इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

सुशील यादव के दू ठन छत्‍तीसगढ़ी गीत

नवा साल

साल - नवा उतरे मुड़ी बइठे हवस सियान
कांदी - बदरा तैं लुअस बइहा ले गे धान

भुलका पइसा भूलते, भूले सभी छेदाम
दु हजारी के सामने, चिल्हर के का काम

राचर ब्यारा ज्ञान के, लगाय रखव मितान
तुंहर भरोसा जागही, हमर देश के शान

खोच बीड़ी अधजरहा, किंजरय मगन किसान
राजनीती के नाम जी, लीलत बइठे प्रान

चपकन्हा ताला सही, चपकेन जुन्ना साल
नोट सिताय अबड़ करिस,हमर हाल -बेहाल

2.नवा साल

नवा साल के का करन, नवा - नवा पिचकाट
तुंहर पलँग नींद बर ,खर्रा हमरे खाट
मंदिर धजा उतार के, पहिरे हव लँगोट
प्रभू नाम तो जापते, मन में कतको खोट
सत्तर बरस ओढ़ -पहिर, चिथरागे जी कोट
उज्जर असन धरे - बने, करियागे सब नोट
चाउर ओइरे बर मिलय, पसाय मिलतिस भात
अंधन चढ़ा अगोरबो, कुल उबरइया सात
नोट बन्दी नियम चलत, लाइस चार हजार
दू दारु के भेट चढ़िस, दुसर गे जुआ हार
अंधन दे भूलत हवय, ओइरत नहीं दार
ए कंगलई का पुछन, हवे कती सरकार
नवा साल के का करन, नवा - नवा पिचकाट
तुंहर पलँग नींद बर, खर्रा हमरे खाट
बात जउन काली रिहिस, नइये वइसन बात
सिताय असन सोच ला,भुर्री कस सिपचात
भारी पलँग नींद जी , दुरिहा दू - दू कोस
बघारव शान ओतके, जतका मा सन्तोष

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