इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

मंगलवार, 23 मई 2017

नवरंग के मुक्तक

 डॉ॰माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’
                    *                        *
     घर जला दे वो आग मत रखना             जाति चलती है वंश चलता है
     मन दुखा दे वो राग मत रखना              सभा में अब भी कंस चलता है
     कटघरे में तुम्हें खड़ा कर दे                 लक्ष्य होता है जब सिंहासन का
     कभी ऐसा सुराग मत रखना                धर्म में भी विध्वंश चलता है
     *                       *  
राह बन जाना भीड़ मत बनना       जमीं पे पहले पांव धरती है
     चाटूकारों की रीढ़ मत बनना           फिर चिड़िया उड़ान भरती है
     जो चमन को उजाड़ा कराते हैं          वो कभी आसमां नहीं छूती
     उन परिंदों का नीड़ मत बनना          पंख फैलाने से जो डरती है
      *      *
     अच्छी शुरूआत दे दिये होते            भरमाने लगा है चित्र मेरा
     सत्य का साथ दे दिये होते            कतराने लगा है मित्र मेरा  
     बच गए होते डूब न पाते             आते जाते टंगा हुआ दर्पण
     लोग गर साथ दे दिये होते            दिखलाने लगा चरित्र मेरा
    *        *
     हसरतें बेहिसाब रखते हो            जो भी मिलता है बाँट देते हैं
     मन में हाज़िर जवाब रखते हो       हर खाई को पाट देते हैं
     सिर्फ़ पढ़ते नहीं वरना घर में       हम फकीरों का कुछ भरोसा नहीं
     हर क़िस्म की किताब रखते हो      कहीं भी वक्त कट देते हैं


  *      *
    खास चलता है आम चलता है       मान हरदम दिया करे कोई
    बस इसी तरह काम चलता है       नाम हरदम लिया करे कोई
    नाम लिखना जिन्हें नहीं आता      अब तो बंदे भी चाहते हैं कि
    ऐसे लोगों का नाम होता है         उनकी पूजा किया करे कोई
      *      *
    कब तलक अपने दिल को बहलाएँ     करले जी भरके अपनी मनमानी
    तेरी रुसवाइयों को अपनाएं          ये लड़कपन नहीं है नादानी
    अब तो ये हाल है कि दिन ढलते     एक दिन खुद ब खुद हो जाएगा
    सोचना पड़ता है कहां जाएं          दूध का दूध पानी का पानी
        *      *
    जो न कालीन हैं न जूते हैं          सपने होने लगे हैं फंतासी
    वे लोग आसमां को छूते हैं         राम होता नहीं हर वनवासी
    कभी थामे नहीं हैं बैसाखी          सिर्फ़ दो बूंद पानी के बदले
    जहां पहुंचे हैं अपने बूते हैं           कंठ सूखे थे दे दिये फांसी
      *               *
    अपनी आँखों में जड़ लिया होता                लोग बेवजह बैर रखते हैं
    हर एक अंग को पढ़ लिया होता         दोस्त की जगह गैर रखते हैं
    थाम लेता मैं आप गर कहते                 जहां चलना होता है मुश्किल
    लड़ने कहते तो लड़ लिया होता        उन्हीं राहों में पैर रखते हैं

      
   डॉ॰माणिक विश्वकर्मा नवरंग’ नवरंग’                                                             क्वा॰नं॰एएस-14,पावरसिटी,जमनीपाली,                                                                कोरबा (छ॰ग॰)495450                                                                मोब॰ नं॰ 9424141875 , ई॰मेल- vskm_manik@rediffmail.com
 

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