इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

चउमासा बर दोहा

जीवन यदु

धरती रानी करे हवय, का निरजला उपास।
पूछे बर चउमास ला, भेजे हवय अगास।

पहली बूँद अगास ले, जे दिन गिरिस मितान।
छींचत हे तइसे लगिस, बादर बिजहा धान।

बादर पहली बेर जब, गरजिस जग - झगझोर
कोतवाल पारत हवय, हाँका जइसे खोर।

खुडुवा कस खेलय कभू, दउड़े पल्ला - मार।
पढ़वैया लइका सहीं, बादर के ब्योहार।

बिजुरी चमके रात मा, झक ले लगे अंजोर।
कोंटा में अंधियार तब, सपटे जइसे चोर।

चाहे घर - परछी चुहय, रेला धर ले धार।
तभो बरस बादर बबा, पानी प्रान - अधार।

बाँवत बर पानी गिरय, बाँवत माते खेत।
जेवन धर खटला खड़े, खाये के नइ चेत।

बड़ दानी बादर बबा, मन - भर देवय दान।
तरिया - नदिया दान मा, होवत हें भगवान।

सतरंगिया कमठा धरे, इन्दर खड़े अगास।
धरती बोलय- '' छोड़ सब, झटकुन खेत अपास ''
 गीतिका
दाउचौंरा, खैरागढ़
जिला - राजनांदगांव ( छत्‍तीसगढ़ )

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