इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

सोमवार, 21 अगस्त 2017

भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन

 गिरीश पंकज

बह.सुबह अखबार देखा तो अपने मूड का स्विच ऑफ हो गया। नहीं.नहींए फिर से वही महँगाई बढऩे वाली खबर नहीं थी। खबर थी. श्देश में भ्रष्टाचार का तेजी से विकासण्ण्। भारत विश्व के टॉप.टेन भ्रष्ट देशों में एकश्श्।
श्श्छी.छीए स्सालेण्ण्ण्भ्रष्टाचार की इतनी हिम्मत! इसको तो मिटाकर ही दम लूँगा।श्श्
मैंने चाय की चुस्कियों के साथ कसम खाई कि श्भ्रष्टाचार के खिलाफ जोरदार संघर्ष करूँगा और तब तक चैन से नहीं बैठूंगा औरण्ण्ण्और जब तक भ्रष्टाचार का खात्मा न हो जाएए एक पैग से ज्यादा शराब नहीं पीऊँगा। जब तक हमारे जैसे पलन्टू जिंदा हैंए भ्रष्टाचार की खैर नहीं। अबे भ्रष्टाचारए तुझे जलाकर राख कर दूंगा।श्श्
मुझमें नाना पाटेकर टाइप का हौसला आ गया। मेरी चिल्लाहट सुन कर पत्नी दौड़ी चली आई कि मुझे कुछ हो तो नहीं गया।
मैंने पत्नी से कहा. श्श्देखो डार्लिंगए भ्रष्टाचार तेजी के साथ बढ़ रहा है। इसे खत्म करना हैए हाँ। उसे मिटाकर ही चैन मिलेगा। तुम मेरे साथ हो नघ्श्श्
पत्नी सिर पीटते हुए बोली. श्श्नाथए मैं तो जन्म.जन्म से हूँ तुम्हारे साथए लेकिन भ्रष्टाचार तो बाद में मिटानाए पहले आप घर के मच्छरों को तो मिटाओ।श्श्
मैं भड़क गया.श्श्ओफ्फोण्ण्ण्ण्ये क्या तमाशा हैघ् मैं यहाँ राष्ट्रीय समस्या पर बात कर रहा हूँ और तुम होए कि एकदम से पार्षद टाइप की हरकत करने लगती हो। लोकल मुद्दे पर उतर आयी। मेरा पूरा श्स्टैंडर्डश् खराब कर के रख दिया। आखिर हो न वही झुमरीतलैया वाले रामखिलावन की बेटी। अभी थोड़ी देर बाद मैं ग्लोबल.वार्मिंग जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर आने वाला था। धत् तेरे की। पूरा श्मूडईश् चौपटा गया। तुम औरतों की वस यही समस्या है.मच्छरएखटमल और टीवी सीरियल। थोड़ी देर बाद कहोगी पहले जल संकट मिटाओए फिर कहोगी महंगाई कम करोए बाद में भ्रष्टाचार मिटाना। हुंह। मैं तो पहली प्राथमिकता भ्रष्टाचार मिटाने को ही दूँगा।श्श्
पत्नी ने मुँह बिचका कर सब्जी का झोला थमा दिया। मार्केट जाने के पहले मैंने अपने डैडी से भी भ्रष्टाचार के बढऩे पर गहन चिंता जताई। उन्होंने शुभकामना दी कि इस जनम में ही भ्रष्टाचार मिटाने में भगवान तुम्हें सफलता प्रदान करें। थोड़ी देर बाद बेटा स्कूल से लौटा तो मैंने उसको भी बताया कि श्श्बेटेए देखोए भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ रहा है। उसके खिलाफ लड़ाई लडऩी है। हम नहीं लड़ेंगे तो बताओ नए कौन लड़ेगा। अपने बाप से कभी झूठ नहीं बोलना।श्श्
बेटा कभी मुझेए कभी अपनी माता को देखता रहाए उसका इशारा मैं समझ रहा थाए कि वह कहना चाहता हैए कि पिताजी के साथ कोई मेंटल प्रॉब्लम तो नहीं शुरू हो गया। खैरए मैंने उसके इशारे को अनदेखा कर दिया। फिर मैंने बेटे को हिदायत दी कि श्श्देखोए किराना दूकान वाला आए तो साफ.साफ कह देना डैडी आऊट ऑफ स्टेशन हैं। दो.चार बाद आयेंगे।श्श्
रास्ते भर मैं भ्रष्टाचार को खत्म करने के बारे में ही सोचता रहा। मेरी आदत है। जब किसी बात की धुन सवार हो जाती हैए तो उसी को लेकर सोचता रहता हूँ। उस दिन सोचा कि ऑफिस.गर्ल को अपने वश में करना है। बसए कुछ दिन लगे और सफल हो गया।
दफ्तर में घुसने के पहले ही दो कुलीग मिल गए पान ठेले पर। हम भी पहुँच गए। पहले चाय पी फिर पान चबाकर इधर.उधर घूमते रहे। बीच.बीच में भ्रष्टाचार के तेजी के साथ बढऩे पर चिंता भी जताई।
सारे मित्रों ने कहा. श्श्बिल्कुल ठीक कह रहे हो यार। इस भ्रष्टाचार को समाप्त करना हम सबका परम कर्तव्य है। अच्छाए यो तो बताओ कि कल ठेकेदार रामभरोसे आया था नए उसके टेंडर का क्या हुआघ्श्श्
मैंने मुसकराते हुए कहा. श्श्भाईए अगर हमको कुछ दान.दक्षिणा दे दे तो उसी का टेंडर पास करवा देंगे। वो साला तो आज आया ही नहीं।श्श्
मित्र ने मुसकराते हुए बताया. श्श्चिंता मत करोए ठेकेदार तुम्हारे पैसे जमा कर गया है।श्श्
मैंने कहा. श्श्मतलबए अगला कुछ.कुछ ईमानदार है। ठीक हैए तब तो उसका काम करना ही पड़ेगा। वरना यह भ्रष्टाचार हो जायेगा। और मैं ठहरा भ्रष्टड्ढाचार विरोधी। मैं इस भ्रष्टाचार को मिटाकर रहूंगा। तुम लोग मेरा साथ दोगे नघ्श्श्
सारे मित्रों ने सिगरेट हाथ में लेकर कसम खाई. श्श्हाँए हम भ्रष्टाचार मिटाने में तुम्हारा साथ देंगे।श्श्
मुझे राहत मिली। भ्रष्टाचार की लड़ाई में मैं अकेला नहीं हूँ।  मेरे दोस्त भी मेरे साथ हैं।
मैं दफ्तर में घुसा और रोज की तरह अपनी कुर्सी पर बैठकर जासूसी उपन्यास श्ये लहू किसका हैश् पढऩे लगा। बहुत ही प्यारा उपन्यास है। कभी आप भी पढ़ें। पढऩे की मेरी आदत है। एक बार जो भी जासूसी या सैक्सी उपन्यास हाथ में लेता हूँ तो उसे पूरा करके ही दूसरे काम निपटाता हूँ। सिद्धांत मतलब सिद्धांत। उसमें कोई समझौता नहीं कर सकता। दफ्तर में लोग आते रहेए मैं सबको टरकाता रहा। पाँच बजा तो उपन्यास के पृष्ठ को मोड़कर रख दिया। उठ खड़ा हुआ। इसे कहते हैं समय की पाबंदी। समय की पाबंदी ही सफलता की कुंजी है।
दफ्तर के बाहर निकलाए चाय पी। सिगरेट के दो.चार कश मारा और घर की तरफ रवाना हो गया।
मैं आज काफी खुश था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मैं जो लड़ाई छेडऩा चाहता हूँए उसमें कई लोग मेरे साथ हैं अब तो भ्रष्टाचार दम तोड़कर ही रहेगा। रास्ते में कांजी हाउसए नहीं.नहींण्ण्ण्ण्कॉफी हाऊस पड़ गया। वैसे काफी हाउस और काँजी हाउस में ज्यादा फर्क नहीं होता। कांजी हौस में आवारा पशुओं को पकड़ कर लाया जाता है और कॉफी हाउस में लोग अपने आप चले आते हैं। अपनु को सुबह.शाम यहाँ एक.दो घंटा बैठने का पुराना रोग है। काहे कि यहाँ दो.चार ठलहे किस्म के क्रांतिवीर बैठे मिल ही जाते हैं। आज भी मिल गए।
हमने पहले अपने आँखें मार.मार कर आस.पास की महिलाओं की चरित्र हत्याएँ कींए फिर अश्लील साहित्य पर विचार.विमर्श किया। अचानक मुझे याद आया कि मुझे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लडऩी है। मैंने जोर.जोर से टेबल ठोंकते हुए कहा. श्श्दोस्तोए मैं एक न एक दिन भ्रष्टड्ढाचार को खत्म करके रहूँगा। तुम लोग मेरा साथ दोगे नघ्श्श्
मित्र.मंडली हँसते हुए बोली. श्अबेए हम लोग तो हमेशा तुम्हारा साथ देते हैं। तुम्हारे बॉस की चरित्र हत्या करने के लिए परचे किसने तैयार किए थेघ् हमनेण्ण्। याद करोए तुमने कालू सेठ का काम किया था और जब वह पैसे नहीं दे रहा थाए तो उसको हड़काकर  वसूली का काम किसने किया थाए हमने। तो हम तुम्हारे यार हैं। अच्छाए ये तो बताओए आज हमारी कॉफी का बिल तुम ही पेमेंट करोगे नघ् करोगे तो हम तुम्हारा साथ फिर देंगे।श्श्
मेरे पास पर्याप्त मात्रा में ऊपर की कमाई थीए सो थोड़ी.बहुत जनहित में खर्च करनी ही पड़ी। यही सामाजिक नैतिकता हैए सदाचार है। शिष्टाचार है। समाजवादी सिद्धांत हैए कि मिल.बाँटकर खाओ। रिश्वत का पैसा अकेले हजम करोए यह भ्रष्टाचार है। मैं ऐसे भ्रष्टाचार के सख्त खिलाफ हूँ।
मित्रों को कॉफी पिलाने के बाद मैं और खुश हुआ कि अब तो इतने सारे लोग एकजुट हो गए। अब भ्रष्टाचार बच के कहाँ जायेगा। मैं इस प_े की जान लेकर ही रहूँगा।
अब तो आपको यकीन हुआ नए कि इस धरा पर कोई तो वीर हैए जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लडऩा चाहता है। आमीन।
गिरीश पंकज
संपादक '' सद्भावना दर्पण''
सदस्य साहित्य अकादमी, नई दिल्ली
जी31,  नया पंचशील नगर
रायपुर ( छत्तीसगढ़ )492001

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें