इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 23 मई 2017

गज़ल

अशोक '' अंजुम ''

लम्हा - लम्हा हिसाब रखते हैं
यार भी अब नकाब रखते हैं

उनके हाथों में फिर वही पत्थर
हम हमेशा गुलाब रखते हैं

ये अलहदा है लब नहीं खुलते
यूँ तो हम भी जवाब रखते हैं

सर्द पथराई - सी नज़र लेकर
चन्द उजियारे ख़्वाब रखते हैं

गीत - गज़लों की शक्ल लेता है
दर्द हम लाजवाब रखते हैं

जि़न्दगी उतनी मुँह चिढ़ाए है
लोग जितनी किताब रखते हैं 

पता
बगली 2, चंद्रविहार कालोनी (नगला डालचन्द)
क्वारसी बाईपास, अलीगढ़ - 202002 उ.प्र.

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