इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शुक्रवार, 26 मई 2017

पेंशन की तारीख

        बड़ा बेटा रमेश सुबह ही बाबूजी के 20 दिन से टूटे चश्मे की मरम्मत कराने के लिए घर से निकल पड़ा है ।
छोटा बेटा दिनेश महीने भर पहले कराये बाबूजी के खून जांच की रिपोर्ट लाने जा चुका है ।
       बड़ी बहु बाबूजी का मन पसंद गाजर का हलुया बनाने में लगी हुयी है तो छोटी बहु ने कल रात ही बाबूजी का 4 दिन पहले टूटा कुर्ते का बटन लगा दिया था।
        इन सब बदलाव को देख, हैरान बाबूजी ने दोपहर की नींद के बाद, संध्या वंदन किया।
       अपने खून जांच की रिपोर्ट से खुश, बटन लगे कुर्ते को पहन बाबूजी ने गाजर के हलुए का स्वाद लिया।
      जब बाबूजी मरम्मत किया चश्मा लगा बाहर टहलने निकलने लगे, उनकी नज़र दीवार पर झूलते कैलेंडर पर पड़ी।
      काले बड़े अंकों में दिखते तारीख ने याद दिलाया और सहसा मुंह से निकल पड़ा - अरे हाँ! कल तो पेंशन तारीख है।
       दुखी, मुस्कुराते चेहरे के साथ बाबूजी निकल पड़े ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें