिंह
पता
क्वार्टर नंबर ए.एस.14,पावरसिटी,जमनीपाली,
अयोध्यापुरी, 
पोस्ट -जमनीपाली, जिला-कोरबा (छ.ग.)495450
मोब:09424141875, ई मेल: vskm_manik@rediffmail.com

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