इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शुक्रवार, 26 मई 2017

मेरा गांव

सुरेश सर्वेद 

खोजता हूं लेकर दीया,कहाँ है मेरा गाँव
जहाँ खड़ा हूं मैं वहां पर
जहाँ न अपनापन है न छाँव।
खेतों की हरियाली खो गई
उन्मुक्त और निस्वार्थ गूंजती हंसी
आज खो गई है।

जब पड़ती थी
पहली बारिस की बूंदे धरा पर
मिट्टी से उठती सौंधी सुगंध से
तन - मन पुलकित हो उठता।
अब बारिस के साथ
क्रांकीट और तारकोल की गंध से
तन - मन विचलित हो उठता है।

खोजता हूं वह उन्मुक्त हंसी
महसूस करना चाहता हूं वह सौंधी सुगंध
पर दूर - दूर
बहुत दूर तक
न सुनाई देती है वह उन्मुक्त हंसी
और न महसूस होता है सौंधी सुगंध

पगडंडी अब बन गई सड़कें
सड़के चौड़ी हो गई
बाग - बगीचे हो गये वीरान
कोयल की कूक खो गई
'' ठीहा '' पर खड़ा देखता हूं
क्या यह वही जगह है
जहां कभी अपनापन हुआ करता था।
जो अब सपना हो गया है।
जहां बरगद है, न छाँव है
क्या यही है मेरा गाँव है?

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