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इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता

मनोज मोक्षेन्‍द्र 

     अधुनातन परिप्रेक्ष्य में व्यंग्य एक अत्यंत जनप्रिय विधा है। यह भी सर्वस्वीकार्य होता जा रहा है कि यह प्रधानतया गद्यात्मक विधा है। काव्य में व्यंग्य - प्रयोग संक्षिप्त और विरल होता है क्योंकि कवि व्यंग्यात्मकता का प्रयोग काव्यांगों के सौष्ठवीकरण के रूप में करता है। इस तरह जब हम किसी अन्य गद्यात्मक और पद्यात्मक विधाओं में विरलता से कोई कटाक्ष या व्यंग्य का संपुट पाते हैं तो ऐसा प्रयोग निर्विवाद रूप से एक शैली है जिसके जरिए व्यंजना शक्ति उत्पन्न की जाती है। इसे किसी निबंध या कहानी या कविता में व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग ही कहा जाता है। व्यंग्येतर विधाओं में व्यंजना शक्ति उत्पन्न करने के लिए किसी व्यक्ति, समुदाय, स्थिति या व्यवस्था पर व्यंग्य के माध्यम से चलते - चलते सुधारात्मक कटाक्ष किए जाने की परंपरा किसी रचनाकार के लिए नई नहीं है। हिंदी साहित्य के आदि काल, भक्ति काल तथा रीति काल से लेकर आज तक की रचनाओं में व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग वक्रोक्ति के रूप में किया जाता रहा है। रचनाकार में व्यंग्यात्मक कटाक्ष करने की प्रवृत्ति स्वाभाविक है जिससे रचनाकार कथ्य को प्रभावशाली और रुचिकर बना पाता है। कटाक्षपूर्ण व्यंग्यात्मक शैली वक्रोक्ति का उपांग है। वक्रोक्ति में अन्य प्रकार के सौष्ठवीकरण प्रयत्नलाघव के साथ - साथ व्यंग्यात्मक शैली में कथ्य का वजनदार संप्रेषण करना एक आवश्यक लेखकीय योग्यता है।
     वस्तुत: यह आवश्यक नहीं है कि किसी भी विधा में कटाक्षपूर्ण व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग हो ही, यह लेखक के स्वभाव और व्यक्तित्व पर भी निर्भर करता है। कतिपय लेखक स्वभावानुकूल कटाक्षपूर्ण चुटकियाँ लेने के आदी होते हैं जबकि अधिकतर गंभीर व्यक्तित्व वाले रचनाकार व्यंग्यात्मक कटाक्ष से उतना ही परहेज़ करते हैं जितना कि मधुमेह रोगी शर्करा से करता है। इसके अतिरिक्त किसी विधा में कटाक्षपूर्ण व्यंग्यात्मक उल्लेख छिटपुट ही दृष्टिगोचर होता है। प्रेमचन्द्र के कथा - साहित्य में छिटपुट व्यंग्यपूर्ण कटाक्ष विरलता से उपलब्ध हैं क्योंकि वे मनोविनोदी स्वभाव के थे और सामाजिक विद्रूपताओं की जमकर खबर लेते थे। कटाक्षपूर्ण चुटकियों के जरिए पाठक को सामाजिक विसंगतियों के प्रति विद्रोही बनाने के लिए उकसाने की चेष्टा करते थे। इस प्रकार यत्र - तत्र उनकी व्यंग्यात्मक चेष्टाएं उनके कथा - साहित्य को जीवंत और अभिरुचिपूर्ण बनाती हैं। पर  इससे उन्हें मूल रूप से एक व्यंग्यकार की कोटि में नहीं रखा जा सकता। इसी प्रकार कबीर की साखियों और भारतेंदु के नाटकों में भी व्यंग्य - तत्व विरलता से उपलब्ध हैं। कविवर बिहारी के दोहों में व्यंग्यात्मकता शृंगार - रस - प्रभाव को तीक्ष्ण बनाती है। किंतु विरल तथा प्रकीर्ण रूप से कटाक्षकर्ता,रचनाकार को व्यंग्यकार नहीं कहा जा सकता।
     मेरा यह प्रतिपाद्य निर्णय है कि जिस आलेख या कथात्मक निबंध में व्यंग्यात्मक कटाक्ष की छिटपुटता या प्रकीर्णता न होकर, व्यंग्य और कटाक्ष की अविरल सर्वत्रता हो, उसे निर्विवाद रूप से व्यंग्य माना जाए। इसके अलावा व्यंग्यकार के रूप में स्थापित लेखक की किसी भी रचना को व्यंग्य नहीं कहा जा सकता। जब तक कि उसमें सांगोपांग व्यंग्यपूर्ण विवेचन न हो। अर्थात उसके शीर्षक से ही स्पष्टतया निरूपित हो जाना चाहिए कि वह व्यंग्य - रचना है या नहीं। यदि शीर्षक में ही व्यंग्य का पुट न हो तो रचना में क्या होगा? समीक्षक - आलोचक के सोच की त्रासदी यह है कि वह व्यंग्यकार की किसी भी धीर - गंभीर कहानी या ललित निबंध को भी व्यंग्य के मानदंडों पर तौलने लगता है।
     अरे भाई, एक व्यंग्यकार एक अच्छी रोमांटिक कविता भी लिख सकता है किसी महत्वपूर्ण सामाजिक विषय पर विचारोत्तेजक कहानी भी लिख सकता है। यह भी उल्लेखनीय है कि व्यंग्य की भाषा ही अलग होती है जिसे व्यंग्यकार सतत अभ्यास के अतिरिक्त जन्मजात हासिल करता है। व्यंग्यालेख का आरंभ ही घोषित कर देता है कि वह पूर्ण रूप से व्यंग्य है। यह व्यंग्यात्मक भाषा ही है कि जैसे - जैसे पाठक व्यंग्यालेख के प्रवेशद्वार से होकर उसके अंतरंग में दाखिल होता है, उसे यकीन होता जाता है कि वह प्रचुरता और परिपूर्णता में व्यंग्यात्मकता का आस्वादन कर रहा है। उसमें सम्मिलित कथा पात्रों का चरित्रांकन, देशकाल, स्थितियों का विवरण, लेखक का उद्देश्य पात्रों का वार्तालाप तथा कथोपकथन एवं लेखक का ख़ुद का निरूपण सभी यह प्रतिपादित करते हैं कि वह एक आदर्श व्यंग्य - रचना है। ऐसी रचना के उपसंहार की परिणति भी अत्यंत व्यंग्यपूर्ण ढंग से होनी चाहिए ताकि सतत व्यंग्यपूर्ण विवरणों से उद्भूत पाठकीय तनाव पिघलकर उसके आनन्दातिरेक में परिणत हो जाए। इस आनन्द का अनुभव पाठक को तब होता है जबकि व्यंग्यकार के विष बुझे व्यंग्य - बाण बुराइयों का चुन - चुन कर शिरोच्छेदन करते हैं तथा पाठक को आश्वस्त करते हैं कि लो हो गया बुराइयों का मूलोच्छेदन।
     पाठक को आनन्द - गंगा में अघाकर स्नान कराना ही व्यंग्यकार का उद्देश्य होता है। समाज के बुरे तत्वों, भ्रष्ट व्यवस्थाओं और हानिकर सामाजिक तंत्रों को व्यंग्यास्त्रों के बारम्बार प्रहार से धराशायी करके पाठक को यह अहसास दिलाते हुए कि अब समाज में जो कुछ है, वह सर्वजनहिताय और सकारात्मक है। उसके लिए सुखात्मक और आनन्ददायक मन:स्थिति पैदा की जाती है। एक सफल व्यंग्य - रचना सामाजिक विसंगतियों और दुरावस्थाओं का समूल प्रच्छालन करते हुए अंततोगत्वा लोकोन्मुख और लोकोपयोगी वातावरण स्थापित करने का दमखम भरती है। जहाँ अन्य विधाएं व्यक्ति, समाज और व्यवस्था का सिर्फ  विवरण प्रस्तुत करती हैं, व्यंग्य - विधा सामाजिक व्यवस्था में व्याप्त नकारात्मक प्रवृत्तियों और तत्वों पर प्रत्यक्षत: वार करती है और समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। इस प्रकार अन्य विधाओं के लेखकों की तुलना में व्यंग्यकार के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारियाँ होती हैं।
     व्यंग्यात्मकता की अविरल सर्वत्रता एक रचना को पूर्ण व्यंग्यालेख का दर्जा प्रदान करती है। व्यंग्यात्मकता की अविरल सर्वत्रता से आशय यह है कि व्यंग्यालेख में ऐसी स्थितियाँ वर्णित हों जिन पर लेखक का हर पल आमूल - चूल व्यंग्यपूर्ण कटाक्ष करना अत्यावश्यक हो जाता हो तथा यह कटाक्ष तब तक चलता रहे जब तक कि पाठक को भ्रष्ट स्थितियों के मरणासन्न होने का सुखद अनुभव न हो जाए। व्यंग्यात्मकता की सर्वत्रता का अहसास तभी होगा जबकि पात्रों का प्रस्तुतीकरण भी व्यंग्यात्मक शैली में हो। हाँ, उनका नामकरण भी व्यंग्यात्मक हो।
      शब्दावलियों में भी व्यंग्य की छटा हो और ऐसा तभी संभव है जबकि तत्सम शब्दावलियों तथा पांडित्य प्रदर्शन करने वाले क्लिष्ट प्रयोगों के बजाए लोक शब्दावलियों और बहुप्रचलित शब्दों एवं उक्तियों का प्रयोग किया जाए ताकि व्यंग्य की भाषा लोकरंजक हो सके। दरअसल व्यंग्य एक लोकतांत्रिक विधा है। इसलिए व्यंग्य के कटाक्ष की भाषा आम आदमी की भाषा हो क्योंकि साहित्य की यही एक ऐसी विधा है जिसे आम आदमी का साहित्य कहा जा सकता है जिसे वह तसल्ली और शिद्दत से पढ़ना चाहता है।
      एक सार्थक और सफल व्यंग्य - रचना में उन शब्दावलियों का प्रयोग प्रचुरता से हो जिनका प्रयोग आम आदमी चलते - फिरते चुटकियाँ लेने के लिए करता है। लोकोक्तियाँ और लोक शब्दावलियाँ व्यंग्य के पाठकों के लिए अक्षुण्ण आनन्द का सबब बनती हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया की सर्वव्याप्तता के चलते लोक शब्दावलियाँ ज़्यादातर हर वर्ग और हर संप्रदाय के पाठकों के लिए सहज ग्राह्य बन चुकी हैं। लोक शब्दावलियाँ जबान पर सहज ही चढ़ जाती हैं। यहाँ तक कि ग्रामीणों और आदिवासियों में प्रचलित अनेकानेक शब्दावलियाँ भी जन - जन में रच बस गई हैं। वे हमारे बोलचाल में इतनी घुलमिल गई हैं कि हम उन्हें हिंदीतर मानने के बारे में कभी सोच भी नहीं सकते हैं। ये शब्दावलियां शुद्ध मनोभाव प्रस्फुटित करती हैं और जब ये व्यंग्यालेख में हास - परिहास के लिए सजती हैं तो लेखक का भाव - विचार स्पष्टतया मुखर हो जाता है।
     उनमें एक प्रकार से कवित्त रस पैदा करने की क्षमता होती है। इस प्रकार व्यंग्य - कटाक्ष हेतु हिंदी व्यंग्य में प्रचलित संथाली, सिंधी, नेपाली, बोड़ो, डोंगरी, भोजपुरी, मैथिल, पहाड़ी आदि के देशज शब्दों का प्रयोग शुद्ध रूप से व्यंग्यात्मक प्रभाव उत्सर्जित करता है। इतना ही नहीं, आम बोलचाल में प्रयुक्त उर्दू, अरबी, $फारसी और अंग्रेजी की शब्दावलियों का प्रयोग भी व्यंग्यास्त्र की तीक्ष्णता को धारदार बनाता है। लोक - लुभावनी बोलियों और लोकभाषाओं से गृहीत शब्दावलियाँ तथा इनकी सादगी व्यंग्य - रचना को प्रखर और चमकदार बनाती हैं।
जब से व्यंग्य को हास्य से जोड़ा गया है, यह आम आदमी का साहित्य बन गया है। व्यंग्य का कद, इसका दायरा और इसके पाठकों की संख्या में निरंतर बर$कत हो रही है। नए - नए लेखकों द्वारा व्यंग्य - लेखन का चस्का भी बढ़ता जा रहा है। यह बात अलग है कि उनमें से ज़्यादातर लेखक व्यंग्य - लेखन का दामन छोड़कर कहीं और चले जाते हैं। लेकिन जो लेखक व्यंग्य - लेखन में संजीदगी के साथ दत्तचित्त बने रहते हैं, उनकी लेखनी से सतत सार्थक व्यंग्य - रचनाएं उत्पादित हो रही हैं। जरूरत है .. उन्हें प्रोत्साहित और दिशा - निर्देशित करने की तथा खाद - पानी देकर उनकी उर्वरता बढ़ाने की, न कि उन्हें हतोत्साहित करने की। वरिष्ठ व्यंग्यकारों की ओर से एक बात आपत्तिजनक लगती है कि वे नवोदितों को परंपरा से जुड़े रहने तथा दिग्गज व्यंग्यकारों की लीक पर ही चलने की सलाह देते हैं और जो नव - लेखक ऐसा नहीं करता, उसे आड़े हाथों लेते हैं।
     उनका मानना है कि बढ़िया व्यंग्य तभी लिखे जाएंगे जबकि पुराने वरिष्ठ लेखकों के अनुशरण में व्यंग्य लिखे जाएं। यदि परंपरा और लीक पर ही चलने की जि़द होती तो आज कथा - साहित्य और काव्य - साहित्य ने विकास के इतने सोपान न देखे होते और वैश्विक मंच पर हिंदी कहानियों तथा कविताओं की तूती न बोल रही होती। नि:संदेह, इस प्रवृत्ति से व्यंग्य - लेखन के सिमटने का भय बन जाता है। अभी हमें यह मानकर चलना चाहिए कि व्यंग्य - लेखन अपनी शैशवावस्था से थोड़ा - सा ही आगे बढ़ पाई है, यद्यपि इसे सजाने - संवारने और दिशा - निर्देशित करने में व्यंग्यकारों की कम - से- कम चार जागरुक पीढ़ियाँ अपना महत्वपूर्ण योगदान कर चुकी हैं। चुनांचे व्यंग्य को साहित्य के राजपथ पर दौड़ लगाने के लिए अभी इसे बहुत चुस्त - दुरुस्त बनाने की आवश्यकता है। काव्य गोष्ठियों और कहानी - पाठ गोष्ठियों की भाँति बड़े स्तर पर व्यंग्य - पाठ गोष्ठियों का आयोजन रोज़मर्रा बनना चाहिए जिसके लिए मेरा दावा है कि श्रोताओं का अकाल कभी नहीं पड़ेगा। ध्यातव्य है कि व्यंग्य - गोष्ठियों की संख्या नगण्य होते हुए भी व्यंग्य के पाठकों की संख्या अन्य साहित्यिक विधाओं के पाठकों की संख्या के मुकाबले उत्साहजनक है। हाँ, अभी व्यंग्य को अनेकानेक विकास - सोपानों से गुजरना है जिसके लिए इसमें भी नव - प्रयोगों की आजमाइश की जानी चाहिए जैसे कि कविता - विधा में की गई है जहाँ इसके उत्साहजनक परिणाम देखने को मिले हैं। मौज़ूदा माहौल में नव - प्रयोग के क्षेत्र में नई पीढ़ी महती योगदान कर सकती है।
     अस्तु, नई पीढ़ी के व्यंग्य - लेखकों को बेशुमार आलोचनाओं और उपेक्षाओं का शिकार होना पड़ रहा है। क्या कोई वरिष्ठ व्यंग्यकार उनकी पीठ पर हौसला - आ$फज़ाई का हाथ रखने आगे आएग? अभी हाल ही में एक आलोचक का लेख पढ़ने में आया है जिसमें उसने नई पीढ़ी के व्यंग्यकारों का उलाहना देते हुए व्यंग्य के भविष्य पर घड़ों आँसू बहाते हुए इस बात को रेखांकित किया है कि वर्तमान समय हिंदी व्यंग्य की अवसान बेला है। चुनांचे, अभी तो व्यंग्य का भविष्य निर्धारित ही हो रहा है और इसके प्रति हमें अभी से निराशावादी दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए। इसके अवसान की इच्छा करना कुछ - कुछ वैसा ही है जैसे कि गर्भस्थ शिशु की भ्रूण - हत्या करने की चेष्टा करना। अभी जिस शिशु को बेहतर ढंग से पालित - पोषित करने के लिए चिंतापूर्ण देखभाल की जरूरत है, उसके लिए यह कामना की जा रही है कि वह यथाशीघ्र काल - कवलित हो जाए। उसका मानना है कि व्यंग्य लगभग दिशाहीन और निस्तेज अवस्था में है। मान लिया जाए कि व्यंग्य दिशाहीन है पर यह बात भी गौर - तलब है कि व्यंग्य - विधा पूरी शिद्दत और मनोयोग से एक निर्दिष्ट गंतव्य की तलाश में भटकने का सुख बटोर रही है। इस सुखानुभूति में उसे थकान का तनिक भी अहसास नहीं हो रहा है।
     दिशाहीनता में भटकने से ही इसके लिए नए मार्ग खुलेंगे तथा ये मार्ग व्यंग्य को साहित्य के वैभवशाली राजमार्ग पर अग्रसर करेंगे। वह शरद जोशी के राजनीतिक भ्रष्टाचार पर लिखे गए व्यंग्यों को इस विधा के लिए इस लिहाज़ से घातक बताता है कि जोशी के बाद से ही सि$र्फ  राजनीतिक व्यंग्य लिखने की परंपरा निकल पड़ी है और व्यंग्यकारों को व्यंग्य - लेखन के लिए राजनीतिक विषय ही मिल रहे हैं। बहरहाल यह सच है कि जब राजनीतिक तंत्र ही सबसे ज़्यादा भ्रष्ट है तो इसी मुद्दे पर तो सर्वाधिक व्यंग्य लिखे जाएंगे। देश की राजनीति सचमुच अत्यंत भ्रष्ट है और सभी मंचों से इसकी गलाफोड़ भर्त्सना की जा रही है। वह अन्य सभी सामाजिक समस्याओं और विसंगतियों की जननी भी है। ऐसे में अगर व्यंग्यकार राजनीति को बारंबार आड़े हाथों लेता है तो इसमें बुराई क्या है? आखिर, मिसालिया तौर पर राजनीतिक गलियारों को साफ - सुथरा बनाकर ही तो एक आदर्श समाज की संकल्पना की जा सकती है।
      लिहाजा मौज़ूदा दौर में राजनीतिक मुद्दों को छोड़कर धार्मिक आडंबरों, जातीय विषमताओं, सांप्रदायिक द्वेषों, सामाजिक उच्चावचों, पूंजीवादी समस्याओं, उपभोक्तावादी प्रवृत्तियों, कमजोर होते नागरिक बोधों, लिंग - आधारित असमानताओं, बालिका भ्रूण - हत्या आदि जैसे विषय भी व्यंग्यकारों के व्यंग्य - परास में शामिल होते जा रहे हैं। हाँ, इन विषयों पर कम व्यंग्य लिखे जा रहे हैं जिसके लिए वरिष्ठों को अत्यंत आत्ममंथन करना होगा और उन्हें व्यंग्यकारों की सेनाएं गठित करनी होगी। व्यंग्य - गोष्ठियों के माध्यम से उन्हें अभिप्रेरित करना होगा कि उन्हें सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध एक निर्णायक लड़ाई लड़नी है। बेशक नई पीढ़ी के व्यंग्यकारों को समाज के अन्य विषयों से कतई परहेज नहीं करना है। समाज के सर्वांगीण सुधार हेतु समाज के हर पक्ष की सुध लेनी है। यह उनकी जिम्मेदारी है।
     बहरहाल, व्यंग्य - विधा दिशा - निर्देशित हो चुकी है। अधिकतर व्यंग्यकारों को अपने कर्तव्य का भली - भाँति बोध है। जब वे कहते हैं कि व्यंग्य दिग्भ्रमित हो रहा है तो इसका आशय स्पष्टतया यह भी है कि वे इस बात से अच्छी तरह अवगत हैं कि उनके द्वारा इसे किस दिशा में अग्रसर किया जाना चाहिए और वे इस काम में दत्तचित्त भी हैं। व्यंग्यकारों का यह आत्मबोध इस विधा के लिए अच्छा शकुन है। अत: वरिष्ठ व्यंग्यकार और व्यंग्य - शुभेच्छु बेवजह दकियानूस नुकताचीनी में संलिप्त न हों। वे नए व्यंग्यकारों को उपयुक्ततया दिशा - निर्देशित करें। वे यह मानकर न चलें कि उन्हें मौज़ूदा व्यंग्यकारों में हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, शरद जोशी, मनोहर श्याम जोशी या रवींद्र नाथ त्यागी ही नजर आने चाहिए। यदि उनकी ऐसी चाह है तो व्यंग्य - विधा विकास के नए और बेहतर सोपान नहीं देख पाएगी। ऐसी मानसिक अवधारणा रखना व्यंग्यकारों की पिछली और वर्तमान पीढ़ियों के बीच जेनरेशन गैप जैसा होगा जो सर्वथा अनुचित है। इससे इस विधा की सतत प्रगति अवरुद्ध होगी।

सी 66, विद्या विहार,  
नई पंचवटी पवन सिनेमा के सामने,
जी टी रोड  गाजियाबाद

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