इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

नवम्‍बर 2017 से जनवरी 2018

आलेख
मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व / शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्‍तव

शोध लेख
दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी / डॉ. गिरीश काशिद
स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ' / डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशेटृे
भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान / शोधार्थी आशाराम साहू

कहानी
बदबू / हरिभटनागर
क्‍लॉड इथरली / गजानन माधव मुक्तिबोध
यहॉ - वहॉं, हर कहीं / अंजना वर्मा
चित्र / शंकर पुणतांबेकर
मंतर ( छत्‍तीसगढ़ी कहानी ) धर्मेन्‍द्र निर्मल

गीत / गज़ल / कविता
कवि आज सुनाओ वह गान रे ( गीत ) / अटल बिहारी बाजपेयी
हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ( कविता )
मोला सुनता अउ सुमत ले ( छत्‍तीसगढ़ी गीत ) / ईश्‍वर कुमार
छत्‍तीसगढ़ी लदका गे हे ( छत्‍तीसगढ़ी गीत ) मिलना मलरिहा
वह सुबह कब होगी ( कविता ) / राेज़लीन
दो चिडि़यां ( कविता )/ संतोष श्रीवास्‍तव ' सम '

व्‍यंग्‍य
गल्‍पाहार का अर्थशास्‍त्र / कमलनाथ

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