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इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

सोमवार, 21 अगस्त 2017

बाबा की लोरी, मां की ममता का दर्पण

कवयित्री सरिता बाजपेई
 
भावना मुस्कान रिश्तों में लुटाती
थपकियाँ दे पीर मैं अपनी सुलाती
प्यार के धागे बंधी राखी का बंधन
बाबा की लोरी, माँ की ममता का दर्पण

अनगिनत संकल्प की माला को गूंथ्‍ाूं
कुल, नगर, वन देवता के पाँव पूजूं
हैं सरस पावन मृदुल जीवन के धारे
पल्लवित जीवन धरा के स्वप्न सारे
भोर की पहली किरण घिसती है चन्दन
बाबा की लोरी, माँ की ममता का दर्पण

तन की काया भर रही आँगन सवेरा
आँखे मूंदे प्रार्थना करती है फेरा
जग गई फिर साधना होकर सकल है
ऐसा लगता यह कई जन्मों का फल है
गाता है पाँव की पायल पे मधुवन
बाबा की लोरी, माँ की ममता का दर्पण

रजनी की पलकों में सुधियों का मेला
डाल पर बैठा है मन पंछी अकेला
उर विकल ने जब पुन : पाती है बांची
खोल घूँघट वेदना आँगन में नाची
लट खुली यादें ह्रदय गूंथे अकारण
बाबा की लोरी, माँ की ममता का दर्पण

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