इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

मंगलवार, 30 मई 2017

कविताएं

यशपाल जंघेल  

 दूब 

कितनी भयानक त्रासदी
कुछ भी न रहा शेष
कुछ भी...........

बाढ़ और काल पयार्यवाची हो गए
इस बाढ़ के बाद
सहम गई सभ्यताएं
सिंधु घाटी सभ्यता को याद करके
ऊब गई चीटियां
चोटी मे डेरा डाले
थक गई गौरय्या
ठीहा ढूंढते - ढूंढते
देखी नहीं कभी ऐसी विभीषिका
मनराखन बुदबुदाता
ढह गया मकान,
बह गए मवेशी,
फसलें हो गई बर्बाद
कुछ भी न रहा
शेष कुछ भी..........
.
उखड़ गया बबूल और उसकी सांसें
धराशायी हो गया महुआ
और ढह गया एक बूढ़़ा बरगद भी
बाढ़ के बाद मैं भी
गहरी संवेदना व्यक्त करता हूं
कुछ भी न रहा शेष 
कुछ भी..........
.
तभी दिख जाती है एक दूब
पैरों के पास
कराहती,
जूझती,
हरियाती,
मुझको झुठलाती 
एक दूब ।
                 
बाजार

मैं खेत जाता हूं
मैं जंगलों और पहाड़ों में भी जाता हूं
मैं जाता हूं हर दिन
नदियों के पास

मैं न जाऊँ,
तो क्या मेरे घर आएंगे ?
खेत, जंगल, पहाड़ और
नदी

मैं बाजार भी जाता हूं
मैं न जाऊं बाजार
तो क्या बाजार
नहीं आएगा मेरे घर

जब बंद रहते हैं
घर के दरवाजे और खिड़कियाँ
तब भी मेरे घर में
घुस आता है बाजार

बाजार आता है
बिना बुलाए
मेरे घर में,
मेरे  रास्तें में,
खेत, जंगल, पहाड़, नदी
और मेरे बीच में ।

भूकंप  आया

 मेरा घर खड़ा रहा
बाढ़़ आई
मेरा घर खड़ा रहा
तूफान आया
मेरा घर खड़ा रहा
सुनामी आई
मेरा घर खड़ा रहा
एक दिन,
अविश्‍वास का एक झोका आया
मेरा घर ढह गया।

आंख   
   
क्या आंख को सिर्फ आँख होनी चाहिए
वह जीभ भी तो हो सकती है                                                            
आंख कान और नाक भी होती है
क्या आपने आंख को
पेट बनते देखा है ?
मैंने तो आंखों को
पंजों मे तब्दील होते देखा है
यहां इस समय
अंधेपन को परिभाषित करना उतना ही मुश्किल है
जितना कि शहर मे गांव ढूंढना
शायद खतरनाक भी
जबकि हम यहां कई अंधों को
आंखे दिखाते हुए देख रहे हैं
और आंख वालों को
आंखे चुराते हुए
विचि़त्र स्थिति बन रही है
आंखें खुली रखने की सलाह
मंच से दी जाती है
और बंद कमरों मे
आंखें  मूंदी रहने की हिदायतें
हिदायतें सुनो तो आंखों का तारा
न सुनो तो आंख की किरकिरी
इस समय अंधेरे पर यकीन
हरगिज नहीं किया जा सकता
यकीन तो रौशनी पर भी नहीं किया जा सकता
उधेड़ना होगा रौशनी का रेशा -रेशा
न जाने किस तह में
छिपा बैठा हो धृतराष्‍ट्र
हमें सबसे ज्यादा
स्वयं पर यकीन करना होगा
देखना होगा आंखें उठाकर
जबकि सभाओं में तेजी से पनप रहा है गंधारीपन
हम अपनी आंखें जितनी नीची करते हैं
लोगों की आंखें
हम पर उतनी ही गड़ती हैं

आज हम
जब अपनी ही आंखों में गिरते जा रहे हैं
शकुनि ने फेक दिया है पासा
पितामह भीष्‍म खुद से आंखें मिला नही पा रहा है
ऐसी स्थिति में
आंख जीभ हो या न हो
वह नाक, कान, पेट और पंजा
रहे या न रहे
कम से कम आंख को
आंख होनी ही चाहिए

नमक

 सूखनें पर हमारी कमीज में
उभर आती है
नमक की सफेद परत

पसीनें के बहनें से ही
आता है नमक

नमक,
जब मिलने लगता है
पसीने के बहे बिना ही
तब पसीने का बहना बंद हो जाता है
और बंद हो जाता है
उनकी मुटिटठियों में
हमारे हिस्से का नमक भी

पसीने के बहने से ही
मुक्त होता है नमक ।


 तलाश

सायकल चलाता हूं
नमस्कार की झड़ी लग जाती है

मोटर सायकल में होता हूं
नमस्कार की बौछारें आती हैं

कार मे होता हूं
नमस्कार के छीटें पड़ते हैं

हवाई यात्रा में होता हूं
नमस्कार का सूखा पड़ता है

और
मैं सूखे से डरता हूं
नमीं की तलाश में
पैदल ही चल पड़ता हूं

घास

घास उगाई नही जाती
उग आती है   
मैदानों में,
पठारों, जंगलों, पहाड़ों  में
पाखरों, पगडंडियों, खेत की मेड़ों
और खंडहर की दीवारों में

धास घूरे में भी खोज लेती है
अपने लिए जगह
पीपल के कंधों पर  बैठकर
सेंकती वह धूप

यात्रियों की थकी नींद में
शामिल हो जाना चाहती है घास
वह जगह पाना चाहती है
गाय के सपनों में
दूध बनकर उसकी थनों में
इतराना चाहती है वह

घास उगाई नही जाती
उग आती है
एक दिन आदमी की छाती में
पीती नहीं खाद का पानी
वह चट्टानों से रस खींचती है
हजारों बार हुई  उसे मिटानें की साजिश
रौंदा गया वह कई बार
लेकिन उसनें हर बार दिखाया ठेंगा
आंधियों को
भूकंप और बाढ़ को

घास उगाई नही जाती
उग आती है
राजा के आंगन में भी
और जब वह उखाड़कर
फेंक दिया जाता है
एतिहातन
तब एक दिन वह उग आती है
राजमहल के गर्दन में
उसके ईटों के बीच
अपनी जड़ें धंसाती

घास उगाई नही जाती
न ही मिटाई जा सकती है।                      


दिन के बुढ़ापे में
सूरज का डूबना
नहीं हो सकता
मेरी उदासी का कारण

गर्मियों में तालाबों का सूखना
आसमान में धूलों का उड़ना
बादलों के चंगुल में
सूरज का फंसना
ये कारण भी नहीं
मेरी उदासी का

मेरी उदासी
आजकल पेड़ों की उदासी है
कोई समझाए उन्हें
पतझड़ अन्त नहीं
पतझड़ शुरुआत है
एक नये युग की

 पता
सहायक शिक्षक
पी:एस: - बैगा साल्हेवारा
जिला - राजनांदगाँव (छत्‍तीसगढ )
 मो- 9009910363

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