इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

मंतर

धर्मेन्‍द्र  निर्मल 

अहिल्या ह दुये - चार कौंरा भात ल खाये रिहिस होही। ओतकेच बेरा परमिला झरफिर - झरफिर करत आइस। ओरवाती के खालहे म बैठ गे। अहिल्या देखते सांठ समझ गे। परमिला ह, आज फेर अपन बेटा - बहू संग दू - चार बात कहा  - सुनी होके आवत हे। अहिल्या परमिला के नस - नस ल टमर डारे हवय। जब कभू परमिला बेरा -कुबेरा अहिल्या घर आथे। थोथना फूले रहिथे। मुड़ी - चुंदी बही बरन छरियाये रहिथे। मार गोटारन कस बड़े - बड़े आँखी ल नटेरत, परेतीन बानी अपने अपन बुड़ुर - बुडुर करे लागथे त अहिल्या फट्ट ले जान डारथे के परमिला काकरो संग होवय लड़ झगड़ के आवत हे। आखिर परोसीन होथे। संग लगाती ससुरार आये हे। घर के मुहाटी जुरे हे। संगे रेगत हे। संगे - संग उठत - बइठत हे। एके मुँह म खावत हे एके कूला म हागत हे त का ओतको ल नइ समझही। जब कभू अइसन बात होथे त परमिला ल बइठे बर कहे ल नइ लागय। वोह खुदे हाथ - गोड़ ल लमा - पसार के बइठ जाथे अउ पसरा बगराके सुनाय लगथे। अपन राम कहानी ल। बिन संदर्भ बिन प्रसंग के। पूछे - पाछे के कोनो नेेंगे नइ राखय। आजो वोइसने होइस।
अहिल्या अचोते - अचोवत गोठ के मुहतुर करिस - का साग खाए हस दीदी?
हारन के बाजत भर के देरी रिहिस हे। भइगे ताहने का पूछत हस। परमिला के रेलगाड़ी पोंपियावत छुक - छुक करत दउड़े लगिस - अइ, का खवइ - पीयइ ल पूछथस बहिनी। खाये हवन तभो लांघन। नइ खाये हवन तभो लांघन। अतका कहिके परमिला अपने अपन करू - करू करे लगिस। मुड़ म हाथ ल रखके अनते कोती मुँह ल करके अँइठत बइठ गे। जना मना अहिल्या संग अनबन होगे हावय तइसे। मुड़ ल गड़ियायेे भीतरे - भीतर आँखी ल कनखिया के देख तको डारिस के अहिल्या ह,कुछू बोलत हे के नहीं।
अहिल्या के मुँह उले के उले रही गे। अपने ह फेर हाथ ल झर्रावत केहे लागिस - हरहिंसा खाबे तेला खवई कहिथे अउ उही ह अंग लागथे। हरहर - कटकट म काय सिध परही।
- अइ का होगेे परमिला आज कइसन गुसिया गे हावस वो? गुंझियाये गाँठ परे फूचरा ल फरियावत अहिल्या ह पूछिस।
हालेके अहिल्या जानत हे के परमिला ह बिगर पूछे सबो बात ल उछरही। ओकर पेट म काही बात नइ पचय। छेरी के मँुह त परमिला के मुँह एके जान। तभो ले परमिला ल घलो तो अइसे लगना चाही के अहिल्या ह ओकर दुख - पीरा  ल समझत - सरेखत हावय। अहिल्या के बात ह अभीन सिरायच नइ रिहिस हे। काला बताबे ... एक ठन राहय तेला बतावंव इहाँ तो ... अइसे काहत परमिला फेर थोथना ल ओरमा दिस।
बइला ल धूरा पटकत देखके जइसे किसान के जी बमक जाथे तइसे कस परमिला के ओरमत थोथना ल देखके अहिल्या के जी हो गे रिहिस हे। फेर मन ल मारके उपरसाँसी लेवत कहिस - का करबे दीदी जिंहा चार ठन बरतन -भँड़वा मिलथे तिंहा ठिनिन - ठानन तो होबे करथे ...।
परमिला बीचे म बात काटत कहिस -तभ्भो ले, तभो ले। हमर घर तो बहुतेच हे ....कुच्छूच बात नोहय। हाथ ल झर्रारत आगू कहिस - ओकर जउंहर होवय। नाती टूरा ह अपन ददा संग खाए बर बइठे रिहिसे। घेरी भेरी अपन दाइ जघा आलू  दे ! आलू दे कहिके मांगय।
ओकर आलू मंगइ ल देखके मही ह कहि परेंव - अइ आलू दे दे न। वो कब के आलू - आलू रटन धरे हे। ओकर थारी म भांट च भांटा दिखत हे अउ मोर म आलू च आलू ल भर दे हस। पीलखाहा निपोर ह मीठावत हे न कांही।
परमिला हाथ ल हला - हला के आँखी ल मटकावत तो गोठियाते रिहिस हे। अब मुँह ल घलो दू बीता फार दिस अउ कहिस - हाय राम! बहू के जबान ल तो देख, मोरे बर बघवा कस बरनियागे बाइ। मुही ल कहे लगिस -मं छांट - छांट के परोसत हॅव का? फोकटे -फोकट मोर उपर लांछन लगावत हस।
अब परमिला अपन औकात म आ गे। दाँत ल पीसत,थूँक ल छटकारत उल्टा अहिल्या ल पूछे लगिस - अब बता तंय, भला अपन दाइ ददा ल अइसने जुवाब देवत रिहिस होही ... उहू टूरा के चाल ल तो देख। ओकरे आघू म अतेक बड़ बात होगे फेर एक भाखा बहू ल नइ बरजे सकिस। तंय कालेचुप राहा वो। दाई ह बने काहत हे। अतका तो कहि सकत रहिस हे। फेर काबर बोलय,ओला तो मोहनी - थोपनी देके मोह डारे हे रांड़ी कलजगरी ह।
आज ओकर ससुर जीयत रहितिस त का होतिस जानथस, बखेड़ा खड़ा हो जातिस बखेड़ा? परमिला खुदे सवाल करथे अउ खुदे जुवाब देथे। अहिल्या कभू मुड़ी ल डोलावय। कभू हंू  - हंू काहय। त कभू मुँह ल चक - चक बजा देवय। जइसे जम्मो के जम्मो बिपत ह ओकरे मुंड़ म आके खपला गे हे।
थोरिक थिराके परमिला के एक्सप्रेस फेर दउड़े लागिस। कहिस - मोर चलतिस त मंय एकर कदाप मुँह नइ देखतेंव वो। कहाँ - कहाँ के नीच घरायन म बिहा परेन। मंय पचासो पइत ओकर ददा ल बरजे हौं। आरा - पारा, तीर - तखार ल बने पूछ - गौछ के, देख - परखके मांगबे न कहिके। उहू मुड़पेलवा ह, अपनेच मन के करिस। उहेंच जाके झपाइस। मोर एको नइ चलन दिस। अपन ह तो जुड़ा सितरा के बनौका ल बना लिस। मंय ह फाँदा म परगेंव।
उही होइस जेकर अनमान अहिल्या ल पहिलीच ले रहिस हे। गोठियाते - गोठियावत परमिला बोमफार के रोये लगिस। रोवत - रोवत परमिला अपन जम्मो पुरखा के सबो गुनदोस ल फलफल - फलफल बांच के ओसा तको डारिस। ले दे के सांत होइस तब जाके अहिल्या के जी जुड़ाइस।
अहिल्या जानथे के बात ल बतंगड़ बनाये के परमिला के आदतेच हे। तभो ले ओकर खांध म हाथ ल मड़ाके सहिलावत कहिथे - आज - काल के बहू मन ल का कहिबे बहिनी। कहिबे तेनो अनभल हे। नइ कहिबे तेनो।
परमिला ल लागे लगिस के अहिल्या ह घलो मोर दुख म बियाकुल हे। ओकर ताव थोरिक जुड़ाय लगिस। जम्मो भड़ास निकल गे। मुड़ी ल नवाये सोचे लगिस। अहिल्या समझ गे के परमिला के नारी जुड़ा गे। अब  लोहा म पानी मारे के बेरा आ गे।
कहिथे - बड़ेमन ल घुरूवा होयेच बर परथे परमिला। नान - नान बात म किटिर - काटर होवत रहिबो त परवार ह कइसे चलही। गलती काकर से नइ होवय। लइका ह जाँघ म हग देही त जाँघे ल थोरे काट के फेंक देबे। धोये पोंछे बर तो हमीच ल परही न!
अहिल्या जानथे के कहॅू मंय थोरको खसलेंव ताहेंन परमिला मोरे उपर चढ़ बैठही। परमिला ल समझाना माने तलवार के धार म रेंगना आवय।
बात  ल साधत कहिस - कोन ल का कहिबे बहिनी! हमरे घर हमरे दुवार। बनही त हमरे बिगड़ही त हमरे। कोनो ह अपन मन म काँही राखय। हमी ह अपन फरज ल निभा लेथन सोचके बेटा ल बेटा अउ बहू ल बेटी ले दूसर भाखा नइ काहन। लइका मन संग खेल खाके दुख पीरा ल बिसरा लेथन। फेर हाँ! गउकीन इमान से परमिला तंय पतिया चाहे झन पतिया। जेेन दिन ले मंय बहू ल बेटी कहे ल धरे हॅव वो दिन ले सास - बहू के बीच के डबरा पटा गे हे। बेटी कस मया - दुलार ल पाके मोर सबिता ह बेटी ले जादा मोर हियाव करे लगे हे। मोला कांही  के संसो फिकर नइहे। मंय मन म सोंचे - सपनाये नइ राहव आगू - आगू ले मोर साध पूरा हो जाथे।
अतके ल सुनिस अउ परमिला कुला ल झर्रावत उठके मुसकावत चलते बनिस। जना - मना कोनो खचित बूता - काम के सुरता आगे।
अहिल्या सोचत देखते रहिगे। बोकबाय के बोकबाय।

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