इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 23 मई 2017

दो कविताएं - रोज़लीन

रोजलीन

बस इतना ही
तुम
मुझसे बात न करो
और
मैं तुमसे मिल न पाऊं
इसकी
रत्‍ती भर
शिकायत नहीं मुझे
लेकिन
कम से कम
इतना तो चाहती हूं मैं
कि
तुम्‍हारी गंध
इन हवाओं में
बरकरार रहे
तुम्‍हारा स्‍पर्श यूं ही छूता रहे
फूलों, दरख्‍तों, छायाओं
लहरों पर
तुम्‍हारी मंद मुस्‍कान
और
तुम्‍हारी आंखों की आद्रता
चांद - तारों सी
टंगी रहे आसमान पर
तुम्‍हारी थिरकती उंगलियों से
उठती हुई ताल
बजती रहे
मेरे आस - पास
तुम्‍हारा मधुर गीत
गूंजता रहे दिशाओं में
- बस
इस ही तो
चाहती हूं मैं

( 2 )
 तुम्‍हारे घर के किवाड़

जानती हूं
तुम्‍हारे घर की ओर
मुड़ते हुए
मुझे नहीं सोचना चाहिए
कि
मुझे तुम्‍हारे घर की ओर मुड़ना है
तुम्‍हारी दहलीज पर आकर
नहीं रुकना चाहिए ठिठक कर
कि मेरे कदमों की आहट
तुम्‍हारा कोई स्‍वप्‍न
भंग न कर दे
खटखटाकर तुम्‍हारा किवाड़
नहीं लेनी चाहिए इजाज़त
तुम्‍हारे भीतर आने की
जबकि,
मैं जानती हूं -
सदियों से खुले हैं
तुम्‍हारे किवाड़
मेरे लिए
देखो न.....
फिर भी
कैसेट भय से कांपता है दिल
तुम तक पहुंचने के
ख्‍याल भर से

पता-
535, गली नं. 7, कर्ण विहार
मेरठ रोड, करनाल, - 132001 ( हरियाणा )
मोबाईल - 09467011918

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