इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 21 अगस्त 2017

बाबा की लोरी, मां की ममता का दर्पण

कवयित्री सरिता बाजपेई
 
भावना मुस्कान रिश्तों में लुटाती
थपकियाँ दे पीर मैं अपनी सुलाती
प्यार के धागे बंधी राखी का बंधन
बाबा की लोरी, माँ की ममता का दर्पण

अनगिनत संकल्प की माला को गूंथ्‍ाूं
कुल, नगर, वन देवता के पाँव पूजूं
हैं सरस पावन मृदुल जीवन के धारे
पल्लवित जीवन धरा के स्वप्न सारे
भोर की पहली किरण घिसती है चन्दन
बाबा की लोरी, माँ की ममता का दर्पण

तन की काया भर रही आँगन सवेरा
आँखे मूंदे प्रार्थना करती है फेरा
जग गई फिर साधना होकर सकल है
ऐसा लगता यह कई जन्मों का फल है
गाता है पाँव की पायल पे मधुवन
बाबा की लोरी, माँ की ममता का दर्पण

रजनी की पलकों में सुधियों का मेला
डाल पर बैठा है मन पंछी अकेला
उर विकल ने जब पुन : पाती है बांची
खोल घूँघट वेदना आँगन में नाची
लट खुली यादें ह्रदय गूंथे अकारण
बाबा की लोरी, माँ की ममता का दर्पण

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