इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

मंगलवार, 23 मई 2017

यही तो है मजदूर

यही तो है मजदूर
आलेख
         सूरज अपने पूरे आवेश पर थाए तपती धूप और तिखी रौशनी में किसी की भी हिम्मत घर से बाहर निकलने की नही हो रही थीए जो निकल भी रहे थे वो मुंह ढंक कर या छाता ओढ कर निकल रहे थेए लोग पैदल चलते हुए जरा सी भी छांव को जाया नही कर रहे थेए भले उन्हें सांप की तरह लहरा के चलना पडेए पहाड़ी इलाके और गर्म हवाओं के बीच मैं भी अपना मुंह लपेटे साईकिल से पहाड़ी के पास ही रहने वाले अपने दोस्त के यहां जा रहा थाए मैंने बढी हुई गर्मी को कोसते हुए अपना दस मिनट का सफर बडी मुश्किल से पूरा किया और दोस्त के घर के बाहर साईकिल खडी करके आवाज लगाईए हीराण्! ओ हीराण्ण्! मैं आया हूं ललितण्!
        अंदर से कोई आवाज नही आई शायद भीतर तक आवाज पहुंची ही नहीए मुझे पास से ही आ रही तेज करकस आवाज चुभने लगी क्योंकि शायद उसी वजह से मेरा दोस्त मेरी आवाज नही सुन पा रहा थाए तभी ओ ध्वनि थम गई मानो ईश्वर ने मेरे मन को पढ लिया हो। मेरी नजर प्रसन्नचित होकर उस ध्वनि की दिशा में हो चलीए शायद ईश्वर के अभिवादन के लिए आप से आप ही मुझसे ऐसा हो गया या फिर ईश्वर मुझे कुछ समझाना चाह रहे थे। तभी तो उसी वक्त मेरी नजर उस ध्वनि के जनकए या ध्वनि कर्ता के ऊपर पडी और पहले से पसीने से भीग चुका मेरा बदन शर्म से और तरबतर हो गया। ऐसा इसलिए क्योंकि किसी का कठोर तप मेरी आंखों के सामने था जिसके आगे हमारे खोखले पन की पोल स्पष्ट उजागर हो रही थी।
        सामने एक वयोवृद्ध हांथ में हथौडा लिये खडा थाए तन खुला था मानो वह पूर्ण आजादी चाहता होए सर पर एक सांफा बांध रखा थाए मानो वह कहीं का शहंशाह होए चिलचिलाती धूप और तपते पहाड़ियों के बीच अंगार जैसे पत्थरों पर नंगे पांव खडे रहकर उसने माथे का पसीना पोंछा और नजर उठा कर सूरज की ओर देखाए उसके चेहरे के भाव से लगा मानो वह सूरज को ही चुनौती दे रहा हो कि आओ हम एक दुसरे को आजमाते हैंए उसकी नजर उस सूरज पर ही टिकी रही जिसे काला चश्मा पहन कर भी देख पाना हमारे लिए मुश्किल थाए और ऐसे ही उसने अपना हाथ जमीन की ओर बढाया और रोटी खाने के बाद पानी से भरे स्टील के एक डिब्बे को उठा कर मुंह से लगाया और पानी की धार को अपने कंठो से पेट तक उतार लियाए निश्चित ही इतनी तेज गर्मी में स्टील के डिब्बे में रखा पानी खौलने की स्थिति में रहा होगा फिर भी उसने उसे अमृत समझ कर ग्रहण किया थाए और कुछ ही पलों बाद वह वयोवृद्ध बिस्तर पर आराम करने की उम्र में वजनी हथौड़े से पहाड़ चिरने लगा पत्थरों को कागज फाड़ने जीतनी आसानी से तोड़ रहा थाए और फिर से वही तेज धरती को कंपकपा देने वाली ध्वनि मेरे कानों से टकराई ठक ठक ठक हर ठक की आवाज नागाडे की थाप जैसी लगती थी मानो वह किसी की जीत या किसी के पराक्रम का जयगान कर रहें हो।
        और इस ध्वनि ने इस बार मुझे पहले से ज्यादा बेचैन किया पर ये बेचैनी कुछ और थीए इस बार बेचैनी मेरे आत्मा के किसी कोने से उठे सवालों की वजह से थे जो पुछ रहे थे कि ये वयोवृद्ध कौन हैघ् क्या ये अपनी ही जीत के लिये ऐसी थाप दे रहा हैघ् क्योंकि मानवता या इंसानियत की जीत तो ये कदापि नही थी। क्या इसे धूप गर्मी लू प्यास जैसे शब्दों का अर्थ पता नहीघ् ये सब किसके लिये कर रहा हैघ् क्या ये भी इंसान ही हैघ् क्या इसके पास इस कार्य का कोई दुसरा विकल्प नही हैघ् क्या इसे पुरा मेहनताना मिलता होगाघ् क्या इसे अच्छे कपडे पहनने का मन नही होता होगाघ् क्या इसे राजनीति या राजनेताओं से कोई मतलब भी हैघ् क्या इसे बडी.बडी बातों बडे.बडे वादों की जरूरत हैघ् मैं सोचता रहा और सिर्फ सोचता रहा जैसे आप सब सोचते हैं कभी मजदूर दिवस पर एक दिन तो कभी चुनाव के वक्त कुछ हफ्तेण्! पर इसी सोंच में ये गर्म तपता मौसम मुझे भाने लगाए पता नही क्यों धूप से जल चुके उस वयोवृद्ध के काले शरीर को देखकर लगा की हमारे समाज की शक्ल कितनी काली है।
        तभी मेरा दोस्त पीछे से आकर मेरे कंधे पर हाथ रखा और मुझसे कहा अरे ललित तु कब से आया हैघ् चल बहुत धूप है अंदर चल कर बैठण्! मैं जैसे मेरा स्वप्न टूटा हो चौंक गयाए और मुझे तो अब धूप लग ही नही रही थीए मैंने उसे उस वयोवृद्ध की ओर इशारा करके पूछा ये कौन हैए मेरे दोस्त ने हंसते हुए कहा ये तो यहां रोज आता हैए यही तो है मजदूर। मैं उसके साथ उसके घर पर लगभग घंटा भर रहा उसने बहुत सी बातें की पर मेरा ध्यान तो उसके एक वाक्य पर ही अटका रहा ष्यही तो है मजदूरष् हाँ साहब एक बार फिर सुनिए ष्यही तो है मजदूरष् ।

ललित साहू ष्जख्मीष् छुरा
जिला.गरियाबंद ;छण्गण्द्ध
9993841525

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