इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

फरेबों और फसानों को

महेश कटारे  '' सुगम '' 

फरेबों और फसानों को हक़ीकत मान बैठे हैं
हम अपने कै़दखानों को जन्नत मान बैठे हैं
ज़माना कर रहा है आज जिनके नाम से नफ़रत
हम उनकी सोहबतों को अपनी इज्ज़त मान बैठे हैं
हमे मालूम है सच बोलना जिनकी नहीं आदत
उन्हीं की झूठी बातों को जमानत मान बैठे हैं
मेरे ह$क बात कहने से उन्हें तक़लीफ होती है
सुगम के दर्द को भी वो शिकायत मान बैठे हैं

पलेटियर का तालाब,चन्द्रशेखर वार्ड, बीना (म.प्र.) 

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