इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

वफा को तू

खुशीद अनवर '' खुशीद ''

वफा को तू समझता था अमल में लाई भी होती
अगर अकबर तू होता तो वह जोधा बाई भी होती
तरफदारी तो उर्दू की बहुत करते हो महफिल में
मगर नूर-ए-नज़र को यह कभी सिखलाई भी होती
लगा कर आग बस्ती में तमाशा देखने वालों
किसी मुफलिस के चूल्हे में कभी सुलगाई भी होती
हसद जिस से तू करता है उसी इन्सां के रस्ते पर
चला होता तो यह दुनिया तिरी शेदाई भी होती
कभी तन्हाई में रोकर उसे भी याद कर लेता
तो फिर दरबार में उसके तिरी सुनवाई भी होती

120/3, बेगम कॉलोनी, 
अन्सारी गली, उज्जैन (म.प्र.)

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