इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 26 मई 2017

चार मोमबत्तियां

        रात का समय थाए चारों तरफ  सन्नाटा पसरा हुआ था। नज़दीक ही एक कमरे में चार मोमबत्तियां जल रही थीं।
        एकांत पा करआज वे एक दुसरे से दिल की बात कर रही थीं। पहली मोमबत्ती बोली - मैं शांति हूँ, पर मुझे लगता है अब इस दुनिया को मेरी ज़रुरत नहीं है। हर तरफ आपाधापी और लूट - मार मची हुई है। मैं यहाँ अब और नहीं रह सकती।'' और ऐसा कहते हुए, कुछ देर में वो मोमबत्ती बुझ गयी।
        दूसरी मोमबत्ती बोली - मैं विश्वास हूँ, और मुझे लगता है झूठ और फरेब के बीच मेरी भी यहाँ कोई ज़रुरत नहीं है,  मैं भी यहाँ से जा रही हूँ।'' और दूसरी मोमबत्ती भी बुझ गयी।
        तीसरी मोमबत्ती भी दुखी होते हुए बोली - मैं प्रेम हूँ,  मेरे पास जलते रहने की ताकत है। पर आज हर कोई इतना व्यस्त है कि मेरे लिए किसी के पास वक्त ही नहीं। दूसरों से तो दूर लोग अपनों से भी प्रेम करना भूलते जा रहे हैं। मैं ये सब और नहीं सह सकती मैं भी इस दुनिया से जा रही हूँ।'' और ऐसा कहते हुए तीसरी मोमबत्ती भी बुझ गयी।
        वो अभी बुझी ही थी कि एक मासूम बच्चा उस कमरे में दाखिल हुआ। मोमबत्तियों को बुझे देख वह घबरा गया। उसकी आँखों से आंसू टपकने लगे और वह रुंआसा होते हुए बोला -अरे, तुम मोमबत्तियां जल क्यों नहीं रही। तुम्हे तो अंत तक जलना है! तुम इस तरह बीच में हमें कैसे छोड़ के जा सकती हो ?''
तभी चौथी मोमबत्ती बोली - प्यारे बच्चे घबराओ नहीं, मैं आशा हूँ और जब तक मैं जल रही हूँ, हम बाकी मोमबत्तियों को फिर से जला सकते हैं।''
        यह सुन बच्चे की आँखें चमक उठीं। और उसने आशा के बल पे शांति, विश्वास और प्रेम को फिर से प्रकाशित कर दिया।
        जब सब कुछ बुरा होते दिखे, चारों तरफ अन्धकार ही अन्धकार नज़र आये। अपने भी पराये लगने लगे तो भी उम्मीद मत छोड़िये। आशा मत छोड़िये। क्योंकि इसमें इतनी शक्ति है कि ये हर खोई हुई चीज आपको वापस दिल सकती है।  अपनी आशा की मोमबत्ती को जलाये रखिये। बस अगर ये जलती रहेगी तो आप किसी भी और मोमबत्ती को प्रकाशित कर सकते हैं।

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