इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 23 मई 2017

देवदासी

देवदासी

          मैं एक गाँव में नौकरी करता था।वहाँ पर मेरी दोस्ती मनीष से हो गई। वह एक पशु चिकित्सक था। हम दोनों की उम्र लगभग एक ही थी। हम दोनों प्राय: साथ ही पाये जाते थे। दौरा भी हम साथ ही किया करते थे। उसके साथ रहते हुए जानवरों में पाई जाने वाली बीमारियों और उसके इलाज़ के बारे में मैं काफ़ी कुछ जान चुका था। यदि किसी मवेशी की मौत के कारणों का पता नहीं चल पाता था, तो मनीष उस मवेशी का पोस्टमार्टम कराया करता था। वह वहाँ मुझे भी अपने साथ ले जाता। मैं भी कुछ नया सीखने की ललक के चलते उसके साथ हो लेता। जानवरों के पोस्टमार्टम की प्रारंभिक प्रकिया यह होती थी कि गाँव का ही एक दलित (मोची) जाति का व्यक्ति मन्नू मरे हुऐ जानवर के कान के पास एक चीरा सा लगाता, और वहाँ से पकड़कर खींच-खींचकर उसकी खाल उतारता जाता। खाल उतारकर वह अलग कर लेता, फिर वह उस जानवर के अंदरूनी भाग को चैक करते हुए हर अंग को टटोलता, और मनीष को बताता कि इसका ये वाला अंदरूनी अंग काम नहीं कर रहा था। इसे फलां बीमारी थी। वह बीमारी का नाम बताकर उसका इलाज़ भी बता देता कि यदि इसे फलां दवाई दी जाती तो यह ठीक हो गया होता।    

         मन्नू से बातें करते हुए यह पता ही नहीं चलता कि डॉक्टर मनीष है, या फिर वह खुद। वह तीसरी कक्षा तक बस पढा़ हुआ था, पर अनुभवों से उसने सारी जानकारियाँ हासिल कर ली थी। पोस्टमार्टम हो जाने के बाद वह उस जानवर की खाल को लेकर वहाँ से चल देता। एक बार मेरे यह पूछने पर कि वह खाल का क्या करता है, उसने बताया कि मैं इस खाल को सूखाकर एक लोकल व्यापारी को दो सौ रूपयों में बेचूंगा। मैंने उत्सुकतावश पूछा फिर वह लोकल व्यापारी इस खाल का क्या करता है? इस पर उसने बताया था कि वह इस खाल को कलकत्ता भिजवाता है, और वहाँ पर वह इसे दो हज़ार रूपये के हिसाब से बेचता है। बाद में इसी खाल से जूते बनते हैं, जिसे आप साहब लोग पहनते हैं। जिले के प्राय: सभी गांव के दलित उस लोकल व्यापारी को ही खाल बेचते हैं। उत्सुकतावश मैंने उस लोकल व्यापारी का नाम जानना चाहा। उत्तर में उसने जो बताया, तो मैं हैरान रह गया। वह लोकल व्यापारी एक ब्राम्हण जाति का व्यक्ति था और उसकी बहुत बडी़ डेयरी थी। पूरे जिले का वह एक ख्यात दूध उत्पादक था। लोग उसे एक बड़े दूध व्यापारी के रूप में जानते थे। मैंने उससे फिर पूछा कि क्या वाकई में वह चमड़े का व्यापार करता है? इस पर उसने बताया कि वह लाभ वाला हर बिजनेस करता है। उसके पास सुअर के भी बड़े-बड़े फॉर्म हैं। चूंकि मादा सुअर एक साथ कई बच्चे जनती हैं, सो इस बिजनेस में बहुत फ़ायदा है। वह व्यापारी तो पैसा कमाने के लिए कुछ भी कर सकता है। फिर मन्नू मुझे आस-पास के गांवों के भंगी जाति के व्यक्तियों के नाम गिनाने लगा कि फलां-फलां उसके सूअर के फार्म में काम करते हैं। मैंने उससे पूछा कि तुम क्यों नहीं बड़े पैमाने पर चमड़े का व्यापार शुरू कर देते हो? इस पर उसने बताया साहब मेरे पास पूंजी होती तो मैं कब का ये काम शुरू कर देता। मैंने उसको सुझाया कि पूंजी की चिन्ता मत करो। तुम आस-पास के गंावों के दस दलित मिलकर एक समूह बना लो तो मैं तुम लोगों को सरकारी योजना का लाभ दिलवा सकता हूं। बैंक के तीन लाख रूपये लोन में से सवा लाख रूपये की छूट भी मिल जायेगी। इस पर फीकी सी मुस्कुराहट के साथ उसने कहा कि साहब आप दस लोगों की बात करते हैं, हम दलितों में आपस में विश्वास ही कहां है। दो सगे भाई तो एक साथ रह नहीं सकते हैं, तो आप तो दस लोगों की बात कर रहे हैं। आप तो साहब रहने ही दीजिये। हम दलितों की यही नियति है।        उसकी यह बातें सुनकर मैं बेहद चिंतित हो उठा। खुद दलित जाति से होने के कारण मेरा चिन्तित होना स्वाभाविक भी था। चिन्ता का पहला कारण तो यह था कि दलितों के पुश्तैनी कामों में दूसरी जाति के व्यक्तियों के द्वारा सेंध लगाया जाना, और दूसरा कारण था दलितों में एकता का न होना। ये दोनों ही बातें मुझे बेहद परेशान करने लगीं।

         हालांकि मन्नू कम पढा़-लिखा था, लेकिन उसकी समझ बेहद विकसित थी, सो मैं उसके घर जाने लगा। उसका घर गांव से बाहर था, जैसा कि प्राय: आज भी दलितों का होता है। वह अपना घर बेहद साफ़-सुथरा रखता था। बातों के दौरान उसने बताया था कि उसकी एक बेटी है। संतोषी नाम की। गांव के हिसाब से बेटी की शादी की उम्र गई है। वैसे तो मैं मन्नू के घर कई बार जा चुका था, पर संतोषी को दो-तीन बार ही देख पाया था। वह एकदम सादगी से रहती थी। उसकी सादगी मुझे बडी़ ही रहस्यमय जान पड़ती थी। मैंने अंदाज़ा लगाया था कि वह अलग कमरे में रहती है। मुझे हमेशा ही संतोषी को देखने की ललक रहती थी। मैं उसके बारे ज़्यादह से ज़्यादह जानना चाहता था, सो मैंने एक बार मन्नू से कहा-यार मैं आपके घर कई बार आ चुका हूं, लेकिन आपने मुझे अपना घर अन्दर से नहीं दिखाया है। मेरे ऐसे कहने के पीछे मेरी मंशा संतोषी को और करीब से देखना ही था। वह मुझे अपना घर दिखाने लगा। पर मेरी नजरे तो संतोषी को देखना चाह रही थी। एक कमरे के पास मैं जाकर ठिठक सा गया अन्दर से अगरबत्ती की खूशबू आ रही थी। खिड़की से झांककर देखा तो वह कमरा मंदिर सा लगा। अन्दर बहुत से देवी-देवताओं की फोटो दिखी। कमरे के अन्दर संतोषी ध्यान की सी अवस्था में बैठी थी। एक झलक में वह बडी़ ही तेजस्वीनी लग रही थी। उसके चेहरे में एक आभामंडल सा लग रहा था। मैने मन्नू से पूछा यह क्या है, क्या तुमने अपने घर में मंदिर बना रखा है। इस पर उसने बताया अरे नहीं साहब, मैं तो नास्तिक आदमी हूं। पता नहीं ये मेरी बेटी किसी बाबा के चक्कर में पड़ गई और कहती है कि मैं शादी नहीं करूंगी। मेरा जीवन सेवा के लिये समर्पित है। मैं दीन-दुखियों की सेवा में अपनां जीवन गुजार दूंगी। यह जानकारी भी मुझे चिन्तित करने के लिये पर्याप्त थी। मैं सोचने लगा कि दलित आंदोलन के वर्तमान दौर में भला किसी दलित महिला का पूजा-पाठ में घण्टों बिताना वाकई में चिन्ता का विषय है। आगे उसने बताया कि इसने अपने कमरे को ही मंदिर बना रखा है। यह अपने कमरे से गांव के मंदिर तक जाती है। उसके अलावा ये कहीं नहीं जाती है। इसकी कोई सहेली भी नहीं है। ये बाबूलाल चतुर्वेदी के कलैण्डर के हिसाब से सभी तरह के व्रत-उपवास करती है। हम इसे समझा-समझाकर थक चुके हैं, पर यह हमेशा ही कहती है कि दीन-दुखियों और पीड़ितों के लिये इसका जीवन समर्पित है।

        हम जिस गाँव में रहते थे, वहां एक मंदिर था। उसी से लगे हुए एक घर में पुजारी रहा करता था। वह एक गृहस्थ पुजारी था। सारे गांव को यह बात मालूम थी कि पुजारी की अपनी बीबी के साथ बनती नहीं है। एक बार तो वह अपनी पत्नी को गांव में दौड़ा-दौड़ाकर मार रहा था। उस वक़्त उसकी बीवी उसे छोड़कर चली गई थी। और गांव वालो की मध्यस्थता करने के बाद मान-मनव्वल करके उसे उसके मायके से लाया गया था। लेकिन पण्डित को न सुधरना था, सो वह नहीं सुधरा। वह अब भी  अपनी पत्नी पर हाथ उठाता ही रहता था। अभी फिर उसकी पत्नी मायके चली गई थी। संतोषी रोज सुबह मंदिर जाया करती थी। मैं और मनीष भी मॉर्निग वॉक के लिये निकलते थे। गांव के कई युवा लड़के भी हमारे साथ ही मॉर्निंग वॉक के लिये निकलते थे। हमारा मॉर्निग वॉक का समय, और संतोषी का पूजा का वक़्त एक ही था। गांव के लड़के उसे देखकर व्यंग्य से कहते-देखो वो जा रही है, दूसरों की सेवा में जीवन समर्पित करने वाली लड़की। पण्डित की रखैल...। उसके बारे में ऐसा सुनने पर मुझे बुरा लगा, और मैंने उन लड़कों को चेताया। उस लड़की की सादगी को देखकर मेरे मन में उसके प्रति बेहद सम्मान का भाव था। यदि वह अपनी जिं़दगी साध्वी जैसे जीना चाहती है तो जिये, उससे भला दूसरों को क्या मतलब होना चाहिये।

          एक दिन मैं मीटिंग के सिलसिले में कस्बे में गया हुआ था। मीटिंग ब्रेक में मैं अपने एक दोस्त के घर जा रहा था, तभी अस्पताल के पास मुझे गांव की नर्स के साथ संतोषी नज़र आई। मुझे लगा कि महिलाओं को कुछ न कुछ लगा ही रहता है। और कुछ नहीं तो एनीमिया तो ज़्यादहतर महिलाओं को रहता ही है। उसी की जांच के लिए आई होगी। मेरी उस नर्स के साथ अच्छी मित्रता थी, पर चूंकि मैं जल्दी में था, सो मैंने दो मिनट रूककर उनसेे कहा अभी मैं जल्दी में हूं। मीटिंग खत्म होंने के बाद आउंगा। इतने में ही मैंने कनखियों से देख लिया कि संतोषी के चेहरे परं किसी तरह के भाव नहीं थे। संतोषी का रहस्यमय व्यक्तित्व मुझे बेहद आकर्षित करता रहा और मैं मीटिंग खत्म होने के बाद तुरंत ही संतोषी को देखने अस्पताल पहुंचा। अस्पताल के परिसर में एक चबूतरे पर नर्स बैठी हुई थी। उसके साथ संतोषी नहीं थी। मैं नर्स से इधर-उधर की बातें करने लगा, पर मेरी निग़ाहें तो संतोषी को ही ढंूढ रही थीं। आख़िरकार मुझसे रहा नहीं गया, और मैंने नर्स से पूछ ही लिया-संतोषी नहीं दिख रही है। इस पर नर्स ने बताया कि अन्दर उसका ऑपरेशन हो रहा है। मैं चौक गया। मैंने उससे पूछा- कौन सा आपरेशन? इस पर उसने कहना शुरू किया- क्या बताउं सर, ये लड़की एकदम पागल है। पता नहीं कहां से इसे दुखी-पीड़ित लोगों की सेवा का भूत चढा़ है। इसकी इस कमज़ोरी का फ़ायदा वो पण्डित उठाता है। वह अपने आपको पत्नी पीड़ित बताते हुए इसके साथ संबंध बना लेता है। इसे तीन माह का गर्भ ठहर गया था, सो मैं इसका अबार्शन कराने के लिए लाई हूं। यह दूसरी बार है। पण्डित ने हाथ जोड़कर मुझसे कहा कि किसी भी तरह इसका अबार्शन करा दो। मैंने पहली बार इसी शर्त पर इसका अबार्शन कराया था कि आईंदा ऐसी ग़लती नही होगी, तो भी इसने दुबारा ऐसी ग़लती की। मैं इन लोगों को समझा-समझाकर थक गई हूं कि संबंध बनाते वक़्त सुरक्षा साधनों का प्रयोग करो पर नहीं। इन्हें तो मजा चाहिये। सज़ा औरत भुगते। अब इस लड़की के भविष्य को देखते हुए और इसे बदनामी से बचाने के लिए मैं दूसरी बार इसके साथ अबार्शन के लिए आई हूं। उसकी यह बात सुनकर मैं सन्न रह गया कि क्या कोई लड़की इतनी भी मूर्ख हो सकती है कि, सेवा के नाम पर यूं ही अपना शरीर किसी को भी सौंप दे। संताषी के बारे में यह जानकर मेरे मन में बेहद उथल-पुथल मची हुई थी। मैं एक दलित लड़की को अपनी आंखों के सामने बर्बाद होता हुआ देख रहा था। ख़ैर बात आई-गई हो गई।

         गांव के लोगों को पता नहीं कहां से यह जानकारी हो गई, और वे चटखारे ले-लेकर उसके कि़स्से सुनाने लगे। मन्नू के घर मेरा आना-जाना पूर्ववत लगा हुआ था। उसके बारे में सब कुछ जानते हुए भी मुझे उस लड़की को देखना बडा़ अच्छा लगता था। उसके चेहरे से टपकती हुई मासूमियत उसे पाक़-साफ़ करार देती। मैं इस घटना को उसकी नादानी मानकर भूल जाना चाहता था। मैं मन ही मन उसे चाहने लगा था, पर उसके चेहरे पर किसी कि़स्म का भाव उभरते न देखकर मेरी हिम्मत जवाब दे देती थी। हमारे बीच बातचीत तक नहीं शुरू हुई थी। इस बीच पण्डित की बीवी मायके से आ चुकी थी और उनका दाम्पत्य जीवन पटरी पर था। मैंने सोचा चलो अब सब कुछ ठीक है।

       कुछ दिनों बाद मेरा ट्रांसफर कस्बे के नज़दीक के गांव हो गया था। मैं उस गांव को छोड़ कर आ चुका था। पर मेरे जेहन में संतोषी की तस्वीर विद्यमान रही। कस्बे में मनीष के साथ-साथ वहां के दूसरे कर्मचारियों से मेरी मुलाकात गाहे-बगाहे होती ही रहती थी। एक दिन मेरे पास मनीष का फोन आया कि अबे वो गांव के किराने की दुकान वाले बनिये आशीष की वाईफ़ खत्म हो गई है। हो सके तो उसके क्रियाकर्म के लिये आ जाओ। उस गांव में मैंने बहुत से लोगों के साथ पारिवारिक संबंध बना रखे थे। वो आशीष भी उनमे से एक था।आशीष हालाँकि मुझसे चार साल बडा़ था, पर हम मित्रवत थे। मैं उसकी बारात में भी गया था। मनीष ने बताया था कि उसकी पत्नी तालाब के किनारे स्थित छुईखदान से छुई निकालने गई थी, और खदान के घसकने से उसी में दबकर मर गई। मुझे यह जानकर बेहद दु:ख हुआ था कि हमारा वह मित्र भरी जवानी में विधुर हो चुका था। क्रियाक्रम के बाद मैं वापस लौट आया।

          अब धीरे-धीरे मैं अपने नये गांव में रमने लगा था। यहाँ मेरे नये-नये दोस्त बन गये थे। पुराने गाँव के लोगों से कस्बे में मुलाकत होती रहती थी। मैं गाँव के लोगों से गाँव के हाल-चाल पूछा करता था। हालाँकि मेरे मन में तो सिफ़र् संतोषी के बारे में ही जानने की ही जिज्ञासा रहती थी। एक दिन गाँव के पटवारी से मुलाकात हो गई। उसने मुझे बताया कि मन्नू की लड़की संतोषी के तो अब बनिया के साथ संबंध बन गये हैं। वह अक्सर उसके घर में ही पाई जाने लगी है। हालाँकि मेरे पास उसकी बातों पर यकीन करने के अलावा कोई चारा नहीं था, पर मेरा मन कहता था कि वह फिर से इतना मूर्खतापूर्ण काम नहीं करेगी।खै़र मुझे लगा कि अब संतोषी के बारे में सोचना मुझे छोड़ना होगा, पर उसका मासूमियत भरा चेहरा मुझे याद आ ही जाता था। एक दिन गाँव का झोला छाप डॉक्टर मुझे कस्बे के अस्पताल के सामने नज़र आ गया। वह बड़ा ही परेशान नज़र आ रहा था। चूंकि वह भी मेरा हमउम्र ही था, सो मित्रवत था। मैंने मोटर-सायकल रोककर उससे उसकी परेशानी का कारण पूछा, तो उसने बताया कि सर मैं उस बनिया के पाप के कारण परेशान हूँ। संतोषी को चार माह का गर्भ उसकी तरफ से है, और मैं उसका एबार्शन कराने आया हूँ। इस बार नर्स मैडम ने साफ़ मना कर दिया है, तो मुझे ही उसे लेकर यहाँ आना पड़ा। चार माह के बच्चे का गर्भपात कराने का रिस्क कोई भी डॉक्टर नहीं ले रहा था। बडी़ मुश्किल से हाथ-पैर जोड़ने, और मँुहमाँगी रक़म देने की शर्त पर एक डॉक्टर तैयार हुआ। अन्दर संतोषी का एबार्शन चल रहा है। बनिया ने मुझे पाँच हजार रूपये देकर भेजा है। मेरी भी इच्छा नहीं थी, लेकिन लड़की का भविष्य न बिगड़े सोचकर, और कुछ तो दो-चार पैसा कमाने की नीयत से मैं उसे यहाँ ले आया हूं।        अब तो मुझे संतोषी मूर्खता की जीती-जागती प्रतिमा लगने लगी थी। मैंने अब ठान लिया था कि संतोषी के बारे में सोचकर मुझे परेशान नहीं होना है। मैंने दृढ़ता-पूर्वक उसके बारे में सोचना छोड़ दिया। अब तक नये गाँव में मुझे चार साल हो चुके थे। इस बीच हाँलाकि कभी-कभी मेरा पुराने गाँव जाना होता रहता था, पर मैं मन्नू के घर नहीं जाता था।

       एक बार मैं अपने पुराने गाँव की मड़ई-मेले के मौके पर वहाँ पहुँचा हुआ था। मैं और मनीष घूम-घूमकर मड़ई का मजा ले रहे थे, तभी मुझे एक औरत अपने दो-ढाई साल के बच्चे के साथ नज़र आई। मुझे उस औरत का चेहरा जाना-पहचना सा लगा। ध्यान से देखने पर पाया वह तो संतोषी थी। मैंने मनीष से पूछा कि संतोषी की शादी कब हो गई? इस पर उसने आश्चर्य जताते हुए बोला-अरे तुझे नहीं मालूम? मेरे अनभिज्ञता ज़ाहिर करने पर उसने बताया कि पुजारी के बाद संतोषी का चक्कर आशीष के साथ चलने लगा था। कुछ महीनों बाद ही आशीष ने दूसरी शादी कर ली और संतोषी को दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका। उसके कुछ दिनों बाद हमारे गांव में एक राजपूत सर आये थे। वे तलाक़शुदा थे। कुछ दिनों बाद संतोषी का संबंध राजपूत सर से हो गया, और वह उनकी तरफ़ से प्रेग्नेण्ट हो गई। इस बार झोला छाप डॉक्टर, और नर्स दोनों ने ही अबॉर्शन कराने से मना कर दिया, तो संतोषी ने ठान लिया कि अब वह इस बच्चे को जन्म देगी, और कुंवारी माँ की तरह उसका पालन-पोषण करेगी। और उसने इस बच्चे को जन्म दिया भी। इस बार तो मन्नू इसे मारने के लिये कुल्हाडी़ ही निकाल लाया था। गाँव वालों के समझाने-बुझाने पर वह बड़ी मुश्किल से शांत हुआ, लेकिन उसने कह दिया कि मैं ऐसी छिनाल को अपने घर पर नहीं रखूँगा। आजकल ये मंदिर के पास ही एक छोटे से कमरे में अपने बच्चे के साथ रहती है, और आज भी पूजा-पाठ में लगी रहती है। अपना जीवन-यापन करने के लिए दूसरों के खेतों में मजदूरी करने जाती है। हमारी बातचीत के दौरान वह हमारे क़रीब आ गई। उसने अपने बच्चे को गोद में उठा लिया था। वह मुझे देखकर मुस्कुराई साथ ही उसका बच्चा भी खिलखिलाने लगा। थोडी़ देर पहले तक छिनाल संबोधन सुन चुका मैं फिर से उसकी मासूमियत में खो गया। मैंने हाथ बढा़कर उसके बच्चे को अपनी गोद में ले लिया। पता नहीं क्यों, वह अब भी मुझे देवी ही लग रही थी, और उसका बेटा देवपुत्र। मनीष ने मेरे कान में फुसफुसाकर कहा-अबे ये क्या कर रहा है? छोड़ इसे। लेकिन उसके ऐसा कहते-कहते मैंने बच्चे के साथ ही संतोषी का भी हाथ थाम लिया।                                                                                                                                                  आलोक कुमार सातपुते

                                                                        09827406575

                                                       832, हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी सड्डू, रायपुर (छ.ग.)

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