इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

मंगलवार, 23 मई 2017

गज़ल

अशोक '' अंजुम ''

लम्हा - लम्हा हिसाब रखते हैं
यार भी अब नकाब रखते हैं

उनके हाथों में फिर वही पत्थर
हम हमेशा गुलाब रखते हैं

ये अलहदा है लब नहीं खुलते
यूँ तो हम भी जवाब रखते हैं

सर्द पथराई - सी नज़र लेकर
चन्द उजियारे ख़्वाब रखते हैं

गीत - गज़लों की शक्ल लेता है
दर्द हम लाजवाब रखते हैं

जि़न्दगी उतनी मुँह चिढ़ाए है
लोग जितनी किताब रखते हैं 

पता
बगली 2, चंद्रविहार कालोनी (नगला डालचन्द)
क्वारसी बाईपास, अलीगढ़ - 202002 उ.प्र.

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