इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

अनोखी तरकीब

पराग ज्ञानदेव चौधरी

      बहुत पुरानी बात है। एक अमीर व्यापारी के यहाँ चोरी हो गयी। बहुत तलाश करने के बावजूद सामान न मिला और न ही चोर का पता चला। तब अमीर व्यापारी शहर के काजी के पास पहुँचा और चोरी के बारे में बताया।
     सब कुछ सुनने के बाद काजी ने व्यापारी के सारे नौकरों और मित्रों को बुलाया। जब सब सामने पहुँच गए तो काजी ने सब को एक - एक छड़ी दी। सभी छड़ियाँ बराबर थीं। न कोई छोटी न बड़ी।
सब को छड़ी देने के बाद काजी बोला - इन छड़ियों को आप सब अपने - अपने घर ले जाएँ और कल सुबह वापस ले आएँ। इन सभी छड़ियों की खासियत यह है कि यह चोर के पास जा कर ये एक उँगली के बराबर अपने आप बढ़ जाती हैं। जो चोर नहीं होता, उसकी छड़ी ऐसी की ऐसी रहती है। न बढ़ती है, न घटती है। इस तरह मैं चोर और बेगुनाह की पहचान कर लेता हूँ।
     काजी की बात सुन कर सभी अपनी अपनी छड़ी ले कर अपने - अपने घर चल दिए।
उन्हीं में व्यापारी के यहाँ चोरी करने वाला चोर भी था। जब वह अपने घर पहुँचा तो उसने सोचा - अगर कल सुबह काजी के सामने मेरी छड़ी एक उँगली बड़ी निकली तो वह मुझे तुरंत पकड़ लेंगे। फिर न जाने वह सबके सामने कैसी सजा दें। इसलिए क्यों न इस विचित्र छड़ी को एक उँगली काट दिया जाए। ताकि काजी को कुछ भी पता नहीं चले।
     चोर यह सोच बहुत खुश हुआ और फिर उसने तुरंत छड़ी को एक उँगली के बराबर काट दिया। फिर उसे घिस - घिस कर ऐसा कर दिया कि पता ही न चले कि वह काटी गई है।
      अपनी इस चालाकी पर चोर बहुत खुश था और खुशी - खुशी चादर तान कर सो गया। सुबह चोर अपनी छड़ी ले कर खुशी - खुशी काजी के यहाँ पहुँचा। वहाँ पहले से काफी लोग जमा थे।
काजी एक एक कर छड़ी देखने लगे। जब चोर की छड़ी देखी तो वह एक उँगली छोटी पाई गई। उसने तुरंत चोर को पकड़ लिया। और फिर उससे व्यापारी का सारा माल निकलवा लिया। चोर को जेल में डाल दिया गया।
सभी काजी की इस अनोखी तरकीब की प्रशंसा कर रहे थे।

मेंढक और गिलहरी 
 
      एक था मेंढक और एक थी गिलहरी। एक दिन दोनों में दोस्ती हो गई। राज दोनों साथ - साथ खेलते और मौज मनाते। खेलते - खेलते एक दिन मेंढक ने कहा - गिलहरी बाई! मुझे तो अब ब्याह करना है।
     गिलहरी बोली - बड़ी अच्छी बात है। इसमें देर क्यों हो? चलो, मैं तुम्हारा ब्याह अभी करा देती हूं। यह काम तो झटपट हो सकेगा। तुम चाहोगे तो मैं तुम्हारा ब्याह किसी राजकुमारी से करवा दूंगी।
मेंढक बोला - तो फिर चलो।
     गिलहरी और मेंढक दोनों चल पड़े। चलते - चलते रास्तें में ताड़ का एक पेड़ मिला। गिलहरी की इच्छा हुई कि वह इस पेड़ पर चढ़ जाय। उसने कहा - मेंढक भैया, तुम कुछ देर यहीं खड़े रहो। मैं जरा इस पेड़े पर चढ़ लूं।
मेंढक बोला - अपने साथ मुझे भी पेड़ पर ले चलो।
     गिलहरी ने कहा - आओ, मेरी पीठ पर बैठ जाओ। तुम मुझे अच्छी तरह पकड़े रहना।
गिलहरी ने मेंढक को एक पत्ते पर बैठा दिया। कुछ देर बाद गिलहरी एक ही सपाटे में पेड़ से नीचे उतर गई और मेंढक आंखें फाड़े पेड़ पर बैठा रहा। मेंढक मन - ही - मन बोला -गिलहरी से दोस्ती की,ताड़ पर डेरा डाला। ब्याह तो एक ओर,पेड़ से नीचे उतरना भी भारी पड़ गया!
     गिलहरी आगे बढ़ गई। मेंढक उतावली में ताड़ पर से कूदा और उसके प्राण निकल गये।

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